दैनिक घटती-घटना की खबर का असर: जंगल से जुआ का तंबू उखड़ा,क्या पुलिस ने संरक्षण से हाथ खींच लिया?
खबर प्रकाशित होते ही जुआरी पत्रकारों को ‘जारी’ की गुहार,लेकिन कलम नहीं रुकी…
सवाल—जब फड़ बंद हुआ तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
-शमरोज खान-
सूरजपुर,18 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। जिला सूरजपुर के मानी-उदयपुर सीमा पर स्थित जंगल में तंबू लगाकर जुआ फड़ संचालित हो रहा था,जिस खबर को दैनिक घटती-घटना ने 16-17 नवंबर को प्रकाशित किया था जिसमें जंगल-जुआ रैकेट का खुलासा किया था। उसका असर अब खुलकर सामने आ गया है,जंगल में लगा लाखों का जुआ तंबू अचानक उखड़ गया,फड़ बंद हो गया,और पूरा नेटवर्क भूमिगत हो गया,सूत्रों के अनुसार,जिस गिरोह को अब तक ‘सुरक्षित संरक्षण’ प्राप्त था,वही लोग अब जारी को कहने लगे अब बंद कर दो…अब हम तुम्हारा साथ नहीं दे पाएंगे। यानी खबर छपने के बाद जिस पुलिस संरक्षण की चर्चा थी, वह अचानक खत्म हो गया, दैनिक घटती-घटना को मिली जानकारी के अनुसार, चार पत्रकारों को लगातार फोन कर खबर न छापने की गुहार लगाई गई,लेकिन अखबार ने अपनी कलम नहीं रोकी,नतीजा तंबू उखड़ा,जुआ बंद…लेकिन कार्रवाई आज भी शून्य।
जंगल में तंबू, तंबू के नीचे करोड़ों का जुआ,क्या पुलिस खुद ‘संरक्षक’? यह सवाल अब और तेज़
सूरजपुर-उदयपुर सीमा के मानी जंगल में एक विशाल तंबू लगाकर हर दिन 40-50 जुआरी करोड़ों का दांव लगाते थे,यह नेटवर्क साधारण नहीं चार दिनों में 1 करोड़ से ज्यादा की कमाई,और यह पूरा ऑपरेशन संचालित करता था शमशेर खान गिरोह…
सबसे बड़ा सवाल: पुलिसकर्मी का भाई शामिल? क्या यह था ‘सुरक्षा कवच’
सूत्र बताते हैं कि गिरोह में साइबर सेल के एक पुलिसकर्मी का भाई भी सक्रिय था, ग्रामीणों का सवाल…क्या इसी रिश्तेदारी के कारण जुआ फड़ पर छापा नहीं पड़ा?
स्थानीय लोगों की दहाड़: इतनी बड़ी गतिविधि पुलिस को भनक न लगे? या पुलिस सब जानती थी?
चर्चा है तंबू चार दिन पहले लगा,रोज़ 40-50 जुआरी पहुंचे,करोड़ों का दांव लगा,कई क्रॉस-बॉर्डर खिलाड़ी आए,पर पुलिस मौन रही,क्या यह संरक्षण बिना किसी ‘ऊपर से इशारे’ के संभव था?
दैनिक घटती-घटना की खबर के बाद अचानक तंबू उखड़ा, लेकिन एफआईआर/छापा क्यों नहीं?
खबर छपते ही—तंबू उखड़ गया,पूरा गैंग भाग गया,खेल बंद हो गया, लेकिन कार्रवाई अब भी शून्य,ग्रामीणों ने सवाल उठाया जब जुआ चल रहा था तब पुलिस सोई थी,अब बंद हुआ तो कार्रवाई की हिम्मत क्यों नहीं?
जुआरी का रोना…पत्रकारों को फोन करके खबर रोकने की कोशिश
रिपोर्ट के अनुसार, जारी ने चार पत्रकारों को फोन कर कहा—भाई खबर मत छापिए.. हम पर दबाव है… स्थिति संभालने में मदद कीजिए लेकिन जब खबर छपी, तो जिन पुलिसकर्मियों पर संरक्षण देने का आरोप था, उन्होंने ही कहा ‘अब बंद कर दो.. आगे हमारा सहयोग नहीं ले पाओगे। दैनिक घटती-घटना ने स्पष्ट किया है कि यह ‘सूत्र जानकारी’ है, अखबार इसकी पुष्टि नहीं करता।
पार्षद और पुलिस परिवार की भागीदारी लोकतंत्र का पतन…पुलिस अनुशासन का अपमान…
पार्षद का नाम इस रैकेट में आना,और पुलिसकर्मी के भाई का शामिल होना,यह सिर्फ कानून का नहीं,समाज और व्यवस्था का अपमान है।
हज से लौटा संचालक…जिसने खुद कहा था “जुआ हराम है”… अब फिर फड़ चला रहा…
संचालक हज करने के बाद बोला था जुआ हराम है,मैं छोड़ रहा हूँ। लेकिन वही व्यक्ति आज फिर फड़ में शामिल है,यह सांस्कृतिक और धार्मिक ढोंग का सबसे बड़ा उदाहरण है।
स्थानीय मांग:तत्काल छापा,उच्चस्तरीय जांच… शामिल सभी नामों की हो गिरफ्तारी…
चाहे पार्षद हो,चाहे पुलिसकर्मी के परिवार से हो, या बाहरी राज्य का खिलाड़ी जनता की मांग साफ़ है “बिना संरक्षण कोई जुआ फड़ इतना बड़ा नहीं चलता। जांच हो…और निष्पक्ष हो।
गिरोह में शामिल नाम (सूत्रों के अनुसार)
शमशेर खान (मुख्य संचालक)
विवेक
मशहूर उर्फ छोटे खान
राजकुमार
बबलू
दो बाहरी राज्य के खिलाड़ी
पुलिस पर सबसे बड़े प्रश्न अब ये हैं:-
क्या पुलिस को जुआ फड़ की जानकारी नहीं थी?
या पुलिस जानकर भी अनदेखी कर रही थी?
क्या जुआ संचालकों और पुलिस के बीच कोई गुप्त सांठगांठ है?
क्या सीमा विवाद पुलिस के लिए एक बचाव कवच था?
खबर छपते ही तंबू उखड़ा — क्या यह प्रमाण नहीं कि संरक्षण था?
अगर जुआ बंद हो सकता है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो सकती?
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