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एमसीबी@धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान अधिकार,अस्मिता और आत्मनिर्भरता की नई दिशा

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एमसीबी,14 अक्टूबर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ की धरती सदियों से जनजातीय परंपराओं की वह पवित्र भूमि रही है जिसने भारत की आत्मा को जीवंत बनाए रखा है। यही वह भूमि है,जहाँ जंगलों की हरियाली, नदियों की स्वच्छता और जनजातीय संस्कृति की गहराई एक-दूसरे में घुल-मिलकर एक संतुलित जीवन दर्शन का निर्माण करती हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इन्हीं परंपराओं को नई ऊर्जा देने के लिए जो ऐतिहासिक पहल की है,उसका नाम है धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (दजगुआ)। यह अभियान आदिवासी अस्मिता,स्वाभिमान और सशक्तिकरण का मॉडल बन चुका है। धरती आबा नाम से स्वयं भगवान बिरसा मुंडा क्रांतिकारी व्यक्तित्व की स्मृति है, जिन्होंने आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई में अपना इतिहास रचा और भगवान बिरसा मुंडा के नाम से जाना गया। उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा को अपना जीवन का हिस्सा बना लिया था। आज वही विचार, वही आत्मा, वही संघर्षशीलता इस अभियान की नींव और प्रेरणा है।

मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में वनाधिकार से ग्रामोदय तक की प्रेरक कहानी
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला छत्तीसगढ़ के उत्तर में बसा एक ऐसा क्षेत्र है, जो प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यहाँ की मिट्टी में जनजातीय परंपराओं की खुशबू है और यहाँ के लोगों में आत्मसम्मान की शक्ति बसा हुआ है। यह जिला जनजातीय विकास की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणास्पद माना जाता है। इसी जिले से धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान ने अपनी ठोस नींव रखी। जिले के तीनों प्रमुख विकासखण्ड मनेंद्रगढ़,भरतपुर और खड़गवा अब जनसशक्तिकरण की मिसाल बन चुके हैं। इस अभियान के अंतर्गत जिले के 151 ग्रामों का चयन किया गया है, जिनमें से 145 ग्राम को वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत शामिल किया गया है। यह उस ऐतिहासिक परिवर्तन की कहानी है जिसमें अधिकार और विकास का वास्तविक समन्वय पहली बार धरातल पर साकार हुआ है।

भरतपुर ब्लॉक प्राकृतिक संपदा से आत्मनिर्भरता की दिशा में
भरतपुर ब्लॉक में कुल 55 ग्राम पंचायत द-जगुआ से जुड़े हुए हैं। जिसमें बडवाही, मेहदौली, उदकी, हरचौका, बेलगांव, चरखर,पूंजी,चिड़ौला, देवगढ़,सिंगरौली,लरकोडा,बड़काडोल, डोगरीटोला, नौढि़या, कुवांरी, पतवाही, चांटी, मलकडोल जैसे अनेकों ग्राम पंचायत शामिल हैं। यह ब्लॉक अपनी प्राकृतिक संपदा और घने वनों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के ग्रामों में वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दी गई भूमि का उपयोग अब जैविक खेती, वनोपज उद्योगों और बांस आधारित लघु उद्यमों में किया जा रहा है। महिलाएँ वन उत्पाद मूल्यवर्धन के प्रशिक्षण ले रही हैं और बाजार तक पहुँच बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं। यहाँ के महिला स्व-सहायता समूहों ने आयुर्वेदिक साबुन,हर्बल तेल, और जड़ी-बूटी आधारित उत्पादों का निर्माण प्रारंभ किया है,जो अब स्थानीय हाट-बाज़ारों से लेकर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच रहे हैं। यह सशक्तिकरण की वह दिशा है जहाँ जंगल अब सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि रोज़गार का विद्यालय बन गया है।
खड़गवां ब्लॉक परंपरा और प्रगति का अद्भुत संगम
खड़गवां ब्लॉक में 42 ग्राम पंचायतों इस अभियान का हिस्सा हैं। जिसमें बड़गांवकला, धवलपुर, कोडा, पैनारी, मेण्ड्रा, बेलबहरा, जरौधा, सकड़ा, कटकोना, शिवपुर, लकड़ापारा, बरदर, गिद्धमुड़ी, उधनापुर, आमाडाड़, मझौली, ठगगांव, रतनपुर, बोडेमुड़ा, धनपुर, दुग्गी और सिघत जैसे अनेकों ग्राम पंचायतों में आज ग्राम उत्कर्ष समितियों के सहयोग से आत्मनिर्भरता की राह पर हैं। यहाँ के ग्रामों में कृषि विविधीकरण, औषधीय पौधों की खेती, फलदार वृक्षारोपण और सामुदायिक जल प्रबंधन जैसे नवाचार अपनाए जा रहे हैं। युवाओं को वन अधिकार आधारित आजीविका प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संतुलन बना सकें। ग्राम समाज में सामूहिक निर्णय प्रणाली की परंपरा को पुनर्जीवित किया गया है, जिससे हर निर्णय में ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित होती है।


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