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पटना/कोरिया@ छत्तीसगढ़ का शायद पहला ‘मवेशी शौचालय’! इंसानों ने किया बहिष्कार,गाय-भैंस ने संभाली जिम्मेदारी

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लाखों की लागत से बना सार्वजनिक शौचालय बना पशुओं का विश्राम गृह,सफाई व्यवस्था भी भगवान भरोसे…
-संवाददाता-
पटना/कोरिया,03 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत बनाए गए सार्वजनिक शौचालयों का उद्देश्य था कि राहगीरों और आम नागरिकों को स्वच्छ एवं सुरक्षित सुविधा मिले,लेकिन कोरिया जिले की नवीन नगर पंचायत पटना में एक ऐसा सार्वजनिक शौचालय है, जिसने शायद अपनी उपयोगिता की नई परिभाषा ही लिख दी है, यहां इंसानों की जगह अब मवेशियों ने कब्जा जमा लिया है, अगर कोई नियमित रूप से इस शौचालय का उपयोग कर रहा है,तो वे हैं—गाय, बैल और अन्य आवारा मवेशी,राष्ट्रीय राजमार्ग पर, नगर पंचायत कार्यालय और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बीच स्थित यह शौचालय स्थान के हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण है,दिनभर यहां से सैकड़ों लोग गुजरते हैं, मरीज अस्पताल आते हैं,यात्री रुकते हैं,लेकिन शौचालय का दरवाजा इंसानों के लिए शायद कम और मवेशियों के लिए ज्यादा खुला रहता है।
राहगीरों की बढ़ी परेशानी– स्थानीय लोगों का कहना है कि सार्वजनिक सुविधा के नाम पर बनाया गया यह शौचालय अब लोगों के किसी काम का नहीं रह गया है,महिलाएं, बुजुर्ग और बाहर से आने वाले यात्रियों को सुविधा मिलने के बजाय निराशा हाथ लगती है, वहीं मवेशियों के जमावड़े और गंदगी के कारण आसपास दुर्गंध भी फैलती रहती है।
स्वच्छता अभियान या पशुधन सुविधा केंद्र?– शौचालय के भीतर प्रवेश करते ही सबसे पहले स्वागत किसी सफाई कर्मचारी से नहीं, बल्कि गोबर से होता है, कई बार अंदर मवेशी आराम फरमाते मिल जाते हैं, ऐसा लगता है कि उन्होंने इस भवन को अपना स्थायी आश्रय घोषित कर दिया है, व्यंग्य यह है कि शौचालय तो उपयोग में आ रहा है, बस उपयोगकर्ता बदल गए हैं।
जिम्मेदार कौन?– सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस सार्वजनिक शौचालय की देखरेख और साफ-सफाई की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि नगर पंचायत के अधीन यह शौचालय संचालित है, तो क्या कभी किसी अधिकारी या कर्मचारी ने इसकी वास्तविक स्थिति देखने की जरूरत महसूस की? यदि सफाई के लिए बजट खर्च हो रहा है, तो वह सफाई आखिर कागजों में हो रही है या धरातल पर?
व्यंग्य में बड़ा सवाल- यदि यही हाल रहा तो शायद आने वाले समय में इस शौचालय के बाहर एक नया बोर्ड लगाना पड़े-‘सार्वजनिक शौचालय (केवल मवेशियों हेतु)’ और इंसानों के लिए लिखा जाए-‘कृपया असुविधा के लिए खेद है,सुविधा फिलहाल पशुधन के उपयोग में है।
जवाब का इंतजार- अब देखना यह होगा कि नगर पंचायत इस ‘मवेशी शौचालय’ को फिर से आम नागरिकों के उपयोग लायक बनाती है या फिर यह लाखों रुपये की लागत से बनी सरकारी संपत्ति पशुओं के स्थायी विश्राम स्थल के रूप में ही अपनी पहचान बनाए रखेगी,आखिर सवाल सिर्फ एक शौचालय का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन,जवाबदेही और स्वच्छता अभियान की वास्तविक तस्वीर का भी है।


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