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सूरजपुर/भैयाथान@सबूत दमदार,प्रशासन लाचार,क्या सिस्टम ही बचा रहा है दोषियों को?

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-ओेंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,02 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। भैयाथान तहसील में रिश्वत के आरोपों से जुड़े गंभीर मामले को 50 दिन से अधिक समय बीत चुका है,शिकायतकर्ता सौरभ प्रताप सिंह द्वारा दिए गए ऑडियो, वीडियो और लिखित सबूत,बार-बार वायरल हो चुके हैं,फिर भी तहसील और जिला प्रशासन की शंकित चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है जब सबूत जनता के सामने हैज्तब कार्रवाई न्याय कक्ष में क्यों नहीं पहुंच रही? शिकायतकर्ता ने बताया कि तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर ने सरकारी कार्य के बदले रिश्वत की मांग की थी। सबूत जमा होने के बाद भी,न निलंबन,न जांच,न एफआईआर सब कुछ रुका हुआ सा लगता है, शुरुआत एक शिकायत और पत्रकार पर नोटिस भैयाथान तहसील से शुरू हुआ यह मामला अब जिले के पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़ा कर रहा है,शिकायतकर्ता सौरभ प्रताप सिंह ने जनदर्शन में आवेदन देकर पूर्व तहसीलदार संजय राठौर और उनके नगर सैनिक संजय मिश्रा पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था,आवेदन में कहा गया कि 1 लाख रुपये और एक आई पैड की मांग की गई थी,जब शिकायतकर्ता ने रिश्वत देने से इनकार किया,तो प्रकरण को निराधार बताकर खारिज कर दिया गया,यह लिखते हुए कि सीमांकन रिपोर्ट में हस्ताक्षर नहीं हैं,हालांकि,दस्तावेज़ बताते हैं कि आरआई लक्ष्मी खलखो की रिपोर्ट में सभी हस्ताक्षर मौजूद थे और कब्जे की स्थिति स्पष्ट थी। प्रशासन चाहता तो पुनः रिपोर्ट मंगाई जा सकती थी परंतु ऐसा नहीं किया गया,इसके बाद जब एक स्थानीय पत्रकार ने इस पूरे मामले की रिपोर्ट प्रकाशित की,तो इसके जवाब में तहसीलदार शिव नारायण राठिया की ओर से पत्रकार को मानहानि का नोटिस भेजा गया जिससे यह सवाल उठ गया कि क्या यह सच को दबाने की कोशिश थी? मामले की पूरी टाइमलाइन जनता याद रखे इसलिए दर्ज तारीख क्या हुआ? शुरुआत 2023 जमीन सीमा विवाद पर अर्जी आरआई लक्ष्मी खलखो की जांच कब्जे का पूरा ब्यौरा,विरोधी पक्ष के हस्ताक्षर तहसील कार्यालय में रिश्वत माँगी गई 1,00,000 माँगने का आरोप पैसे देने से इनकार,दबाव आदेश ग़लत कारण दिखाकर खारिज साइन नहीं,रिपोर्ट अस्पष्ट में शिकायत पर पत्रकार ने रिपोर्ट छापी जनता में सवाल अब तक कार्रवाई शून्य सबूत दमदार थे फिर भी आदेश दबा क्यों?
रिश्वत से फर्जी नामांतरण तक जांच का दायरा बढ़ा
अब इस मामले ने नया मोड़ ले लिया है,सूत्रों का दावा है कि वर्तमान भैयाथान तहसीलदार शिव नारायण राठिया,जो इससे पहले भटगांव तहसील में पदस्थ थे,उनके कार्यकाल (जनवरी से मई 2025) के दौरान कई फर्जी नामांतरण किए गए,कई दस्तावेजों में सरकारी जमीनों को निजी नामों पर दर्ज कर दिया गया,और जिन रजिस्टि्रयों में राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट अधूरी थी, वहां भी आदेश पारित कर दिए गए, यदि जनवरी से मई 2025 के बीच भटगांव में हुई सभी रजिस्ट्री और नामांतरण की जांच कर ली जाए, तो फर्जीवाड़े की असली तस्वीर सामने आ जाएगी, राजस्व विभाग के सूत्र (नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर) बताया की संभावित गड़बडि़यों का पैटर्न सरकारी खातों की जमीन निजी नामों पर ट्रांसफर,राजस्व निरीक्षक की संस्तुति अधूरी या अनुपस्थित,आदेशों में अलग-अलग स्याही,हस्ताक्षर और फॉर्मेट,फाइल की तारीखें और आदेश तिथियाँ मेल नहीं खातीं, कुछ आदेशों पर हस्ताक्षर बाद में जोड़े गए प्रतीत होते हैं। कानूनी जानकारों के अनुसार,ये मामले केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि? धोखाधड़ी,जालसाजी और फर्जी दस्तावेज़ का प्रयोग जैसे आपराधिक अपराधों के अंतर्गत आते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय,नोटिस की वैधता पर भी सवाल
बिलासपुर हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है कि यदि पत्रकार ने दस्तावेज़ आधारित रिपोर्टिंग की है,और उसमें कोई झूठी बात नहीं जोड़ी गई है, तो मानहानि नोटिस भेजना प्रेस स्वतंत्रता पर हमला माना जा सकता है, उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सच्चाई को छिपाने के बजाय जांच की प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जानी चाहिए क्योंकि जब अधिकारी नोटिस का सहारा लेते हैं, तो यह संदेश जाता है कि लोक सेवक सवालों से डर रहे है।
क्या इसमें पुराने अफसरों की मिलीभगत है?
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि पूर्व तहसीलदार संजय राठौर और वर्तमान तहसीलदार शिव नारायण राठिया के बीच अंदरूनी तालमेल होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता,ऐसा लगता है कि राठौर ने ही राठिया को नोटिस भेजने के लिए प्रेरित किया,ताकि पुराने भ्रष्टाचार की फाइलें कभी न खुलें सूत्र, भैयाथान तहसील कार्यालय यदि यह दावा सही साबित होता है,तो यह मामला सिर्फ रिश्वत तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि एक संगठित नेटवर्क का चेहरा उजागर करेगा जो तहसील स्तर पर जनता के अधिकारों का सौदा कर रहा है।
रिश्वत प्रकरण से फर्जी नामांतरण घोटाले तक,नेटवर्क का शक
जांच के दौरान कुछ ऐसे दस्तावेज-नोट मिलें,जो संकेत देते हैं कि यह मामला व्यापक और संगठित है केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत गलती नहीं, विशेषकर भटगांव में जनवरी से मई 2025 के बीच हुए नामांतरण/रजिस्ट्री रिकॉर्ड पर अब संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। सूत्रों का दावा है,यदि भटगांव तहसील में जनवरी–मई 2025 के सभी रजिस्ट्री/नामांतरण रिकॉर्ड निकाले जाएँ और उनका सत्यापन किया जाए तो कई आदेशों में फर्जीवाड़ा स्पष्ट हो जाएगा,यह दावा बहुत बड़ा है और अगर सत्य पाया गया तो इसमें न केवल स्थानीय तहसील स्टाफ़ बल्कि संभवतः उससे ऊपर के कुछ प्रभावशाली हस्तियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
वरिष्ठ अधिवक्ता बताते हैं यदि सरकारी जमीन के नामांतरण फर्जी तरीके से किए गए हैं, तो यह आपराधिक मामला बनता है,नोटिस-प्रवृत्ति का प्रयोग तब आपत्तिजनक बनता है जब वह सत्यापित तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग को दबाने का माध्यम बने,ऑडियो-वीडियो के लिए फोरेंसिक परीक्षण और आधिकारिक रिकॉर्ड-ऑडिट आवश्यक है ताकि सच्चाई कोर्ट-योग्य साक्ष्य बन सके।
अब सच्चाई से डरना नहीं,सामना करना होगा
यह मामला केवल एक तहसील की कहानी नहीं,बल्कि पूरे सिस्टम का आईना है, जहाँ रिश्वत के आरोपों के बीच फर्जी नामांतरण किए गए, और जो आवाज़ उठी,उसे नोटिस से दबाने की कोशिश हुई,अगर शासन सचमुच पारदर्शिता और जवाबदेही में विश्वास रखता है, तो उसे तुरंत भटगांव के जनवरी–मई 2025 रिकॉर्ड सार्वजनिक करवाने चाहिए, क्योंकि जनता अब पूछ रही है जब सबूत दमदार हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
पुराने केस खोलो…गड़बडि़यों का काला इतिहास होगा उजागर
स्थानीय नागरिकों का दावा संजय राठौर व शिव नारायण राठिया के कार्यकाल में जमीन नामांतरण,नक्शा पारित,खसरा-खतौनी सुधार जैसे मामलों में लगातार अनियमितताएँ दर्ज हुईं,कई पीडि़तों की आवाजें अब उठ रही हैं क्या यह रिश्वत कांड पहला मामला है? या यह पहली बार पकड़ा गया मामला है? जिला प्रशासन की चुप्पी, यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं पूरी तहसील व्यवस्था में गहरी सड़न है।
असली मास्टरमाइंड कौन?
सूत्रों का दावा यह कोई इक्का-दुक्का अधिकारी का खेल नहीं,यहाँ एक पूरा नेटवर्क मौजूद है दलाल अधिकारी प्रकृति से भ्रष्ट व्यवस्था जिसकी पकड़ इतनी मजबूत है कि कानून भी बेबस दिखाई दे रहा है।
नया संदेह! क्या शिव नारायण राठिया को ‘उकसाया’ गया?
सूचना के अनुसार शिकायतकर्ता को संदेह है कि इस पूरे मामले में तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर ने अन्य कर्मचारी शिव नारायण राठिया को मुख्य भूमिका निभाने के लिए उकसाया था,इस पर भी प्रशासन चुप क्यों?
रिश्वत के आरोपों के बीच ‘नोटिस का नाटक’ सच्चाई किससे डरती है?
शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि नोटिस भेजना,जबकि आरोपित अधिकारी पर अब तक कोई कानूनी कार्यवाही नहीं,यह एक खतरनाक संदेश देता है भ्रष्टाचार करने वाला सुरक्षित,आवाज़ उठाने वाला कटघरे में! आखि़र किसके इशारे पर…? भैयाथान में कलम बनाम कुर्सी आखिर कौन डरा किससे?, पत्रकार पूछ रहे हैं…जनता तरस रही है…पीडि़त न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है…लेकिन कुर्सी पर बैठा सिस्टम—डर गया है…सच से!
अब बड़े सवाल जनता पूछ रही है प्रश्न…जवाब कौन देगा?
प्रश्नः रिश्वत लेने के आरोप पर अभी तक पुलिस प्राथमिकी क्यों नहीं?
जवाब: प्रशासन कब देगा?
प्रश्नः 50 अधिक दिन से प्रकरण लंबित क्यों?
जवाब: अनजान चुप्पी
प्रश्नः वायरल ऑडियो-वीडियो को मान्यता क्यों नहीं?
जवाब: जांच एजेंसी
प्रश्नः दोषी को बचाने की कोशिश कौन कर रहा है?
जवाब: नेटवर्क
प्रश्नः पीडि़त को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
जवाब: तहसील तंत्र
अंत में बड़ा सवाल:
अगर रिपोर्ट गलत थी तो दोबारा रिपोर्ट क्यों नहीं मंगवाई गई?
प्रशासन के पास आज तक कोई जवाब नहीं…!
गुम हुई फाइलें या दबाया गया सच?
शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके कई आवेदन और दस्तावेजों का ट्रेस ही नहीं मिल रहा,यह स्वयं में एक संकेत है कि सच को दबाने की कोशिश चल रही हैं…
महत्वपूर्ण प्रश्न
1 आवेदन कहाँ अटक जाता है?
2 किस स्तर पर फाइल रोकी जाती है?
3 किसको बचाने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
यदि फाइल मिल नहीं रही तो क्या यह सिस्टमेटिक साजिश नहीं?


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