स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार और पर्यावरण संरक्षण तक रहा योगदान, वनवासी समाज को संगठित कर जगाया राष्ट्रप्रेम का अलख

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,14 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। देश जब 15 अगस्त को 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तब छत्तीसगढ़ के वनांचलों में सामाजिक चेतना, राष्ट्रप्रेम और सुधार की अलख जगाने वाले संत गहिरा गुरु (रामेश्वर जी) का योगदान विशेष रूप से स्मरणीय हो उठता है। उनका जीवन केवल आध्यात्मिक साधना और समाज सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि वे प्रखर राष्ट्रभक्त भी थे। तत्कालीन धर्मजयगढ़ रियासत के लैलूंगा क्षेत्र के ग्राम गहिरा में सावन अमावस्या को जन्मे संत गहिरा गुरु महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और आत्म-अनुशासन के विचारों से प्रभावित थे। गांधीवादी विचारधारा को समझने के लिए उन्होंने साबरमती आश्रम जाकर महात्मा गांधी से मिलने का प्रयास किया था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों और स्थानीय शोषण के खिलाफ संत गहिरा गुरु ने वनवासी समाज को संगठित किया। वे दुर्गम रास्तों से गहिरा से रायगढ़ तक पैदल गए थे, लेकिन तब तक महात्मा गांधी सहित कई बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे। गांधीजी से मुलाकात नहीं हो सकी और वे वापस अपने गांव लौट आए। इसके बाद भी वे लगातार आदिवासी समाज को जागरूक और संगठित करते रहे।
नोआखाली में गांधीजी के शांति प्रयासों में साथ : 1946 में नोआखाली के सांप्रदायिक दंगों के दौरान महात्मा गांधी शांति स्थापना के लिए वहां पहुंचे थे। विषम परिस्थितियों में संत गहिरा गुरु भी गांधीजी के साथ खड़े रहे और सामाजिक सद्भाव कायम करने के प्रयासों में योगदान दिया।
चीन युद्ध के समय ‘वानर सेना’ की पेशकश : 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान संत गहिरा गुरु ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर देश की रक्षा के लिए वनवासी युवाओं के साथ सीमा पर जाने की इच्छा जताई थी। उन्होंने अपने अनुयायियों को संगठित कर देश की सुरक्षा में योगदान देने का संकल्प व्यक्त किया था। उनका राष्ट्रप्रेम केवल विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि संकट के समय देश के साथ खड़े होने की भावना से जुड़ा था।
जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की रक्षा का संदेश : संत गहिरा गुरु ने वनांचलों में नशामुक्ति, शिक्षा, सामाजिक सुधार और पर्यावरण संरक्षण को आंदोलन का स्वरूप दिया। उन्होंने ‘सनातन संत समाज’ के माध्यम से धर्म और संस्कृति के संरक्षण का प्रयास किया। दुर्गम क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों की स्थापना कर शिक्षा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का काम किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा को उन्होंने सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बताया।
सम्मानों में सुरक्षित है विरासत :
21 नवंबर 1996 को 92 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए संत गहिरा गुरु की सेवाओं को शासन ने विभिन्न सम्मानों से प्रतिष्ठित किया। उन्हें राष्ट्रीय एकता, समाज सेवा और सांप्रदायिक सौहार्द के क्षेत्र में सम्मान मिला। उनके नाम पर पर्यावरण संरक्षण के लिए ‘संत गहिरा गुरु पर्यावरण पुरस्कार’ की स्थापना की गई। सरगुजा स्थित विश्वविद्यालय का नाम भी उनके सम्मान में संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय रखा गया है।
आज भी प्रासंगिक है ‘सब मनखे एक समान
संत गहिरा गुरु का संदेश ‘सब मनखे एक समान’ आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनके 14 सूत्रों में नशामुक्ति, सदाचार, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समानता का संदेश निहित है। स्वतंत्रता दिवस पर उनका जीवन हमें यह संकल्प लेने की प्रेरणा देता है कि राष्ट्रप्रेम केवल उत्सव तक सीमित न रहे, बल्कि समाज, प्रकृति और देश के प्रति जिम्मेदारी के रूप में हमारे आचरण में दिखाई दे।
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