- हाईकोर्ट ने डॉ. प्रिंस जायसवाल की याचिका पर अंतरिम राहत देने से किया इनकार,फर्जी दस्तावेजों के आरोप पर मांगा जवाब…
- क्या सूरजपुर में डीपीएम की नई पदस्थापना होगी या फिर तत्कालीन डीपीएम के मामले के फैसले का और किया जाएगा इंतजार?
- काम हो रहा प्रभावित फिर भी नई नियुक्ति न होना बड़ा सवाल

-शमरोज खान-
सूरजपुर,03 जुलाई 2025 (घटती-घटना)। जिला सूरजपुर स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी डीपीएम तत्कालीन डॉक्टर प्रिंस जायसवाल की सेवा फर्जी डिग्री के आधार पर शासन द्वारा समाप्त कर दी गई है, सेवा समाप्त होने के लगभग एक महीने बाद भी सूरजपुर जिले को नए डीपीएम नहीं मिल पाया है, आखिर किस बात का इंतजार है यह भी समझ में नहीं आ रहा है, वैसे उस कार्यालय में लोगों का यही कहना है कि तत्कालीन प्रभारी डीपीएम ही दोबारा उस कुर्सी पर बैठेंगे जब तक कोई फैसला नहीं आ जाता तब तक वह कुर्सी क्या खाली रहेगी? क्या काम बिना डीपीएम के होगा? वैसे सूरजपुर के के प्रभारी डीपीएम प्रिंस जायसवाल की सेवा समाप्त हो गई थी वह सेवा इसलिए समाप्त हुई थी क्योंकि उन्होंने फर्जी डिग्री के आधार पर डीपीएम पद के लिए आवेदन किया था इसको आधार मानते हुए शासन ने उनकी सेवा समाप्त की थी पर डीपीएम इस सेवा समाप्ति को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालय का सहारा लिए थे, उनका मानना है कि जो कार्यवाही हुई है वह गलत है वह कोई भी फर्जी डिग्री का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, पर वही शासन ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि वह फर्जी डिग्री का इस्तेमाल किए थे, वही छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में डॉ. प्रिंस जायसवाल द्वारा सेवा से हटाए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति श्री रविन्द्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है, साथ ही राज्य सरकार सहित अन्य पक्षों को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। डॉ. प्रिंस जायसवाल की ओर से अधिवक्ता श्री पवन श्रीवास्तव ने पक्ष रखते हुए बताया कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति छत्तीसगढ़ शासन की वर्ष 2018 की मानव संसाधन नीति के विरुद्ध की गई है, जो आज भी प्रभावशील है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को बिना अवसर दिए सेवा से हटाया गया,जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
प्रकरण में नया मोड़
शिकायतकर्ता संजय जयसवाल ने बताया की हाई कोर्ट में प्रिंस जायसवाल के अधिवक्ता ने कई बातों को माननीय कोर्ट से छिपाया,उन्होंने यह नही बताया कि प्रिंस जायसवाल 2022 से लगातार अब तक प्रभारी डीपीएम के पद पर पदस्थ है,पहले लगभग दो वर्ष कोरिया और बीते एक वर्ष से ज्यादा समय से सूरजपुर में डीपीएम के पद पर पदस्थ है,वही उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के एनएचएम में सलाहकार बताकर ही कोर्ट को गुमराह किया,इसके साथ ही उन्होंने यह नही बताया कि साबरमती यूनिवर्सिटी ने पूर्व में हुई जांच में जो पत्र प्रिंस की डिग्री को सही बताया था उस पत्र को भी मानने से इनकार कर दिया है यूनिवर्सिटी ने कहा कि उन्होंने प्रिंस जायसवाल की डिग्री सही है ऐसा कोई पत्र भेजा ही नही है। मतलब साफ है कि जो पत्र साबरमति यूनिवर्सिटी के फर्जी लेटरपेड बनाकर भेजा गया था वो कूटरचित था, उस पर भी कार्यवाही होने की आवश्यकता है। ऐसा कानूनी जानकारों का मानना है।
पुलिस के जवाब से हो रही हैरानी…
सूरजपुर पुलिस किस तरह से प्रिंस जायसवाल को बचाने में जुटी है वो तब सामने आया जब हाई कोर्ट में प्रिंस जायसवाल को लेकर बहस हो रही थी जिसमे उनके अधिवक्ता ने बताया कि सूरजपुर पुलिस ने अपने कथन में बताया है कि अपराध यहां घटित नही हुआ अपराध अहमदाबाद में घटित हुआ है। अब आप समझिए कि यदि कोई व्यक्ति दिल्ली के नाम से यहां पर फर्जी मार्कशीट लगाता है तो क्या अपराध दिल्ली में दर्ज होगा? इसी तरह सूरजपुर पुलिस का कहना है कि उसने फर्जी मार्कशीट का लाभ नही लिया, नियुक्ति ही निरस्त हो गई, वाह रे सूरजपुर पुलिस आप ये बताओ कि कोई चोर चोरी करने किसी घर मे घुसेगा और चोरी करने के पूर्व ही पकड़ा जाएगा उसे कूटकर थाने लाता जाएगा तो क्या अपराध नही बनता है? साफ है कि सूरजपुर पुलिस भी प्रिंस जायसवाल को बचाने में पूरा जोर लगा रही है।
फर्जी अंकसूची का आरोप और जांच रिपोर्ट
याचिका में यह उल्लेख किया गया है कि डॉ. जायसवाल को जिला आरएमएनसीएच+ए सलाहकार (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) के पद पर 29 मई 2015 को संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था। उनके विरुद्ध यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने मास्टर ऑफ फिजिकल हेल्थ की डिग्री की फर्जी अंकसूची साबरमती यूनिवर्सिटी (पूर्व में कैलॉर्क्स टीचर्स यूनिवर्सिटी),अहमदाबाद से प्रस्तुत की है। हालांकि,अधिवक्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि कलेक्टर, सुरजपुर द्वारा की गई जांच में विश्वविद्यालय ने उक्त अंकसूची की प्रामाणिकता की पुष्टि की है, और प्रारंभ में जांच को बंद करने की अनुशंसा भी की गई थी। इसके बावजूद,एक निजी शिकायतकर्ता संजय कुमार जायसवाल की शिकायत के आधार पर दोबारा जांच प्रारंभ कर डॉ. जायसवाल को सेवा से हटा दिया गया।
राज्य पक्ष ने हटाने को बताया उचित
राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता श्री सुयशधर बडगैया (उप महाधिवक्ता) एवं उत्तरदाता क्रमांक 2 की ओर से अधिवक्ता श्री सी.जे.के. राव ने आपत्ति जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक संविदा कर्मचारी थे और उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिया गया था, लेकिन वे अपनी डिग्री की प्रामाणिकता साबित करने में असफल रहे। अतः सेवा से हटाया जाना नियमानुसार एवं न्यायोचित है।
अदालत ने अंतरिम राहत देने से किया इंकार
न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों एवं प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता संविदा पर नियुक्त थे और उन पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति पाने का गंभीर आरोप है। ऐसे में अदालत अंतरिम राहत प्रदान करने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, जैसे यूपी स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाम बृजेश कुमार” और फिरोज़ अहमद शेख बनाम यूनियन टेरिटरी ऑफ जम्मू-कश्मीर” उनके पक्ष में सहायक नहीं हैं,क्योंकि इन मामलों की परिस्थितियाँ वर्तमान मामले से भिन्न हैं।
अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद
अदालत ने राज्य सरकार तथा अन्य पक्षों को निर्देशित किया है कि वे आगामी तीन सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करें। इसके उपरांत मामले की अगली सुनवाई की जाएगी।
सत्य की हमेसा जीत होती है: संजय जायसवाल
माननीय हाई कोर्ट के फैसले को लेकर शिकायकर्ता संजय जायसवाल ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि माननीय न्यायालय ने जो आदेश दिया है उसका मैं तहेदिल से स्वागत करता हूँ,बहुत बहुत आभारी हूँ। सत्य की हमेशा जीत हुई है ये सर्वविदित है।
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