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भैयाथान/सूरजपुर@60 दिनों से लंबित रिश्वत प्रकरण: सबूत सामने, कार्यवाही कहां अटकी?

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भैयाथान रिश्वत प्रकरण पर प्रशासनिक चुप्पी आखिर क्यों?

-ओंकार पाण्डेय-
भैयाथान/सूरजपुर,10 नवंबर 2025 (घटती-घटना)।
भैयाथान तहसील में कथित रिश्वत मांगने के प्रकरण पर कार्यवाही में देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता सौरभ प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत ऑडियो,वीडियो और दस्तावेज़ सार्वजनिक हो चुके हैं,लेकिन अब तक न विभागीय जांच आगे बढ़ सकी है और न ही एफआईआर दर्ज की गई है। शिकायत में तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर और नगर सैनिक संजय मिश्रा पर भूमि सीमांकन प्रकरण के बदले 1 लाख रुपये और एक आई पैड मांगने का आरोप है। शिकायतकर्ता के अनुसार,रिश्वत देने से मना करने पर सीमांकन प्रकरण को हस्ताक्षर अपूर्ण बताकर निरस्त कर दिया गया। हालाँकि,उपलब्ध रिकॉर्ड में आरआई लक्ष्मी खलखो की रिपोर्ट में संबंधित पक्षों के हस्ताक्षर और कब्जे की स्थिति स्पष्ट पाई गई।
इस मामले को स्थानीय पत्रकार द्वारा रिपोर्ट किए जाने पर,तहसीलदार शिव नारायण राठिया द्वारा पत्रकार को मानहानि का नोटिस जारी किया गया। इससे प्रशासनिक मंशा और मीडिया स्वतंत्रता पर भी प्रश्न उठने लगे हैं, अब तक जिला प्रशासन की ओर से इस संबंध में न तो कोई आधिकारिक बयान दिया गया है और न ही जांच की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की गई है,स्थानीय नागरिक और शिकायतकर्ता प्रशासन से स्पष्ट और समयबद्ध निर्णय की अपेक्षा कर रहे हैं। भैयाथान रिश्वत प्रकरण पर प्रशासन की चुप्पी आखिर क्या संकेत देती है? भैयाथान में पूर्व तहसीलदार संजय राठौर के विरुद्ध लगाए गए रिश्वत के आरोपों को 60 दिन से अधिक बीत चुके हैं। शिकायतकर्ता सौरभ प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत ऑडियो, वीडियो और लिखित साक्ष्य सार्वजनिक हो चुके हैं,परंतु जांच,निलंबन या एफआईआर जैसी स्पष्ट कार्यवाही अब तक सामने नहीं आई। यही स्थिति प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
क्या प्रशासन एकमत है या मौन भी एक संदेश है?
शहर में चर्चा यह है कि विवादित अधिकारी के प्रति किसी स्तर पर संरक्षण का विश्वास होने के कारण कानूनी प्रक्रिया ठहरी हुई प्रतीत होती है। जिसके बाद प्रश्न यह उठना स्वाभाविक है क्या कलेक्टर और कमिश्नर इस मामले पर समान दृष्टिकोण रखते हैं? क्या अधिकारी यह मानकर चल रहा है कि उसके विरुद्ध कोई कड़ी कार्यवाही नहीं होगी? सवाल सीधे हैं,स्पष्ट हैं और जवाब भी स्पष्ट होने चाहिए।
जांच क्यों ठहरी?
शिकायत उच्चाधिकारियों तक पहुँची,विभागीय स्तर पर आरोप पत्र जारी होने की पुष्टि भी सामने आई,दस्तावेजों में सीमांकन रिपोर्ट के हस्ताक्षर और कब्जे की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज थी फिर भी प्रकरण को हस्ताक्षर अपूर्ण बताकर निरस्त किया गया। यदि प्रशासन केवल सत्यापन चाहता, तो रिपोर्ट दोबारा मंगाई जा सकती थी,पर ऐसा नहीं हुआ।
पत्रकार पर मानहानि नोटिस नया सवाल
जब मामले की रिपोर्ट मीडिया में प्रकाशित हुई,तो स्पष्टीकरण जारी करने के बजाय पत्रकार को मानहानि का नोटिस भेजा गया। यह कदम स्वयं प्रश्न बन गया क्या यह खबर को रोकने की कोशिश थी? या सवाल उठाने वाले को दबाव में लाने का प्रयास?
एक मुहावरा जो इस पूरे प्रकरण पर फिट बैठता है…
‘मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काज़ी।’ जब जांच करने वाले और जांच के दायरे में आने वाले के बीच किसी स्तर पर सहमति, समझ या संरक्षण की भावना हो तो शिकायतकर्ता और पत्रकार केवल दर्शक बनकर रह जाते हैं।
यह मामला अब सिर्फ एक शिकायत नहीं…
यह प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता, और जनता के भरोसे का प्रश्न है, इस पर स्पष्ट, लिखित और सार्वजनिक उत्तर आवश्यक है, और समय सीमा सहित।
मुद्दा कैसे शुरू हुआ?
शिकायतकर्ता ने जनदर्शन सहित विभागीय स्तर पर आवेदन देकर तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर और नगर सैनिक संजय मिश्रा पर सरकारी कार्य के बदले 1 लाख रुपये और आईपैड की मांग किए जाने का आरोप लगाया, आधार के रूप में ऑडियो रिकॉर्डिंग,वीडियो क्लिप्स सीमांकन से जुड़े राजस्व दस्तावेज़ जमा कराए गए। दूसरी ओर,जिस सीमांकन रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज किया गया कि हस्ताक्षर अपूर्ण हैं, उसी रिपोर्ट में आरआई लक्ष्मी खलखो द्वारा किए गए स्थल सत्यापन और संबंधित पक्षों के हस्ताक्षर मौजूद थे,यानी,यदि प्रशासन चाहता तो:पुनः स्थल निरीक्षण, द्वितीय जांच, फील्ड रिपोर्ट की पुष्टि आसानी से हो सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
जहाँ कार्यवाही की अपेक्षा थी, वहाँ नोटिस
जब एक स्थानीय पत्रकार ने इस मामले को समाचार के रूप में प्रकाशित किया, तो तहसीलदार शिव नारायण राठिया की ओर से पत्रकार को मानहानि नोटिस भेज दिया गया, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है, क्या खबर पर नोटिस भेजना तथ्य बाहर न जाए इसका संकेत है? क्या प्रशासन सवालों का उत्तर देने की बजाय सवाल उठाने वालों पर केंद्रित है? और सबसे बड़ा सवाल यदि आरोप झूठे हैं तो प्रशासन को जांच पूरी कर सार्वजनिक रूप से प्रतिवाद जारी करना चाहिए, यदि आरोप सही हैं तो अब तक निलंबन,एफआईआर और अनुशासनात्मक कार्यवाही क्यों नहीं? लेकिन स्थिति यह है कि न जांच आगे बढ़ती दिख रही है, न आदेश स्पष्ट है, न प्रशासनिक रुख।
मुख्य सवाल जनता के सामने…

  1. जब सबूत सार्वजनिक हैं — कार्यवाही न्यायिक स्तर तक क्यों नहीं पहुँच रही?
  2. जिला प्रशासन मौन क्यों है?
  3. यदि अधिकारी निर्देश हैं,तो प्रतिवाद और जांच त्वरित क्यों नहीं?
  4. यदि आरोप गंभीर हैं, तो निलंबन और एफआईआर में विलंब क्यों?

जनता यही देख रही है…

मुद्दास्थिति
शिकायत दर्जहो चुकी
सबूत प्रस्तुतसार्वजनिक एवं लिखित
न्यायिक या विभागीय कार्रवाईप्रतीक्षारत
पत्रकार को नोटिसजारी
तहसील/जिला प्रशासन का बयानकोई नहीं



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