

मनेंद्रगढ़ आबकारी विभाग का नया मॉडल-‘जहां बिक्री कम,वहां सरकारी गाड़ी दम’
सरकारी गाड़ी आखिर जनता के लिए है या ‘स्टॉक एडजस्टमेंट’ के लिए?
-रवि सिंह-
एमसीबी,17 मई 2026 (घटती-घटना)। सरकारी वाहन…नाम सुनते ही दिमाग में एक ऐसी तस्वीर बनती है जिसमें कोई अधिकारी निरीक्षण पर जा रहा हो,कोई टीम छापेमारी कर रही हो, या फिर कोई प्रशासनिक कार्य हो रहा हो, लेकिन मनेंद्रगढ़ में सरकारी गाड़ी का एक नया और अनोखा उपयोग सामने आया है,यहां सरकारी वाहन अब सिर्फ अधिकारियों को ढोने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि शराब की पेटियां ढोने का भी जिम्मा निभाते नजर आए, मंगलवार रात मनेंद्रगढ़ में जो दृश्य देखने को मिला, उसने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए, आरोप है कि विभागीय उपयोग के लिए उपलब्ध सरकारी वाहन का इस्तेमाल केल्हारी शराब दुकान से मनेंद्रगढ़ शराब दुकान तक शराब की पेटियां पहुंचाने में किया गया, मजेदार बात यह रही कि जब इस पूरे मामले पर सवाल उठे तो जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे कोई बड़ी बात मानने के बजाय बेहद सामान्य प्रक्रिया बताने की कोशिश की, अब जनता पूछ रही है क्या आबकारी विभाग में अब ‘जहां शराब नहीं बिके, वहां सरकारी गाड़ी भेजो’ योजना शुरू हो चुकी है?
रात के अंधेरे में चली ‘दारू डिलीवरी सेवा’
मंगलवार रात लगभग 9ः30 बजे मनेंद्रगढ़ अंग्रेजी शराब दुकान के बाहर अचानक एक सरकारी वाहन पहुंचता है, आसपास मौजूद लोग पहले तो समझे कि शायद कोई जांच या निरीक्षण होने वाला है, लेकिन थोड़ी ही देर में गाड़ी से शराब की पेटियां उतरने लगीं, लोगों की हैरानी उस वक्त और बढ़ गई जब पता चला कि यह कोई मालवाहक वाहन नहीं,बल्कि विभागीय उपयोग का सरकारी वाहन था, अब आम आदमी तो यही समझता है कि शराब परिवहन के लिए अलग वाहन,अलग अनुमति और अलग प्रक्रिया होती होगी। लेकिन मनेंद्रगढ़ में लगता है कि ‘व्यवस्था’ नियम पुस्तिका से नहीं, मौके की जरूरत से चलती है।
नियमों की किताब बनाम ‘व्यवस्था का ज्ञान’ में नियम में मना नहीं वाला तर्क कितना सही?- प्रशासनिक व्यवस्था केवल उन नियमों से नहीं चलती जिनमें ‘मना’ लिखा हो, बल्कि उन सिद्धांतों से भी चलती है जिनमें सरकारी संसाधनों के उचित उपयोग की भावना शामिल होती है, यदि यही तर्क हर विभाग अपनाने लगे कि ‘कहीं मना नहीं लिखा ‘, तो फिर सरकारी गाडि़यों का उपयोग किसी भी काम में किया जा सकता है, व्यंग्य यही है कि अब शायद विभागों को नई गाइडलाइन जारी करनी पड़े, सरकारी वाहन से सब्जी नहीं लानी है, फर्नीचर नहीं ढोना है, निजी सामान नहीं पहुंचाना है, और अब शायद यह भी लिखना पड़े कि शराब की पेटियां भी नहीं ढोनी हैं।
शराब परिवहन क्या इतना आसान मामला है?- शराब कोई सामान्य वस्तु नहीं है, आबकारी विभाग में शराब की हर बोतल और हर पेटी का रिकॉर्ड रखा जाता है। स्टॉक, बिक्री, ट्रांसफर, बैच नंबर, टैक्स सब कुछ दस्तावेजों में दर्ज होता है, ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है क्या इस ट्रांसफर की लिखित अनुमति थी? क्या स्टॉक ट्रांसफर का रिकॉर्ड मौजूद है? क्या परिवहन के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन हुआ? क्या सरकारी वाहन को अधिकृत मालवाहक माना गया? यदि रास्ते में कोई हादसा हो जाता तो जिम्मेदारी किसकी होती? इन सवालों का जवाब फिलहाल धुंध में है, लेकिन विभाग का आत्मविश्वास साफ दिख रहा है।
सरकारी वाहन : अब ‘मल्टीपर्पज सुविधा’- सरकारी गाड़ी का उपयोग किसलिए होता है, यह अब शायद विभागीय जरूरत तय करेगी, आज शराब की पेटियां ढोई जा रही हैं, कल शायद कोई और सामान भी ‘जरूरत’ के नाम पर ढोया जाए, क्योंकि जब तर्क यह हो कि ‘नियम में मना नहीं है’,तो फिर संभावनाएं असीमित हो जाती हैं, जनता अब मजाक में पूछ रही है क्या सरकारी वाहनों पर अब ‘ऑन ड्यूटी’ की जगह ‘ऑन डिलीवरी’ लिख दिया जाए?
सवाल सिर्फ शराब का नहीं, मानसिकता का है- इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात शराब की कुछ पेटियां नहीं, बल्कि वह सोच है जो इसे सामान्य मान रही है, यदि विभागीय अधिकारी खुद सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर इतने सहज हैं, तो नीचे स्तर पर क्या संदेश जाएगा? जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग नियमों की व्याख्या सुविधा अनुसार करने लगें, तो फिर विभागीय अनुशासन धीरे-धीरे मजाक बन जाता है।
सरकारी लॉगबुक क्या कहती है?-
सरकारी वाहनों के उपयोग का रिकॉर्ड रखा जाता है, वाहन कहां गया, कितनी दूरी चली, किस काम से गई — सब दर्ज होता है, अब बड़ा सवाल यह है क्या उस वाहन की लॉगबुक में लिखा गया कि वह शराब ट्रांसफर करने गई थी? यदि लिखा गया, तो किस अधिकारी की अनुमति से? और यदि नहीं लिखा गया, तो फिर वाहन आखिर किस काम से दर्ज हुई? यानी मामला अब सिर्फ शराब की पेटियों का नहीं, सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता का भी बन चुका है।
आबकारी विभाग की ‘रचनात्मक व्यवस्था’– मनेंद्रगढ़ का यह मामला अब लोगों के बीच व्यंग्य का विषय भी बन चुका है, लोग कह रहे हैं कि अब आबकारी विभाग सिर्फ शराब बेचने का काम नहीं करेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद होम डिलीवरी भी करेगा, कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सरकारी गाड़ी में शराब पहुंची है, कल को शायद ऑनलाइन डिलीवरी ऐप भी शुरू हो जाए, हालांकि यह व्यंग्य है, लेकिन इसके पीछे जनता का अविश्वास साफ दिखाई देता है।
नियमों से ज्यादा ‘मैनेजमेंट’ पर भरोसा?- यह पूरा मामला यह भी बताता है कि कई विभागों में अब काम नियम पुस्तिका से कम और ‘मैनेजमेंट’ से ज्यादा चल रहा है, जहां जो सुविधा दिखी, उसी से काम निकाल लिया गया, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था सुविधा से नहीं, प्रक्रिया से चलती है, क्योंकि एक बार प्रक्रिया कमजोर हुई तो फिर हर गलत काम के लिए एक नया बहाना तैयार हो जाता है।
अधिकारी का बयान,कुछ पेटी नहीं बिक रही थी, नियम में मना नहीं है…
जिला आबकारी अधिकारी के बयान ने बढ़ाया विवाद-इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा अब एमसीबी जिला आबकारी अधिकारी शशिकला पैकरा के उस बयान की हो रही है,जिसमें उन्होंने सरकारी वाहन से शराब ढोने की घटना को गलत मानने से लगभग इनकार कर दिया,मीडिया से बातचीत में उनका कहना था कि केल्हारी शराब दुकान में कुछ पेटी शराब की बिक्री नहीं हो रही थी,इसलिए उसे दूसरे शराब दुकान में शिफ्ट कर दिया गया, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल नहीं है जिसमें लिखा हो कि शराब को शासकीय वाहन में नहीं ढोया जा सकता, अब यही बयान पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है, क्योंकि सवाल केवल शराब की कुछ पेटियों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच और सरकारी संसाधनों के उपयोग की मर्यादा का है, यानी अब सरकारी वाहन सिर्फ निरीक्षण नहीं करेंगे, बल्कि ‘सेल बढ़ाने’ का काम भी करेंगे, अगर इसी तर्क को आगे बढ़ाया जाए तो आने वाले दिनों में शायद विभाग यह भी कह दे जहां ग्राहक कम होंगे, वहां सरकारी वाहन प्रचार वाहन बनकर जाएंगे।
‘कुछ पेटी’ का खेल या स्टॉक एडजस्टमेंट की कहानी?
सूत्रों की मानें तो मामला सिर्फ ‘कुछ पेटियों’ तक सीमित नहीं हो सकता। जानकारों का कहना है कि कई बार स्टॉक एडजस्टमेंट, कम बिक्री और रिकॉर्ड मैनेजमेंट के नाम पर कई तरह के खेल चलते हैं।हालांकि इस मामले में अभी किसी अवैध बिक्री या बड़े घोटाले का प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि पूरा काम असामान्य तरीके से हुआ, अगर सब कुछ नियम अनुसार था तो रात में ही ट्रांसफर क्यों? सरकारी वाहन ही क्यों? अधिकृत परिवहन वाहन क्यों नहीं?
जनता की नजर में बढ़ी शंका
मनेंद्रगढ़ में अब इस पूरे मामले की चर्चा चाय दुकानों से लेकर बाजार तक हो रही है, लोगों का कहना है कि अगर आम आदमी सरकारी गाड़ी में शराब लेकर घूमता मिलता तो अब तक पुलिस केस दर्ज हो चुका होता, लेकिन यहां सरकारी गाड़ी खुद शराब पहुंचा रही है, ही वजह है कि मामला सिर्फ विभागीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता का विषय बन गया है।
क्या शासन लेगा संज्ञान?
अब निगाह शासन और वरिष्ठ अधिकारियों पर है, लोग जानना चाहते हैं कि क्या मामले की जांच होगी? क्या वाहन उपयोग की समीक्षा होगी? क्या स्टॉक ट्रांसफर रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे? या फिर मामला ‘कुछ पेटी नहीं बिक रही थी’ कहकर खत्म कर दिया जाएगा? क्योंकि यदि इस तरह के मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो भविष्य में सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग को रोकना और मुश्किल हो जाएगा।
आखिर में…
मनेंद्रगढ़ का यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल छोड़ गया है, सरकारी वाहन जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं,उनका उपयोग जनहित और विभागीय कार्यों के लिए होना चाहिए, लेकिन जब वही वाहन शराब की पेटियां ढोते नजर आएं और अधिकारी उसे सामान्य बताते दिखें,तो सवाल उठना स्वाभाविक है, फिलहाल आबकारी विभाग के पास तर्क है शराब नहीं बिक रही थी,इसलिए दूसरी दुकान भेज दी, लेकिन जनता के पास भी एक सवाल है अगर हर विभाग इसी तर्क पर काम करने लगे, तो फिर सरकारी और निजी काम में फर्क आखिर बचेगा क्या? मनेंद्रगढ़ में इस वक्त यही चर्चा है कि सरकारी गाड़ी आखिर ‘निरीक्षण वाहन’ है या ‘दारू एक्सप्रेस ‘।
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