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बलरामपुर@एनएच-343 में सड़क नहीं,‘लेन-देन’ की परतें उखड़ीं!

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  • जेई से एक्सईएन,एसई से एसडीएम तक पदों के सामने रकम का हिसाब!
  • एसपी,टीआई,फॉरेस्ट और मीडिया के नाम भी दर्ज होने का दावा…नाली में वाइब्रेटर की जगह लकड़ी से कंक्रीट दबाने का कथित वीडियो


-सुदामा राजवाड़े-
बलरामपुर,12 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ को झारखंड से जोड़ने वाला एनएच-343 इन दिनों सिर्फ गड्ढों,कीचड़ और बदहाल यातायात के कारण चर्चा में नहीं है। सड़क की दुर्दशा के बीच सामने आए एक कथित वायरल ऑडियो,कथित कैश-बुक और निर्माण कार्य से जुड़े वीडियो ने अब पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया हैं। एक तरफ हाईवे पर लोग जान जोखिम में डालकर सफर कर रहे हैं,दूसरी तरफ कथित हिसाब-किताब में सरकारी पदों और विभागों के नाम के सामने लाखों रुपए दर्ज दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। वायरल ऑडियो में कथित तौर पर हर महीने 12 लाख रुपए तक की मंथली पहुंचाने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, सामने आई कथित कैश-बुक में कुल 11 लाख 39 हजार रुपए के खर्च का हिसाब बताया जा रहा है। इसमें जेई,एसडीओ,एक्सईएन,एसई, एई,एसडीएम,टीआई और एसपी (बलरामपुर) जैसे पदों के सामने रकम लिखी होने का दावा है। जर्नलिस्ट और मीडिया के नाम पर भी राशि दर्ज दिखाई देती है।
हालांकि वायरल ऑडियो,कैश-बुक और वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी अधिकारी,जनप्रतिनिधि,पत्रकार या विभाग पर इन सामग्रियों के आधार पर भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि ये दस्तावेज और दावे वास्तविक हैं,तो मामला केवल सड़क निर्माण की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि सरकारी धन,कथित अवैध भुगतान और प्रशासनिक निगरानी की गंभीर जांच का बन जाता है। अब सवाल यह नहीं कि सड़क में गड्ढे क्यों हैं। सवाल यह है कि गड्ढों से भरी सड़क के पीछे कहीं हिसाब-किताब के भी गड्ढे तो नहीं छिपे हैं?
वायरल ऑडियो में 12 लाख की कथित मंथली का दावा…
सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित ऑडियो में एनएच-343 पर काम कर चुकी एक कंपनी के पूर्व कर्मचारी और एक अन्य व्यक्ति के बीच बातचीत होने की बात कही जा रही है। ऑडियो के संबंध में दावा है कि कर्मचारी भुगतान नहीं मिलने से परेशान था और उसने श्रम विभाग में शिकायत की थी। शिकायत के बाद कुछ भुगतान होने का भी कथित उल्लेख है। बातचीत का सबसे गंभीर हिस्सा कथित तौर पर वह है,जिसमें काम चलाने के लिए अधिकारियों और अन्य लोगों तक हर महीने रकम पहुंचाने की बात कही जा रही है। इसमें एक स्थान पर 12 लाख रुपए तथा अन्य स्थानों पर डेढ़-डेढ़ लाख रुपए तक की कथित मंथली का उल्लेख होने का दावा है। ऑडियो में सीमेंट की गुणवत्ता,गिट्टी की सप्लाई,बिल पास कराने और निर्माण कार्य से जुड़े कथित लेन-देन की चर्चा होने की भी बात सामने आ रही है। यदि ऑडियो की आवाज,बातचीत और उसमें किए गए दावों की पुष्टि होती है,तो यह निर्माण कार्य में कथित भ्रष्टाचार के संभावित नेटवर्क की ओर संकेत कर सकता है। लेकिन किसी वायरल ऑडियो में कही गई बात अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं होती। इसकी आवाज किसकी है, बातचीत कब की है, संदर्भ क्या है, रकम वास्तव में दी गई या नहीं और कथित भुगतान का लाभ किसे मिला—इन सभी सवालों के जवाब तकनीकी और वित्तीय जांच से ही सामने आ सकते हैं।

11.39 लाख की कथित कैश-बुक में किसका कितना हिसाब?
वायरल ऑडियो के बाद सामने आई एक कथित कैश-बुक ने मामले को और गंभीर बना दिया है। इसमें कुल 11 लाख 39 हजार रुपए खर्च होने का हिसाब दर्ज दिखाई देने का दावा है। कथित सूची में सरकारी पदों और विभागों के नाम के सामने रकम लिखी होने की बात कही जा रही है।
फोटो में दिखाई देने वाली प्रविष्टियों के आधार पर निम्न रकम दर्ज होने का दावा हैः


महत्वपूर्ण : उपरोक्त प्रविष्टियां वायरल सामग्री में बताए गए दावों के आधार पर प्रस्तुत हैं। मूल कैश-बुक,उसकी पूर्ण फोटो,लेखा-पुस्तक,बिल और भुगतान रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच के बिना इसे वास्तविक भुगतान का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कुल रकम और पदों के सामने
दर्ज रकम में अंतर क्यों?

कथित कैश-बुक में कुल खर्च 11.39 लाख बताया जा रहा है। वहीं, सरकारी पदों के सामने दर्ज रकम करीब 9.95 लाख बैठती है। यदि इसमें जर्नलिस्ट,मीडिया,फॉरेस्ट पेनाल्टी और अन्य प्रविष्टियां जोड़ी जाएं,तो कुल रकम और पदवार रकम के बीच अंतर की भी जांच आवश्यक होगी। यही वह बिंदु है,जहां जांच एजेंसियों को सिर्फ वायरल फोटो देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय मूल दस्तावेजों तक पहुंचना होगा।
यदि कैश-बुक वास्तविक
है तो सवाल होंगे…

– क्या यह कंपनी की आधिकारिक कैश-बुक है या किसी व्यक्ति की निजी नोटबुक?
– रकम किसके निर्देश पर लिखी गई?
– भुगतान नकद हुआ या बैंक के माध्यम से?
– क्या संबंधित रकम के बिल,वाउचर और रसीद उपलब्ध हैं?
– क्या रकम किसी वैध सरकारी शुल्क या विभागीय भुगतान के रूप में दर्ज है?
– सरकारी पदों के नाम के सामने लिखी रकम का वास्तविक प्राप्तकर्ता कौन था?
– क्या संबंधित अधिकारियों को इन प्रविष्टियों की जानकारी थी?
– क्या किसी ने कंपनी या ठेकेदार से अवैध रकम की मांग की?
किसी पद के नाम के सामने रकम लिखे होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उस पद पर बैठे अधिकारी ने रकम ली है। लेकिन यदि लेखा-पुस्तक वास्तविक है और भुगतान का रिकॉर्ड मिलता है,तो इसकी जांच से बचना भी संभव नहीं होना चाहिए।
एसपी और टीआई के नाम सामने आने से जांच का दायरा बढ़ा : कथित कैश-बुक में एसपी (बलरामपुर) के सामने 15 हजार और टीआई (रामानुजगंज) के सामने 10 हजार लिखे होने का दावा है। यह प्रविष्टियां सत्य हैं या नहीं,इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है। फिर भी पुलिस विभाग के पदों के नाम सामने आने से जांच का दायरा और संवेदनशील हो जाता है।
यदि किसी सरकारी अधिकारी के नाम पर रकम का हिसाब रखा गया है,तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि…
– क्या राशि वास्तव में संबंधित अधिकारी तक पहुंची?
– क्या यह किसी सरकारी कार्य, शुल्क या वैध भुगतान से संबंधित थी?
– क्या किसी मध्यस्थ ने अधिकारी के नाम का उपयोग किया?
– क्या कथित भुगतान का कोई स्वतंत्र गवाह या डिजिटल रिकॉर्ड है?
ऐसे मामलों में जांच का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर सच सामने लाना होना चाहिए।
‘मीडिया’ के नाम पर भी रकम,तो सवाल पत्रकारिता पर भी : कथित कैश-बुक में जर्नलिस्ट के नाम पर 12 हजार और मीडिया के नाम पर 12,500 दर्ज दिखाई देने का दावा है। यदि यह प्रविष्टि वास्तविक है, तो इसकी जांच केवल निर्माण कंपनी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मीडिया के नाम पर रकम किसे दी गई? क्या यह विज्ञापन भुगतान था? क्या कोई बिल या रसीद थी? क्या यह किसी खबर को रोकने, प्रकाशित करने या प्रभावित करने के लिए दी गई रकम थी? अथवा केवल किसी व्यक्ति द्वारा अपने हिसाब में लिखी गई राशि? इन सवालों का उत्तर जांच से ही मिल सकता है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए भी यह आवश्यक है कि मीडिया के नाम पर दर्ज किसी भी कथित भुगतान की स्वतंत्र पुष्टि हो। लेकिन केवल ‘जर्नलिस्ट’ या ‘मीडिया’ शब्द लिखे होने से किसी पत्रकार पर आरोप सिद्ध नहीं होता। नाम, पहचान, भुगतान का प्रमाण और वास्तविक भूमिका सामने आने के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
सड़क पर गड्ढे, हिसाब में लाखों…पैसा गया कहां? रामानुजगंज से बलरामपुर और बड़की महरी की दिशा में एनएच-343 के कई हिस्सों की बदहाल स्थिति पर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आती रही हैं। बारिश के बाद गड्ढों, कीचड़ और खराब सड़क सतह से यातायात प्रभावित होने की बात कही जा रही है। कई जगह निर्माणाधीन हिस्सों में वाहनों की रफ्तार कम हो रही है और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गड्ढों से बचने के दौरान वाहन चालकों को अचानक दिशा बदलनी पड़ती है, जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। मरीजों, स्कूली बच्चों,दोपहिया वाहन चालकों और रोजमर्रा के यात्रियों की परेशानी भी सामने आ रही है। यहां व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है—सड़क पर गड्ढे इतने कि वाहन चालक रास्ता खोजते रह जाएं,और कथित हिसाब में रकम इतनी कि जांचकर्ता अब भुगतान का रास्ता खोजें।
सड़क की गुणवत्ता खराब होने के कई कारण हो सकते हैं…अत्यधिक बारिश, भारी यातायात,जल निकासी की समस्या, निर्माण में देरी,रखरखाव की कमी या तकनीकी खामियां। इसलिए सिर्फ सड़क की बदहाली के आधार पर कमीशनखोरी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन सड़क की हालत और कथित वित्तीय अनियमितताओं का एक साथ सामने आना जांच की जरूरत को जरूर मजबूत करता है।
नाली निर्माण में वाइब्रेटर की जगह लकड़ी? निर्माण गुणवत्ता पर बड़ा सवाल : एनएच-343 के निर्माण कार्य से जुड़े कुछ कथित वीडियो में नाली निर्माण के दौरान कंक्रीट को कॉम्पैक्ट करने के लिए वाइब्रेटर मशीन की जगह लकड़ी के पटिये से दबाने का दावा किया जा रहा है। कंक्रीट को उचित तरीके से कॉम्पैक्ट करना निर्माण गुणवत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सामान्यतः वाइब्रेटर का उपयोग कंक्रीट के अंदर फंसी हवा कम करने और मिश्रण को ठीक से बैठाने के लिए किया जाता है। हालांकि हर प्रकार के कंक्रीट और हर छोटे निर्माण में एक ही तकनीक अनिवार्य नहीं होती,यह डिजाइन,मिश्रण,कार्य-विधि और तकनीकी विनिर्देशों पर निर्भर करता है।
इसलिए कथित वीडियो की जांच में यह देखा जाना चाहिए कि…
– वीडियो किस स्थान और तारीख का है?
– नाली का डिजाइन और तकनीकी विनिर्देश क्या हैं?
– इस्तेमाल किया गया कंक्रीट किस ग्रेड का था?
– क्या निर्धारित कॉम्पैक्शन विधि अपनाई गई?
– क्या साइट इंजीनियर ने गुणवत्ता जांच की?
– क्या कंक्रीट के नमूने लिए गए?
– क्या नाली की मोटाई,ढाल और जल निकासी मानकों के अनुरूप है?
यदि वीडियो में मानकों की अनदेखी प्रमाणित होती है,तो संबंधित ठेकेदार,गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी और पर्यवेक्षण तंत्र की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
लकड़ी से दबेगा कंक्रीट या जिम्मेदारी? ग्रामीणों का आरोप है कि नाली की कंक्रीट को लकड़ी से दबाया जा रहा है। यदि यह सही है,तो सवाल सिर्फ मजदूर के हाथ में पकड़ी लकड़ी का नहीं है। सवाल उस इंजीनियरिंग व्यवस्था का है,जिसने मौके पर काम की निगरानी करनी थी। निर्माण स्थल पर मजदूर अपनी समझ से काम कर रहा था या उसे ऐसा करने के निर्देश दिए गए थे? क्या मशीन उपलब्ध थी? क्या काम की गति बढ़ाने के लिए मानक प्रक्रिया छोड़ी गई? क्या गुणवत्ता परीक्षण केवल कागजों पर हुआ? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब स्थल निरीक्षण, माप पुस्तिका,गुणवत्ता रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के बयान से मिल सकता है। क्योंकि यदि नाली की कंक्रीट में मजबूती की जगह सिर्फ लकड़ी का सहारा है, तो बारिश में उसकी असली परीक्षा होना तय है।
जांच के लिए केवल कमेटी नहीं, दस्तावेज भी चाहिए : मामला गंभीर है, इसलिए सिर्फ औपचारिक जांच समिति बनाकर रिपोर्ट तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जांच में वित्तीय,तकनीकी और प्रशासनिक—तीनों पहलुओं को शामिल करना जरूरी है।
वायरल ऑडियो की फोरेंसिक जांच
– मूल ऑडियो क्लिप जब्त कर उसकी डिजिटल फोरेंसिक जांच कराई जाए।
– आवाज की पहचान के लिए विधि-सम्मत वॉइस सैंपल लिए जाएं।
– ऑडियो में किसी प्रकार की एडिटिंग, कट-पेस्ट या छेड़छाड़ की जांच हो।
– बातचीत की तारीख,स्थान और संदर्भ का पता लगाया जाए।
– संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाएं।
कथित कैश-बुक का मूल स्रोत तलाशा जाए…
– मूल कैश-बुक या उसकी प्रमाणित प्रति प्राप्त की जाए।
– लिखावट,पन्नों,तारीखों और प्रविष्टियों की जांच हो।
– लेखा-पुस्तक कंपनी की है या किसी व्यक्ति की,यह स्पष्ट किया जाए।
– कथित भुगतान के बिल, वाउचर,रसीद और बैंक रिकॉर्ड का मिलान किया जाए।
– कैश-बुक में दर्ज रकम और कंपनी के आधिकारिक लेखांकन में अंतर की जांच हो।
सरकारी पदों के सामने
लिखी रकम का सत्यापन…

– जेई,एसडीओ,एक्सईएन,एसई,एई, एसडीएम,टीआई और एसपी के नाम पर दर्ज कथित रकम के संबंध में संबंधित अधिकारियों से लिखित स्पष्टीकरण लिया जाए।
– जांच में यह देखा जाए कि किसी वैध सरकारी शुल्क,दंड,विभागीय भुगतान या अन्य खर्च को गलत तरीके से अधिकारी के नाम पर तो नहीं लिखा गया। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध प्रथमदृष्टया साक्ष्य मिलता है,तो सक्षम एजेंसी द्वारा नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाए।
मंत्री रामविचार नेताम ने कहा…लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी : उक्त मामले के संबंध में कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकार आम जनता को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए धनराशि उपलब्ध करा रही है। इसके बाद भी संबंधित विभाग की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जांच के बाद दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। मंत्री के इस बयान से अब प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद बढ़ी है। लेकिन जनहित में यह जरूरी होगा कि जांच केवल बयान तक सीमित न रहे। जांच की समयसीमा तय हो, संबंधित दस्तावेज सुरक्षित किए जाएं और निष्पक्ष रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
यदि निर्माण कार्य में अनियमितता मिलती है तो दोषियों पर कार्रवाई के साथ-साथ सड़क की मरम्मत,गुणवत्ता सुधार और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो : एनएच-343 जैसे राष्ट्रीय महत्व के मार्ग पर निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले अधिकारी और एजेंसियां जिम्मेदार हैं। यदि सड़क लंबे समय से खराब है,तो यह भी जांच का विषय है कि शिकायतों के बावजूद सुधार क्यों नहीं हुआ।
जांच में निम्न अधिकारियों और संस्थाओं की भूमिका का परीक्षण किया जाना चाहिए—
संबंधित राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण/निर्माण एजेंसी।
– परियोजना प्रबंधन और ठेकेदार कंपनी।
– गुणवत्ता नियंत्रण अधिकारी।
– साइट इंजीनियर और पर्यवेक्षण टीम।
– भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारी।
– सड़क रखरखाव और मरम्मत से जुड़े जिम्मेदार विभाग।
यह जरूरी नहीं कि हर खराब सड़क भ्रष्टाचार का परिणाम हो। लेकिन जहां कथित वित्तीय अनियमितता और तकनीकी खामियों के आरोप एक साथ सामने आएं, वहां जिम्मेदारी तय करने के लिए गहन जांच आवश्यक हो जाती है।
सवाल जो अब प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं
– एनएच-343 के निर्माण और मरम्मत में अब तक कितनी राशि खर्च हुई?
– रामानुजगंज-बलरामपुर मार्ग के संबंधित हिस्से की वर्तमान तकनीकी स्थिति क्या है?
– सड़क की गुणवत्ता जांच की अंतिम रिपोर्ट कब तैयार हुई?
– क्या कथित कैश-बुक और वायरल ऑडियो प्रशासन के संज्ञान में हैं?
– क्या कथित रकम के संबंध में किसी विभागीय अधिकारी या कंपनी से पूछताछ हुई?
– 11.39 लाख रुपए के कथित खर्च का वास्तविक स्रोत और भुगतान प्राप्तकर्ता कौन हैं?
– सरकारी पदों के नाम के सामने लिखी रकम का क्या औचित्य है?
– क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी ने कंपनी से नकद भुगतान लिया?
– क्या कथित मीडिया भुगतान विज्ञापन, वैध सेवा या किसी अन्य मद से संबंधित था?
– नाली निर्माण में कंक्रीट कॉम्पैक्शन की निर्धारित तकनीक अपनाई गई या नहीं?
– क्या निर्माण सामग्री के नमूने लेकर स्वतंत्र लैब से जांच कराई जाएगी?
– सड़क की बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है और सुधार की समयसीमा क्या है?
गड्ढों का इलाज चाहिए, कथित ‘मंथली’ का भी हिसाब चाहिए : एनएच-343 पर आम जनता को सिर्फ सड़क नहीं चाहिए,बल्कि सुरक्षित सड़क चाहिए। ग्रामीणों को सिर्फ आश्वासन नहीं,बल्कि आवागमन की सुविधा चाहिए। और सरकारी धन खर्च करने वाली एजेंसियों से सिर्फ कागजी रिपोर्ट नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण निर्माण की जवाबदेही अपेक्षित है। कथित वायरल ऑडियो में 12 लाख रुपए की मंथली का दावा हो या कथित कैश-बुक में 11.39 लाख रुपए का हिसाब—इन दोनों की सच्चाई जांच से ही सामने आएगी। जांच निष्पक्ष होगी तो निर्दोषों पर लगे संदेह दूर होंगे और दोषी होंगे तो कार्रवाई का रास्ता खुलेगा। फिलहाल एनएच-343 पर गड्ढे जनता को दिख रहे हैं। अब प्रशासन को यह दिखाना होगा कि इन गड्ढों को भरने के साथ-साथ कथित लेन-देन के सवालों का भी जवाब कैसे खोजा जाएगा। सड़क की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं तो जांच होनी चाहिए।
सरकारी पदों के नाम पर रकम लिखी है तो हिसाब होना चाहिए। और यदि भ्रष्टाचार सिद्ध होता है,तो कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए कि अगली बार सड़क पर गड्ढे मिलें भी तो उनके पीछे कथित कमीशन का सवाल खड़ा न हो।
फिलहाल वायरल ऑडियो,कथित कैश-बुक और वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित निर्माण कंपनी और विभाग का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आने पर ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।
बैंक और नकद लेन-देन की जांच
यदि कथित भुगतान वास्तविक हैं,तो उनके स्रोत और गंतव्य की जांच होनी चाहिए। इसमें—
– कंपनी के बैंक खाते।
– ठेकेदार और संबंधित एजेंटों के बैंक खाते।
– नकद निकासी की तारीखें।
– भुगतान प्राप्तकर्ताओं के बयान।
– बिल और भुगतान स्वीकृति।
– कंपनी के लेखा विभाग के रिकॉर्ड।
– इन सभी का मिलान किया जाना चाहिए।
निर्माण सामग्री के नमूने लेकर स्वतंत्र परीक्षण
एनएच-343 में उपयोग की जा रही सीमेंट, गिट्टी, कंक्रीट और अन्य सामग्री के नमूने लेकर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र प्रयोगशाला से परीक्षण कराया जाए।
– विशेष रूप से जांच हो…
– सीमेंट की गुणवत्ता।
– कंक्रीट की निर्धारित ग्रेड के अनुरूप मजबूती।
– गिट्टी का आकार और गुणवत्ता।
– पानी और सीमेंट का अनुपात।
– सड़क की मोटाई।
– नाली की मोटाई और ढाल।
– जल निकासी की क्षमता।
– सड़क की सतह और बेस की गुणवत्ता।
थर्ड पार्टी तकनीकी ऑडिट
जांच किसी ऐसे विभागीय अधिकारी से न कराई जाए, जिसका उसी निर्माण कार्य से प्रत्यक्ष संबंध रहा हो। स्वतंत्र तकनीकी संस्था या विशेषज्ञ टीम से सड़क और नाली का परीक्षण कराया जाना चाहिए। इसमें ड्रॉइंग, डिजाइन, डीपीआर, माप पुस्तिका, गुणवत्ता नियंत्रण रिपोर्ट और भुगतान फाइलों का परीक्षण हो।
साइट निरीक्षण और
वीडियो का मिलान

वायरल वीडियो में दिख रहे स्थानों की पहचान कर मौके का निरीक्षण कराया जाए। वीडियो कब बनाया गया, उस समय काम किस चरण में था और बाद में क्या सुधार हुआ—इन सभी बिंदुओं को रिकॉर्ड किया जाए। यदि वीडियो में गुणवत्ता की खामी मिलती है, तो दोषपूर्ण कार्य को सुधारने और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई की जाए।


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