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सूरजपुर@ प्रशासन चाहे कितना भी मुस्तैद हो,हम तो चूना लगाएंगे ही, शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में बड़ा घोटाला?

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  • कागज़ों में 65 हजार मि्ंटल, ज़मीनी हकीकत में धान नदारद…जांच से क्यों बच रहा केंद्र
  • करोड़ों के भ्रष्टाचार कि आरोपी के हाथो में प्रबंधक की कमान
  • धान का भौतिक सत्यापन नहीं करोड़ों की फर्जी खरीदी कागजों पर
  • नियम कानून ताक पर, प्रशासन के मुस्तैदी के बावजूद बड़े घोटाले की आशंका
  • धान खरीदी के आंकड़े फर्जी? जांच हो तो शिवप्रसाद नगर केंद्र के स्टॉक और रिकॉर्ड में मिल सकता है भारी अंतर
  • उठाव शुरू होते ही खुला धान घोटाले का खेल शिवप्रसाद नगर खरीदी केंद्र जांच से क्यों दूर?
  • खरीदी केंद्र या माफिया अड्डा? शिवप्रसाद नगर में धान पहुंचा बिना ही भुगतान का खेल
  • ₹26 में खरीद, ₹31 में भुगतान! शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र पर माफिया राज के आरोप
  • धान नहीं, सिर्फ एंट्री! शिवप्रसाद नगर खरीदी केंद्र में कागज़ी खरीदी का आरोप
  • धान कम, संरक्षण ज्यादा? शिवप्रसाद नगर खरीदी केंद्र पर जांच की हिम्मत किसी में नहीं
  • गोदाम खाली, रिकॉर्ड भरे शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र पर बड़ा सवाल
  • सरकार खरीदे धान, माफिया बेचे काग़ज़ शिवप्रसाद नगर खरीदी केंद्र की असली तस्वीर


ओंकार पाण्डेय
सूरजपुर, 06 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
शिवप्रसाद नगर का धान खरीदी केंद्र एक बार फिर गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में है, स्थानीय किसानों,सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यहां धान खरीदी के नाम पर कागज़ी आंकड़ों और वास्तविक भंडारण के बीच भारी अंतर बताया जा रहा है,शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में घोटाले की बात हर वर्ष की भांति आम हो चली है, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जितनी धान खरीदी दर्शाई जा रही है,क्या उतनी धान वास्तव में समिति के पास मौजूद भी है? जब से खरीदी केंद्र से डीओ कटना प्रारंभ हुआ है,और समिति से धान उठाव की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है,तब से बड़े पैमाने पर कागजों में फर्जी धान खरीदी को अंजाम दिया जा रहा है। इस वर्ष धान खरीदने के लिए सरकार और प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया था। प्रारंभिक स्तर पर टोकन की सीमित मात्रा कटने मात्र से ही लगभग अधिकांश किसानों का उपार्जित धान खरीदी किया जा चुका है, आलम यह है कि जो वास्तव में किसान है,वह अपना धान बेच चुके हैं, और अब उनके पास धान की उपलब्धता नहीं है, यह बात दीगर है कि चुनावी लाभ लेने के लिए सरकार ने प्रति एकड़ 21 क्विंटल की धान खरीदी का मानक तय किया गया है,परंतु वास्तविकता यह है कि असामान्य भूमि संरचना और उन्नत तकनीक के अभाव में किसान औसतन 15-16 क्विंटल धान ही उपार्जित कर पाते हैं, हर वर्ष होता यह आया था की किसान अपने उपार्जित फसल को बेचने के बाद भी रकबा खाली रह जाता था,जिसमें व्यापारी, बिचौलिए और समिति के कर्मचारी राइसमिलों से मिलीभगत कर फर्जी धान खरीदी को अंजाम देते थे,फलस्वरुप धान खरीदी के अंत तक खरीदी की मात्रा लाखों मीट्रिक टन हो जाया करती थी। पर इस वर्ष प्रशासन की मुस्तैदी के चलते अधिकांश धान खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार की यह व्यवस्था सक्रिय नहीं हो पाई है। परंतु सूत्रों के अनुसार ‘आदतन लोग बाज नहीं’ आते इस तर्ज पर शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में फर्जी धान खरीदी का बड़ा भ्रष्टाचार करने की सूचना प्राप्त हुई है।
आंकड़े कुछ और, ज़मीन पर सच्चाई कुछ और- सूत्रों के मुताबिक शिव प्रसाद नगर धान खरीदी में अब तक लगभग 65,000 मि्ंटल धान की खरीदी कागज़ों में दिखाई जा चुकी है, जबकि करीब 2,000 मि्ंटल का उठाव भी दर्ज है, लेकिन केंद्र की वास्तविक स्थिति यह बताती है कि समिति परिसर में उतना धान मौजूद ही नहीं है, जितना धान खरीदी होना बताया जा रहा है। यदि इस समय भौतिक सत्यापन कराया जाए, तो खरीदी और स्टॉक में बड़ा अंतर सामने आ सकता है। सुत्रों के अनुसार शिवप्रसाद नगर धान खरीदी में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया है, और केवल कागजों में ही खरीदी को अंजाम दिया गया है।अंतिम चरण में ‘उठाव’ के साथ तेज़ हुआ खेल- धान खरीदी अपने अंतिम चरण में है, इसी दौरान उठाव (लिफ्टिंग) शुरू होते ही भ्रष्टाचार का कथित खेल तेज हो गया है, आरोप है कि धान केंद्र तक पहुंच नहीं रहा, लेकिन रिकॉर्ड में खरीदी पूरी दर्ज हो रही है, उठाव के नाम पर कागज़ी संतुलन बनाया जा रहा है। किसानों के रकबे पर पूरा टोकन तो काटा जा रहा है, परंतु समिति तक धान पहुंच नहीं रहा और सायं काल होते-होते प्रति दिवस पूरी खरीदी दर्शा दी जा रही है, जिन किसानों के पंजीयन अनुसार उनके खाते में खरीदी दर्शाइ जा रही है, उनके एटीएम और एडवांस चेक पहले ही रसूखदार व्यक्ति द्वारा जारी करवा लिया गया है, जिससे कि फर्जी धान खरीदी के रुपए आहरण में किसी प्रकार का व्यवधान ना आने पाये।
खाली रकबे, भरे रिकॉर्ड, किसानों के नाम पर माफिया– स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप है कि कई किसानों के रकबे खाली पड़े हैं, फिर भी उन्हीं किसानों के नाम पर धान खरीदी दिखाई जा रही है, बताया जा रहा है कि धान माफिया किसानों के नाम का इस्तेमाल कर धान खपा रहा है, जिससे वास्तविक किसानों का हक¸ प्रभावित हो रहा है और शासन को सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है, बड़ी मात्रा और बड़ी खरीदी के फर्जीवाड़े के लिए टोकन भी उन्हीं किसानों का काटा जा रहा है, जिससे फर्जी धान खरीदी करवा कर प्रत्यक्ष लाभ लिया जा सके। ऐसे में वास्तविक किसान चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
‘हदीस’ नामक धान माफिया का दबदबा- सूत्रों के अनुसार शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में धान माफिया ‘हदीस’ का नाम खुलकर सामने आ रहा है। और यह पहली बार नहीं है, बल्कि कई वर्षों से यह व्यक्ति शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में अपनी अपरोक्ष संदिग्ध भूमिका निभाते आ रहा है। आरोप हैं कि केंद्र प्रभारी से लेकर समिति प्रबंधक तक उसी के इशारों पर काम करते हैं, बिना तौल, बिना सख्त जांच सीधे धान चढ़ा दिया जाता है। किसे प्रभारी बनाना है, किसे हटाना है, फैसले भी उसी के प्रभाव में होते हैं, कहा जा रहा है कि यह नेटवर्क आज का नहीं बल्कि वर्षों पुराना है। जिसकी वजह से यहां बार-बार केंद्र प्रभारी और समिति प्रबंधक बदलने की मांग उठती रही है, विगत कुछ वर्षों से इस व्यक्ति की एक करीबी महिला बतौर प्रबंधक समिति का कार्य देख रही हैं। जिन पर विगत वर्ष बड़े पैमाने पर पशु लोन के नाम पर करोड़ों का फर्जीवाड़ा का मामला दर्ज किया गया था। जिसमें उक्त महिला को जेल तक जाना पड़ा था, बावजूद इसके इतने बड़े प्रकरण के बाद भी इस महिला को प्रबंधक का कमान देना पूरे सिस्टम को संदेह के घेरे में खड़ा करता है, प्रत्येक समिति में समिति प्रबंधक के अलावा धान खरीदी प्रभारी की भी भूमिका अहम होती है। शिवप्रसाद नगर समिति में विगत वर्ष समिति प्रबंधक के करोड़ों के घोटाले के उजागर होने के अलावा समिति में और भी कर्मचारी हैं, जो धान माफिया को परोक्ष अपरोक्ष रूप से लाभ पहुंचा रहे हैं। इसी में एक नाम सोहराब का है, जो कि समिति में पदस्थ होने के साथ-साथ धान खरीदी में अहम भूमिका निभाता है। हदीस नामक व्यक्ति के साथ इसके गठजोड़ की भी चर्चाएं आम है। और सूत्रों के अनुसार इस पर भी फर्जी धान खरीदी के प्रकरण में संलिप्त होने की पूरी आशंका है।
₹26 में खरीद, ₹31 में भुगतान…सरकारी खजाने पर चोट- आरोपों के मुताबिक माफिया ₹25 प्रति किलो की दर से धान खरीदता है, लेकिन ₹31 प्रति किलो के सरकारी रेट से किसानों के खातों से भुगतान निकलवा लेता है, इसके लिए किसानों का एक संगठित गिरोह काम करता है, जो नाम उधार देने से लेकर फर्जी एंट्री तक में शामिल बताया जा रहा है। इस पूरे खेल में सरकारी खजाने को लाखों-करोड़ों के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
बोरियों में भी गड़बड़ी के आरोप- सिर्फ धान ही नहीं, बोरियों (सैक) को लेकर भी अनियमितताओं के आरोप हैं। बताया जा रहा है कि धान पहुंचता नहीं, लेकिन बोरियां समिति से किसानों के नाम पर निकाल दी जाती हैं। बोरियों की घर-पकड़ (रिकवरी) भी नहीं हो रही।
जांच से क्यों डर?- प्रशासन पर भी सवाल सबसे गंभीर आरोप यह है कि अन्य धान खरीदी केंद्रों में जांच दल भेजे जा रहे हैं, कई समितियां में तो आलम यह है कि प्रशासनिक अधिकारी डेरा जमा कर बैठे हैं, एक दिन में कई कई फेरे लगा रहे हैं, दिन में, रात में अवैध धान पकड़कर प्रशासन के सुपुर्द कर रहे हैं, लेकिन शिवप्रसाद नगर ऐसा केंद्र बन गया है, जहां प्रशासनिक अधिकारियों की जांच की हिम्मत नहीं हो पा रही, सूत्रों का दावा है कि प्रशासन को सब कुछ पता होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही. यह मिलीभगत का परिणाम हो सकता है। यहां तक कि माफिया खुलेआम यह कहता फिर रहा है कि “कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार सब सेट हैं”—हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पहले भी हो चुकी हैं कार्रवाइयां- बताया जाता है कि इससे पहले भी धान खरीदी में अनियमितताएं सामने आई थीं, एक खरीदी प्रभारी पर अपराध दर्ज हुआ था, जेल जाने की नौबत तक आई थी, इसके बावजूद वही नेटवर्क आज भी सक्रिय बताया जा रहा है, जिससे सवाल उठता है कि कार्रवाई टिकाऊ क्यों नहीं हो पाती? विगत सत्र में पशु लोन के नाम पर करोड़ों का फर्जीवाड़ा पकड़ में आया था, जिस पर एफआईआर भी दर्ज हुई थी और महिला प्रबंधक साधना कुशवाहा को जेल तक जाना पड़ा था। इतने बड़े पैमाने पर प्रकरण के उजागर होने के बाद भी ऐसे ही कर्मचारियों को कमान देना विभागीय उदासीनता का प्रतीक नजर आता है।
अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर- यदि इन गंभीर आरोपों के बाद भी भौतिक सत्यापन, स्टॉक मिलान और भुगतान जांच नहीं होती, तो यह संदेह और गहरा जाएगा कि कहीं यह केंद्र संरक्षण के घेरे में तो नहीं। अब देखना यह है कि खबर के प्रकाशन के बाद प्रशासन हरकत में आता है या नहीं, क्योंकि जांच हुई तो तय है कागज़ और गोदाम के बीच का फर्क सामने आएगा, और अगर नहीं हुई, तो आरोपों को और भी मजबूती मिलेगी कि धान खरीदी के नाम पर एक संगठित खेल बेखौफ चल रहा है, जो सरकार को करोड़ों का चूना लगाने में संलिप्त है।


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