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कोरिया/एमसीबी@ कथित ऑडियो,शिकायत और चार साल की चुप्पी…क्या अब आईजी दिलाएंगे जवाब?

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  • प्रधान आरक्षक नवीन दत्त तिवारी का कथित ऑडियो फिर चर्चा में…चार साल पुरानी शिकायत पर जवाब अब भी बाकी
  • शिकायत,कथित ऑडियो और चार साल की खामोशी…आखिर किसकी मेहरबानी से नहीं खुली जांच की फाइल?
  • कथित वायरल ऑडियो ने फिर उठाए सवाल,क्या शिकायत फाइलों में दफन हो गई?
  • ऑडियो वायरल,शिकायत दर्ज,फिर भी कार्रवाई का अता-पता नहीं…क्या जवाबदेही सिर्फ आम नागरिकों के लिए है?
  • चार साल पहले उठे सवाल आज भी कायम,क्या पुलिस अपने ही कर्मचारी की शिकायत भूल गई?
  • क्या वर्दी का मतलब जवाबदेही से ऊपर होना है? चार साल पुराने कथित ऑडियो ने फिर खड़े किए सवाल
  • प्रधान आरक्षक पर लगे आरोपों की जांच हुई या नहीं? चार साल बाद फिर वायरल हुआ कथित ऑडियो ने उठाया सवाल
  • शिकायत हुई,बयान हुए,कथित ऑडियो भी मिला…फिर कार्रवाई किस मोड़ पर रुक गई?
  • दिसंबर 2021 में पुलिस अधीक्षक को शिकायत और कथित ऑडियो सौंपे जाने का दावा
  • चार साल बाद फिर सोशल मीडिया पर वायरल होने से उठे सवाल—यदि जांच हुई थी तो उसका परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ? यदि नहीं हुई, तो जिम्मेदारी किसकी है?


रवि सिंह
कोरिया/एमसीबी,28 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
न्याय व्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ पुलिस मानी जाती है,आम नागरिक जब किसी अन्याय, अपराध,धमकी या विवाद का सामना करता है तो सबसे पहले पुलिस के दरवाजे पर ही दस्तक देता है,लेकिन जब शिकायत का केंद्र स्वयं पुलिस विभाग का कोई कर्मचारी बन जाए, शिकायत के साथ कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध हो,आवेदन पुलिस अधीक्षक तक पहुंच जाए और उसके बाद भी वर्षों तक यह स्पष्ट न हो कि कार्रवाई हुई या नहीं,तब सवाल केवल एक कर्मचारी पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़े होते हैं, कोरिया जिले में एक बार फिर ऐसा ही मामला चर्चा में है,करीब चार वर्ष पुराना बताया जा रहा एक कथित ऑडियो फिर सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूहों में वायरल हो रहा है,दावा किया जा रहा है कि इस ऑडियो में वर्तमान में एमसीबी जिले में पदस्थ का एक प्रधान आरक्षक एक युवक से मोबाइल पर बातचीत के दौरान पैसे की मांग करता,अभद्र भाषा का प्रयोग करता और कथित रूप से धमकी देता सुनाई देता है,इस ऑडियो की स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन यह भी तथ्य सामने है कि दिसंबर 2021 में इसी कथित ऑडियो के साथ पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत दी गई थी,अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि ऑडियो पुराना है या नया। असली प्रश्न यह है कि यदि शिकायत हुई थी तो उसका परिणाम क्या हुआ? यह समाचार किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का प्रयास नहीं है,यह उन सवालों को सामने रखने का प्रयास है जो चार वर्षों से उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। शिकायत हुई, कथित ऑडियो जमा हुआ,आरोप लगे,चर्चा हुई,समाचार प्रकाशित हुए—लेकिन जनता आज भी यह नहीं जानती कि निष्कर्ष क्या निकला,कानून का शासन केवल अपराधियों पर कार्रवाई से नहीं,बल्कि अपने तंत्र की निष्पक्ष जांच से भी स्थापित होता है,यदि शिकायत निराधार थी,तो उसका स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए,यदि शिकायत में तथ्य थे,तो कार्रवाई भी दिखनी चाहिए,वर्दी का सबसे बड़ा सम्मान कार्रवाई से नहीं,बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई से मिलता है। और जवाबदेही से बड़ी कोई वर्दी नहीं होती।
चार साल बाद फिर वही ऑडियो, फिर वही सवाल-समय बीत गया,अधिकारी बदले,पदस्थापनाएं बदलीं,लेकिन सवाल वहीं के वहीं रह गए,अब जब यही कथित ऑडियो फिर व्हाट्सएप समूहों में वायरल हो रहा है तो लोगों के बीच चर्चा है कि क्या चार साल पहले दी गई शिकायत पर कोई निष्कर्ष निकला था? यदि निकला था,तो जनता को क्यों नहीं बताया गया? यदि नहीं निकला, तो आखिर किस कारण से?
क्या जांच हुई थी या केवल फाइल चलती रही?
सरकारी व्यवस्था में हर शिकायत की एक यात्रा होती है,आवेदन आता है,डायरी में दर्ज होता है, जांच अधिकारी नियुक्त होता है,बयान दर्ज होते हैं, रिपोर्ट बनती है, फिर कार्रवाई होती है,लेकिन इस मामले में लोग पूछ रहे हैं कि यह यात्रा आखिर कहां जाकर रुक गई? क्या जांच शुरू ही नहीं हुई? क्या जांच हुई लेकिन पूरी नहीं हुई? क्या जांच पूरी हुई लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई? या फिर शिकायत किसी फाइल में दबकर रह गई?
कथित ऑडियो की वैज्ञानिक जांच हुई या नहीं?-आज तकनीक इतनी विकसित है कि किसी भी ऑडियो की फॉरेंसिक जांच कर यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें छेड़छाड़ हुई है या नहीं,आवाज किसकी है और रिकॉर्डिंग में संपादन हुआ या नहीं,यदि दिसंबर 2021 में शिकायत के साथ ऑडियो उपलब्ध कराया गया था,तो क्या उसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया? यदि भेजा गया तो रिपोर्ट क्या कहती है? यदि नहीं भेजा गया तो क्यों नहीं भेजा गया? इन सवालों का जवाब केवल विभाग ही दे सकता है।
शिकायतकर्ता ने लगाए थे और भी गंभीर आरोप- पुलिस अधीक्षक को दिए गए आवेदन में शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि संबंधित प्रधान आरक्षक का कथित रूप से जुआ फड़ संचालकों से संपर्क है और आर्थिक लेन-देन को लेकर दबाव बनाया जाता है, ये आरोप गंभीर थे,लेकिन आरोप और तथ्य में अंतर होता है, यही कारण है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच सबसे आवश्यक होती है, यदि आरोप गलत थे तो संबंधित कर्मचारी को स्पष्ट रूप से राहत मिलनी चाहिए थी,यदि आरोप सही थे तो कार्रवाई होनी चाहिए थी,लेकिन जब दोनों में से किसी का परिणाम सार्वजनिक नहीं होता,तब सवाल व्यवस्था पर उठते हैं।
क्या संरक्षण की चर्चा यूं ही होती है?- स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि संबंधित प्रधान आरक्षक का नाम कई विवादों में आया, लेकिन उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई नहीं हुई,यह चर्चा सत्य है या नहीं, इसका निष्कर्ष बिना जांच नहीं निकाला जा सकता,लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि ऐसी धारणा बनी क्यों? क्या विभाग ने समय रहते पारदर्शी कार्रवाई कर इन चर्चाओं को समाप्त करने का प्रयास किया? यदि नहीं किया, तो ऐसी चर्चाएं स्वाभाविक रूप से जन्म लेती हैं।
चार महीने का तबादला और फिर वापसी-सिर्फ संयोग या सामान्य प्रक्रिया?- स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जाता है कि शिकायतों के बाद संबंधित प्रधान आरक्षक का कुछ समय के लिए जशपुर स्थानांतरण हुआ और बाद में उसकी वापसी एमसीबी जिला भी हो गई,यदि ऐसा हुआ, तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यह नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया थी या शिकायत से जुड़ी कार्रवाई का हिस्सा,क्योंकि तबादला और अनुशासनात्मक कार्रवाई दोनों अलग-अलग विषय हैं।
दैनिक घटती-घटना ने पहले भी उठाया था यह मामला- यह विषय नया नहीं है, दैनिक घटती-घटना ने वर्ष 2022 में भी शिकायत और कथित ऑडियो के आधार पर यह प्रश्न उठाया था कि क्या विभाग कार्रवाई करेगा? आज चार साल बाद वही कथित ऑडियो फिर सामने आया है,ऐसे में इस प्रश्न को फिर उठाना किसी व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करना नहीं,बल्कि यह जानना है कि उस शिकायत का अंतिम परिणाम क्या हुआ, पत्रकारिता का दायित्व केवल खबर प्रकाशित करना नहीं,बल्कि उसके निष्कर्ष तक समाज को पहुंचाना भी है।
क्या वर्दी सवालों से बड़ी हो गई?- यह इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है,वर्दी सम्मान का प्रतीक है,लेकिन वर्दी सम्मान तभी तक है जब तक उसके साथ जवाबदेही भी जुड़ी रहे,यदि किसी आम नागरिक पर आरोप लगता है तो पुलिस तत्काल जांच करती है, लेकिन यदि आरोप किसी पुलिस कर्मचारी पर लगे हों,तो क्या जांच की गति बदल जानी चाहिए? क्या विभाग के भीतर जवाबदेही के मानदंड अलग होने चाहिए? क्या एक शिकायत केवल इसलिए महत्व खो देती है क्योंकि उसका संबंध विभाग के अपने कर्मचारी से है? यही वे प्रश्न हैं जो इस पूरे प्रकरण को सामान्य विवाद से आगे ले जाकर संस्थागत जवाबदेही का विषय बना देते हैं।
अब निगाहें आईजी पर- चूंकि मामला फिर चर्चा में आया है, इसलिए अब सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यदि शिकायत और रिकॉर्ड उपलब्ध हैं,तो उनकी समीक्षा कराई जाए, यदि जांच पूरी हो चुकी है,तो उसका निष्कर्ष सार्वजनिक किया जाए, यदि जांच अधूरी है, तो उसे पूरा कराया जाए,यदि ऑडियो की तकनीकी जांच नहीं हुई थी,तो अब कराई जाए,इससे न केवल सच्चाई सामने आएगी,बल्कि पुलिस विभाग पर जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
शिकायत केवल कागज नहीं थी…उसके साथ कथित ऑडियो भी था…
दिसंबर 2021 में पुलिस अधीक्षक,कोरिया को दिए गए आवेदन में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि संबंधित प्रधान आरक्षक नवीन दत्त तिवारी उससे आर्थिक लेन-देन को लेकर लगातार संपर्क कर रहा था,शिकायत में दावा किया गया कि फोन पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया,पैसे नहीं देने पर धमकी दी गई और अपने पद का प्रभाव दिखाने की कोशिश की गई, शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया कि उसके पास बातचीत की रिकॉर्डिंग है और उसने वही रिकॉर्डिंग पुलिस अधीक्षक को उपलब्ध कराई,सामान्य परिस्थितियों में किसी भी विभाग के लिए यह पर्याप्त आधार होता है कि वह प्रारंभिक जांच शुरू करे, दोनों पक्षों के बयान ले,तकनीकी परीक्षण कराए और तथ्य सामने लाए,लेकिन चार वर्ष बाद भी जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उस शिकायत की जांच आखिर किस मुकाम तक पहुंची?
एक सवाल जो हर नागरिक पूछ रहा है, यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं और यदि कथित ऑडियो वास्तविक है,तो एक सीधा सवाल उठता है…
आखिर एक पुलिस कर्मचारी किसी नागरिक से पैसे क्यों मांगेगा?
यदि यह निजी लेन-देन था, तो उसकी वास्तविक प्रकृति क्या थी?
यदि यह निजी विवाद नहीं था, तो शिकायतकर्ता ने इतने गंभीर आरोप क्यों लगाए?
यदि शिकायत झूठी थी, तो क्या उसे झूठा साबित करने वाली जांच रिपोर्ट कभी सार्वजनिक हुई?
और यदि शिकायत में दम था, तो कार्रवाई कहां हुई?
इन प्रश्नों का उत्तर अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
चार साल बाद भी जिन
सवालों का जवाब बाकी है…
दिसंबर 2021 की शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई?
क्या कथित ऑडियो की फॉरेंसिक जांच हुई?
क्या संबंधित प्रधान आरक्षक और शिकायतकर्ता के बयान दर्ज हुए?
क्या विभागीय जांच पूरी हुई?
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?
यदि शिकायत गलत थी, तो शिकायतकर्ता पर क्या कार्रवाई हुई?
यदि शिकायत सही थी, तो संबंधित कर्मचारी पर क्या कार्रवाई हुई?
क्या अब वायरल ऑडियो के बाद मामले की पुनः समीक्षा होगी?


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