



- विवादों की खेती,आरोपों की फसल और अब समिति प्रबंधक की कुर्सी! सहकारिता में तरक्की का यह कैसा फार्मूला?
- आरोपों की फाइलें बंद,कुर्सी की दौड़ शुरू! साधना कुशवाहा के समिति प्रबंधक बनने की चर्चा से सहकारिता में हलचल…
- बर्खास्तगी,एफआईआर,जेल और निलंबन भी नहीं रोक पाए सपने! साधना कुशवाहा अब समिति प्रबंधक बनने की दौड़ में?
- धान शॉर्टेज के रिकॉर्ड के बीच कुर्सी का सपना! साधना कुशवाहा को आखिर किसका संरक्षण?
- कथित घोटालों की लंबी फेहरिस्त,फिर भी समिति प्रबंधक बनने की तैयारी! सहकारिता में कैसा है यह नियुक्ति तंत्र?
- पहले 2.25 करोड़ का पशु ऋण प्रकरण,फिर धान शॉर्टेज के विवाद,अब समिति प्रबंधक बनने की चाहत!
- बर्खास्तगी से बहाली और अब प्रबंधक की कुर्सी तक! साधना कुशवाहा के मामले में सहकारिता विभाग की भूमिका पर सवाल
- 3559 क्विंटल से 5552 क्विंटल धान की कमी तक विवाद,अब समिति प्रबंधक बनने का ख्वाब! आखिर किसके दम पर?
- घोटालों के आरोपों से घिरा कार्यकाल, फिर भी प्रबंधक की कुर्सी पर नजर! सहकारिता विभाग की मेहरबानी का रहस्य क्या?
- सहकारिता में गजब का खेल! बर्खास्तगी,एफआईआर और निलंबन के बाद अब समिति प्रबंधक बनने की तैयारी?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/सोनपुर/शिवप्रसादनगर,03 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग में यदि जिम्मेदारी संभालने का पैमाना विवादों की संख्या,आरोपों की गंभीरता और विभागीय कार्रवाई का इतिहास है, तो फिर साधना कुशवाहा का सेवा रिकॉर्ड किसी परिचय का मोहताज नहीं होना चाहिए! पशु ऋण वितरण में 2.25 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता,धान खरीदी वर्ष 2020-21 में 3559 क्विंटल धान की कमी का आरोप, 7 जनवरी 2023 को सेवा से बर्खास्तगी, एफआईआर, जेल और वर्तमान में अग्रिम जमानत पर न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण, फिर धान खरीदी वर्ष 2024-25 में 67.33 हेक्टेयर के कथित फर्जी रकबा पंजीयन का विवाद और वर्ष 2025-26 में भौतिक सत्यापन के दौरान लगभग 5552 क्विंटल धान कम मिलने का मामला—इतने घटनाक्रमों के बाद भी यदि कोई कर्मचारी समिति प्रबंधक बनने का सपना देख रहा है,तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस सपने के पीछे कौन-सी ताकत काम कर रही है?
सपना देखना अच्छी बात है,हर कर्मचारी को आगे बढ़ने, पदोन्नति पाने और बेहतर जिम्मेदारी हासिल करने का अधिकार है,लेकिन सहकारिता विभाग कोई ऐसी प्रयोगशाला तो नहीं जहां एक के बाद एक विवादों के बीच जिम्मेदारियां बदलती रहें और हर नए पद के साथ पुराने सवालों को भी अलमारी में बंद कर दिया जाए! समिति प्रबंधक का पद कोई शोभा की कुर्सी नहीं है,जहां बैठकर केवल रुतबा बढ़ाया जाए,यह किसानों के ऋण,धान खरीदी, वित्तीय लेन-देन और समिति के प्रशासनिक कामकाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाला पद है, ऐसे पद के लिए सेवा रिकॉर्ड,कार्यप्रणाली और जवाबदेही की कसौटी सबसे पहले होनी चाहिए,विभागीय सूत्रों के हवाले से जानकारी मिल रही है कि साधना कुशवाहा समिति प्रबंधक बनने के लिए प्रयासरत हैं और इसके लिए विभागीय स्तर पर दौड़-भाग भी कर रही हैं,हालांकि इस कथित प्रयास की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही समिति प्रबंधक पद पर उनकी नियुक्ति का कोई आदेश सामने आया है,लेकिन चर्चा ने सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं, आखिर जिनके नाम के साथ इतने गंभीर विवाद जुड़े बताए जा रहे हैं,उन्हें समिति प्रबंधक बनाने की चर्चा किस आधार पर चल रही है? क्या विभाग ने उनके पुराने मामलों की समीक्षा कर ली है? क्या सभी आरोपों की जांच पूरी हो चुकी है? क्या उन्हें संबंधित मामलों में दोषमुक्त कर दिया गया है? यदि ऐसा है तो विभाग को दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए। और यदि मामले अभी लंबित हैं,तो नियुक्ति की पात्रता और प्रक्रिया पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
2.25 करोड़ के कथित पशु ऋण घोटाले से शुरुआत,फिर जेल तक पहुंचा मामला-साधना कुशवाहा से जुड़े विवादों में सबसे गंभीर मामला वर्ष 2022-23 में सामने आए कथित 2.25 करोड़ रुपये के पशु ऋण वितरण घोटाले का बताया जाता है,आरोप है कि पशु ऋण वितरण के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं,इस प्रकरण में उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा, वर्तमान में वह अग्रिम जमानत पर हैं तथा मामला न्यायालय में विचाराधीन बताया गया है, यहां सवाल यह नहीं कि न्यायालय से पहले किसी को दोषी घोषित कर दिया जाए,न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि है और आरोप सिद्ध होने या न होने का अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा,लेकिन विभागीय जिम्मेदारी का सवाल तो अपनी जगह खड़ा है,जिस कर्मचारी के विरुद्ध करोड़ों रुपये के कथित पशु ऋण घोटाले में आपराधिक प्रकरण दर्ज हो और मामला न्यायालय में विचाराधीन हो,उसके सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा किए बिना उसे समिति प्रबंधक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की चर्चा कैसे हो सकती है? क्या विभाग में नियुक्ति और जिम्मेदारी तय करने के लिए कोई मानक नहीं है? या फिर मानक हैं,लेकिन उनका इस्तेमाल सुविधा के अनुसार किया जाता है? यदि सब कुछ नियमों के तहत है तो संबंधित आदेश और पात्रता का आधार सामने आना चाहिए,आखिर किसानों के पैसे और समिति के वित्तीय रिकॉर्ड की जिम्मेदारी किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपने से पहले विभाग को अतिरिक्त सतर्कता क्यों नहीं बरतनी चाहिए?
3559 क्विंटल धान की कमी और 7 जनवरी 2023 की बर्खास्तगी—फिर वापसी का रास्ता कैसे खुला?-धान खरीदी वर्ष 2020-21 में भी साधना कुशवाहा का नाम 3559 क्विंटल धान की कमी के आरोप से जुड़ा बताया जाता है,इस मामले में लाखों रुपये की आर्थिक अनियमितता का आरोप सामने आया था,उपलब्ध जानकारी के अनुसार सोनपुर समिति के तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी ने कथित 2.25 करोड़ रुपये के पशु ऋण वितरण और 3559 क्विंटल धान शॉर्टेज के आरोपों के आधार पर 7 जनवरी 2023 को साधना कुशवाहा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था,अब जरा सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर गौर कीजिए,एक ओर करोड़ों रुपये के कथित पशु ऋण घोटाले और हजारों क्विंटल धान की कमी के आरोपों के आधार पर बर्खास्तगी की कार्रवाई होती है,दूसरी ओर बाद के वर्षों में वही कर्मचारी धान खरीदी केंद्र जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालती दिखाई देती हैं, आखिर यह जिम्मेदारी किसके आदेश से मिली? क्या बर्खास्तगी आदेश के बाद सेवा में उनकी स्थिति बदल गई थी? क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने बहाली या पुनर्नियुक्ति का आदेश जारी किया था? यदि हां,तो वह आदेश क्या कहता है? क्या नियुक्ति से पहले पुराने मामलों की समीक्षा की गई थी? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना विभाग की पारदर्शिता पर सवाल उठते रहेंगे,आखिर बर्खास्तगी कोई सामान्य टिप्पणी नहीं होती कि आज हुई और कल भुला दी गई,उसके पीछे विभागीय प्रक्रिया,आदेश और कारण होते हैं, यदि उन कारणों में बदलाव हुआ तो उसका रिकॉर्ड भी होना चाहिए।
बर्खास्तगी के बाद वर्ष 2024-25 और 2025-26 में धान खरीदी की जिम्मेदारी किसने सौंपी?-अब सबसे दिलचस्प सवाल सामने आता है, उपलब्ध जानकारी के अनुसार साधना कुशवाहा को वर्ष 2024-25 और वर्ष 2025-26 में शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का प्रभारी बनाया गया। आखिर किस अधिकारी ने यह जिम्मेदारी सौंपी? किस आधार पर सौंपी? क्या उनके सेवा रिकॉर्ड और पूर्व की कार्रवाई को नजरअंदाज किया गया? क्या इस नियुक्ति के लिए कोई विशेष आदेश जारी हुआ था? यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ तो विभाग को नियुक्ति आदेश और उसके आधार को सार्वजनिक करना चाहिए,आखिर यह कोई निजी प्रतिष्ठान नहीं,जहां जिम्मेदारी देने का निर्णय किसी की व्यक्तिगत पसंद पर छोड़ दिया जाए, यह किसानों की उपज और सरकारी धन से जुड़ी व्यवस्था है, यहां हर नियुक्ति का आधार पारदर्शी होना चाहिए।
67.33 हेक्टेयर का कथित फर्जी रकबा—शिकायत और खबर के बाद भी कार्रवाई कहां?-धान खरीदी वर्ष 2024-25 में शिवप्रसादनगर केंद्र से जुड़ा एक और गंभीर विवाद सामने आया,आरोप है कि 67.33 हेक्टेयर का फर्जी रकबा पंजीयन कर कई हजार क्विंटल धान का विक्रय किया गया,इस संबंध में शिकायत किए जाने और समाचार प्रकाशित होने की जानकारी है,लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार अब तक किसी ठोस कार्रवाई का स्पष्ट ब्यौरा सामने नहीं आया है,यदि रकबा पंजीयन में गड़बड़ी हुई थी,तो राजस्व रिकॉर्ड से उसका मिलान किसने किया? संबंधित किसानों के नाम पर कितनी भूमि दर्ज थी? वास्तविक खेती और पंजीकृत रकबे में कितना अंतर था? कितने क्विंटल धान का विक्रय हुआ? क्या खरीदी केंद्र के रिकॉर्ड और राजस्व विभाग के दस्तावेजों का मिलान किया गया? शिकायत की जांच किस अधिकारी ने की और उसका निष्कर्ष क्या निकला? यह कोई मामूली कागजी गलती नहीं है,धान खरीदी व्यवस्था में रकबा पंजीयन ही किसान की पात्रता और संभावित खरीदी की मात्रा का आधार होता है,यदि 67.33 हेक्टेयर के फर्जी रकबा पंजीयन का आरोप सामने आया है,तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,लेकिन सवाल यही है कि शिकायत और खबरों के बाद कार्रवाई का परिणाम कहां है? कहीं ऐसा तो नहीं कि जांच की फाइल भी धान की बोरियों के साथ किसी कोने में रख दी गई हो?
वर्ष 2025-26 में भौतिक सत्यापन के दौरान 5552 क्विंटल धान कम—फिर निलंबन और बहाली का रहस्य!-विवादों की सूची में अगला मामला धान खरीदी वर्ष 2025-26 का बताया जा रहा है,इस दौरान भौतिक सत्यापन में लगभग 5552 क्विंटल धान कम पाए जाने का मामला सामने आया, इस संबंध में खबर प्रकाशित होने के बाद साधना कुशवाहा को निलंबित किए जाने की जानकारी दी गई है,लेकिन इसके बाद उनकी बहाली किस आधार पर हुई,यह सवाल आज भी स्पष्ट जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है, यदि भौतिक सत्यापन में 5552 क्विंटल धान की कमी पाई गई थी,तो उस कमी की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या कमी का पूरा हिसाब लिया गया? क्या रकम जमा कराई गई? यदि जमा कराई गई तो किसने और किस आधार पर? क्या केवल राशि जमा हो जाने से विभागीय जिम्मेदारी समाप्त हो गई? क्या यह जांच की गई कि धान की कमी कैसे हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार था? और यदि साधना कुशवाहा को बहाल किया गया, तो बहाली का आदेश किसने जारी किया? उसमें क्या कारण दर्ज किए गए? क्या जांच पूरी हो गई थी? क्या उन्हें आरोपों से मुक्त किया गया था या केवल प्रशासनिक आधार पर बहाल किया गया? इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए, सहकारिता विभाग में कहीं ऐसा फार्मूला तो नहीं चल रहा कि पहले शॉर्टेज सामने आए,फिर रकम जमा हो और उसके बाद जिम्मेदारी का नया रास्ता खुल जाए? यदि ऐसा नहीं है, तो विभाग को पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर इस संदेह को दूर करना चाहिए।
विवादों का रिकॉर्ड पीछे,समिति प्रबंधक की कुर्सी आगे—आखिर किसकी मेहरबानी?-विभागीय सूत्रों के अनुसार साधना कुशवाहा समिति प्रबंधक बनने के लिए प्रयास कर रही हैं। यदि यह जानकारी सही है,तो विभाग को सबसे पहले उनके पूरे सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा करनी चाहिए,पशु ऋण प्रकरण, एफआईआर,न्यायालय में विचाराधीन मामला, बर्खास्तगी आदेश,धान शॉर्टेज के आरोप, 67.33 हेक्टेयर रकबा विवाद,5552 क्विंटल धान की कथित कमी,निलंबन और बहाली—इन सभी घटनाक्रमों का दस्तावेजी परीक्षण होना चाहिए,समिति प्रबंधक बनने का सपना देखने में कोई बुराई नहीं,लेकिन सवाल यह है कि क्या समिति प्रबंधक की कुर्सी पर बैठने के लिए केवल विभागीय दौड़-भाग और कथित पहुंच पर्याप्त है? क्या किसानों के हित,वित्तीय अनुशासन और ईमानदार कार्यप्रणाली का कोई महत्व नहीं? क्या विभाग में ऐसे कर्मचारी नहीं हैं जिनका सेवा रिकॉर्ड साफ-सुथरा हो और जिन्हें यह जिम्मेदारी दी जा सके? और सबसे बड़ा सवाल—यदि साधना कुशवाहा के पीछे किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण है,तो वह कौन है? क्या बैंक प्रबंधन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो उनकी दावेदारी को आगे बढ़ा रहा है? क्या सहकारिता विभाग के भीतर कोई ऐसी ताकत है जो पुराने विवादों के बावजूद उन्हें महत्वपूर्ण पद पर देखना चाहती है? फिलहाल किसी अधिकारी की भूमिका की पुष्टि नहीं है,लेकिन विभाग को नियुक्ति प्रक्रिया और निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए।
सहकारिता में क्या यही है तरक्की का नया पैमाना?-किसानों के लिए सहकारी समिति वह स्थान है जहां उन्हें ऋण,खाद,बीज और धान खरीदी जैसी सुविधाएं मिलती हैं, किसान अपनी उपज लेकर केंद्र पहुंचता है और भरोसा करता है कि उसका धान सही तौला जाएगा,भुगतान सही होगा और समिति का हिसाब पारदर्शी रहेगा,लेकिन जब समिति की जिम्मेदारी संभालने वाले पदों को लेकर ही इतने सवाल खड़े होने लगें,तो किसानों का भरोसा कैसे कायम रहेगा? यदि एक कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में इतने गंभीर विवाद दर्ज बताए जा रहे हैं,तो विभाग को यह बताना चाहिए कि समिति प्रबंधक पद के लिए पात्रता की कसौटी क्या है, क्या एफआईआर,बर्खास्तगी और निलंबन का कोई महत्व नहीं? क्या न्यायालय में विचाराधीन मामले की जानकारी नियुक्ति प्रक्रिया में देखी जाती है? क्या पुराने वित्तीय विवादों की जांच पूरी होने से पहले नई जिम्मेदारी देना उचित है? कहीं सहकारिता में तरक्की का नया फार्मूला तो नहीं बन गया—पहले आरोपों में घिरो,फिर रकम का हिसाब दो,फिर बहाली का रास्ता खोजो और उसके बाद समिति प्रबंधक की कुर्सी का सपना देखो! यह व्यंग्य इसलिए है क्योंकि विभाग को इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ देना चाहिए, आरोपों की सच्चाई जांच से ही सामने आएगी, लेकिन जांच और जवाबदेही से बचने का रास्ता किसी के लिए नहीं होना चाहिए।
अब विभाग बताए…नियुक्ति की पात्रता क्या है और कार्रवाई का परिणाम कहां है? इस पूरे मामले में सहकारिता विभाग और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक से कई सीधे सवाल हैं…
साधना कुशवाहा को वर्ष 2024-25 और 2025-26 में शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का प्रभारी किस आदेश से नियुक्त किया गया?
7 जनवरी 2023 के बर्खास्तगी आदेश के बाद उनकी सेवा स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ? बहाली या पुनर्नियुक्ति का आदेश किसने जारी किया?
2.25 करोड़ रुपये के कथित पशु ऋण वितरण घोटाले में वर्तमान विभागीय स्थिति क्या है?
3559 क्विंटल धान शॉर्टेज के आरोप पर विभागीय जांच का निष्कर्ष क्या है?
67.33 हेक्टेयर कथित फर्जी रकबा पंजीयन की शिकायत पर क्या जांच हुई और कार्रवाई क्यों स्पष्ट नहीं है?
वर्ष 2025-26 में लगभग 5552 क्विंटल धान की कमी के मामले में निलंबन और बहाली का आधार क्या था?
क्या समिति प्रबंधक पद के लिए उनके पूरे सेवा रिकॉर्ड और लंबित मामलों की समीक्षा की जाएगी?
क्या नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के निर्णय और अनुशंसा को सार्वजनिक किया जाएगा?
सपना उनका,जवाबदेही विभाग की!
साधना कुशवाहा समिति प्रबंधक बनें या नहीं, इसका निर्णय नियमों और सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया के तहत होना चाहिए,लेकिन उससे पहले उनके विरुद्ध सामने आए सभी आरोपों और विभागीय कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है, न तो केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराया जा सकता है और न ही गंभीर आरोपों को नजरअंदाज कर किसी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपना उचित होगा,सहकारिता विभाग के पास अब भी अवसर है कि वह पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए,पुराने आदेश सार्वजनिक करे, शिकायतों का परिणाम बताए और समिति प्रबंधक पद की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी रखे। यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने और रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर मिले,लेकिन यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए,आखिर सवाल एक कर्मचारी के सपने का नहीं,सहकारिता विभाग की साख का है, किसानों की मेहनत की उपज और सरकारी धन की रखवाली करने वाली व्यवस्था में क्या जवाबदेही से बड़ा कोई संरक्षण हो सकता है? अब देखना यह है कि सहकारिता विभाग इस कथित समिति प्रबंधक बनने की दौड़ को किस नजरिए से देखता है,क्या पुराने मामलों की फाइलें खोली जाएंगी,क्या नियुक्ति की पात्रता सार्वजनिक होगी और क्या कथित संरक्षण देने वालों की भूमिका भी जांची जाएगी? या फिर सहकारिता की फाइलों में एक और नया अध्याय जुड़ जाएगा—आरोप पुराने, सवाल पुराने,लेकिन कुर्सी का सपना नया! किसानों को अब आश्वासन नहीं,जवाब चाहिए। सहकारिता विभाग को अब खामोशी नहीं, दस्तावेजों के साथ जवाबदेही दिखानी होगी।
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