जनता को वास्तविक इतिहास से परिचित कराने “द बंगाल फाइल्स” मूवी का निशुल्क प्रदर्शन
आक्रांताओं और देश विभाजन के वीभत्स अत्याचारों पर आधारित है यह फिल्म
संघ की अपील प्रत्येक भारतीय को देखनी चाहिए यह फिल्म
कोरिया 19 सितम्बर 2025 (घटती-घटना)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचार विभाग कोरिया एवं गंगा श्री सिनेप्लेक्स बैकुंठपुर के संयुक्त तत्वाधान में रविवार को सायं 6 बजे से “द बंगाल फाइल्स” मूवी बैकुंठपुर के गंगा श्री सिनेप्लेक्स सिनेमाघर में नि:शुल्क दिखाई गई। पूरा हाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवकों, राष्ट्रवादी विचारकों और युवाओं से भरा हुआ था।
इस फिल्म में मुख्य रूप से इतिहास के उस काले अध्याय का दर्शन कराया गया है, जब देश के विभाजन को लेकर लार्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू और मुहम्मद अली जिन्ना के बीच देश के बंटवारे की बातें होती थीं। जहां अंग्रेज़, जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग करते हैं। यदि आप इतिहास के अंधेरे और दर्दनाक पहलुओं के साथ वर्तमान के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ को समझना चाहते हैं, तो ‘द बंगाल फाइल्स’ देखना जरूरी है।यह हमें आज के दौर के साथ-साथ 1946-47 के उस अशांत बंगाल में ले जाती है, जब कलकत्ता नरसंहार, डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली दंगे जैसी भयानक घटनाएं घटी थीं। जिसमें हिंदुओं पर व्यवस्थित रूप से हमले किए, जिसमें हत्याएं, बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, घरों की लूट और आगजनी शामिल थी। द बंगाल फाइल्स’ आपको 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखली दंगों की वीभत्सता के सबसे काले पहलू से रूबरू कराती है।
द बंगाल फाइल्स’ की कहानी
फिल्म की कहानी दो समानांतर टाइमलाइन में आगे बढ़ती है। पहली टाइमलाइन आज के दौर की है, जहां सीबीआई अफसर शिवा पंडित (दर्शन कुमार) को बंगाल में एक दलित लड़की सीता की गुमशुदगी की जांच के लिए भेजा जाता है। अपनी तहकीकात के दौरान उसकी मुलाकात होती है मां भारती (पल्लवी जोशी) से, जो न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ चुकी हैं, बल्कि 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे की प्रत्यक्षदर्शी भी रही हैं। दूसरी टाइमलाइन हमें 1946 के अशांत बंगाल में ले जाती है, जहां युवा भारती बनर्जी (सिमरत कौर रंधावा) अपने साथी अमरजीत अरोड़ा (एकलव्य सूद) संग नोआखाली दंगों और आतंकवादी सरवर हुसैनी (नमाशी चक्रवर्ती) की बर्बरता का सामना करती है। इस हिंसा में वह अपने जस्टिस पिता (प्रियांशु चटर्जी), अपनी मां और अपने प्रेमी अमरजीत, सबको खो देती है।अतीत की यह त्रासदी, मां भारती की यादों के जरिए शिवा को वर्तमान केस की परतें खोलने का रास्ता देती है। सभी सुराग आखिरकार जा टकराते हैं अल्पसंख्यक विधायक सरदार हुसैनी (सास्वता चटर्जी) से, जो आज के बंगाल की सत्ता, डर और दोहरे चेहरे का प्रतीक है।
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