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बैकुंठपुर@कोरिया में ‘नया नियम’? नहर की जमीन पर कब्जे को भी मिल सकती है NOC

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  • पहले बताया अतिक्रमण,अब दे दी अनापत्तिः कोरिया में नहर भूमि विवाद पर बड़ा खुलासा
  • कोरिया बना नया उदाहरणःनहर की जमीन पर कब्जे को विभाग की ‘हरी झंडी’
  • पहले अतिक्रमण हटाने की बात,अब जारी कर दी एनओसी-जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता की भूमिका पर उठे सवाल
  • हाईकोर्ट में मामला लंबित,फिर भी जारी हो गई एनओसी – कौन है जिम्मेदार?
  • नहर की सरकारी जमीन पर कब्जा और अनापत्ति प्रमाण पत्र ! कोरिया में नियमों को खुली चुनौती
  • नहर की जमीन पर एनओसी! कोरिया में नियमों को ठेंगा,जल अधिनियम पर बड़ा सवाल
  • अतिक्रमण हटाने की जगह मिला प्रमाण पत्र! जल संसाधन विभाग की भूमिका पर सवाल
  • नहर की सरकारी जमीन पर कब्जा और अब अनापत्ति प्रमाण पत्र! प्रशासन कटघरे में…
  • पहले दो बार कहा अवैध,अब दे दी अनुमति — कोरिया में नहर भूमि विवाद ने उठाए बड़े सवाल
  • क्या कार्यपालन अभियंता कानून से ऊपर? नहर
  • की जमीन पर एनओसी से मचा हड़कंप…

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,09 मार्च 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले में जल संसाधन विभाग से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है,जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,आरोप है कि जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने नहर की शासकीय भूमि पर किए गए एक कथित अवैध अतिक्रमण को ही अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी कर दिया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस अधिकारी ने लगभग ढाई वर्ष पहले उसी निर्माण को अवैध बताते हुए न केवल अनापत्ति देने से इनकार किया था बल्कि अतिक्रमण हटाने के लिए प्रशासन को पत्र लिखा था,उसी अधिकारी द्वारा अब उसी भूमि पर अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया है। इससे पूरे मामले में कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं।
ग्राम भांडी में नहर की भूमि पर विवाद
यह पूरा मामला जिला मुख्यालय बैकुंठपुर से लगे ग्राम पंचायत भांडी का बताया जा रहा है, जानकारी के अनुसार पूर्व सरकार के समय एक जनप्रतिनिधि द्वारा नहर की भूमि पर एक समाज विशेष के लिए चबूतरा निर्माण का भूमि पूजन किया गया था, बताया जाता है कि इसके बाद जून के पहले सप्ताह में देर रात नहर की भूमि पर दीवार खड़ी कर वहां एक मूर्ति स्थापित कर दी गई। स्थानीय किसानों ने इसका विरोध करते हुए इसे शासकीय नहर भूमि पर अवैध कब्जा बताया और मामला तहसील न्यायालय तक पहुंच गया।
तहसीलदार ने दिया अतिक्रमण हटाने का आदेश- मामले में तहसीलदार बैकुंठपुर ने शासकीय भूमि पर अतिक्रमण का प्रकरण दर्ज किया और सभी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा, इस दौरान जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ने एक बार फिर लिखित रूप से बताया कि यह नहर की भूमि पर अतिक्रमण है और इसे हटाया जाना चाहिए, लंबी सुनवाई के बाद जून 2024 में तहसीलदार बैकुंठपुर ने निर्णय देते हुए उक्त निर्माण को अवैध अतिक्रमण मानते हुए अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी किया।
अपीलें भी हुईं खारिज
तहसीलदार के आदेश के खिलाफ अतिक्रमणकर्ता ने पहले एसडीएम बैकुंठपुर के समक्ष अपील की, जिसे खारिज कर दिया गया,इसके बाद मामला सरगुजा संभाग के कमिश्नर के पास द्वितीय अपील में पहुंचा, कमिश्नर ने मई 2025 में कुछ दस्तावेजों की कमी बताते हुए मामले को पुनः तहसीलदार को भेज दिया और प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
कई सवाल अब भी अनुत्तरित
– क्या कार्यपालन अभियंता द्वारा पहले जारी किए गए पत्र गलत थे या वर्तमान में जारी की गई एनओसी?
– क्या विभागीय अधिकारी न्यायालय की प्रक्रिया से ऊपर हैं?
एसडीएम ने मांगा था विभाग से अभिमत
मामले के सामने आने के बाद तत्कालीन एसडीएम बैकुंठपुर ने जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ए. टोप्पो को पत्र लिखकर अनापत्ति प्रमाण पत्र के संबंध में विभागीय अभिमत मांगा था, दिनांक 12 जून 2023 को कार्यपालन अभियंता द्वारा लिखित रूप से एसडीएम को बताया गया कि उक्त निर्माण सिल्फोडा जलाशय की माइनर नहर की भूमि पर किया गया अतिक्रमण है और इसे किसी भी स्थिति में अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया जा सकता।
राजस्व जांच में भी अतिक्रमण की पुष्टि
एसडीएम बैकुंठपुर ने मामले की जांच के लिए राजस्व निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी, राजस्व निरीक्षक द्वारा पंचनामा,नक्शा और खसरा के आधार पर दी गई रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट किया गया कि संबंधित भूमि नहर की शासकीय भूमि है और उस पर अतिक्रमण किया गया है, इसके बाद एसडीएम ने मामले को तहसीलदार के पास भेजते हुए आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए।
मामला पहुंचा हाईकोर्ट
प्रकरण लंबे समय तक लंबित रहने के कारण शिकायतकर्ता कृषक ने उच्च न्यायालय बिलासपुर में अवमानना याचिका भी दायर की है, जो वर्तमान में विचाराधीन है,बताया जाता है कि इससे पहले भी अतिक्रमणकर्ता द्वारा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी,जहां न्यायालय ने अवैध निर्माण को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी और जुर्माना लगाने तक की चेतावनी दी थी।
अब जारी हो गया अनापत्ति प्रमाण-पत्र
इन सभी घटनाक्रमों के बीच जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ए. टोप्पो द्वारा उसी भूमि पर अचानक अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया है,अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब पहले विभाग स्वयं इस निर्माण को अवैध अतिक्रमण बता चुका है,तो अब उसी भूमि पर एनओसी किस आधार पर जारी की गई।
नियमों का क्या कहते हैं प्रावधान
जल संसाधनों से संबंधित प्राकृतिक या कृत्रिम संरचनाओं जैसे नहर,जलाशय और जल मार्ग की भूमि पर बिना अनुमति किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करना नियमों के विरुद्ध माना जाता है, ऐसे मामलों में अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ आर्थिक दंड और कारावास का भी प्रावधान है।
स्थानीय लोगों में नाराजगी
इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय किसानों और ग्रामीणों में नाराजगी देखी जा रही है,उनका कहना है कि प्रशासन जानबूझकर मामले को लंबित रखे हुए है और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं कर रहा है,ग्रामीणों का आरोप है कि पहले अतिक्रमण करने वाले लोग पूर्ववर्ती सरकार के करीब थे और अब वर्तमान सरकार में भी प्रभावशाली लोगों की मदद से मामले को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। आखिर कब तक इस विवाद का समाधान होगा और अतिक्रमण पर कार्रवाई होगी? अब देखना यह होगा कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाती है या नहीं।


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