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सूरजपुर@साहब…एक व्यक्ति दो बार कैसे मर सकता है…एक बार आवेदन में दूसरी बार मृत्यु प्रमाण पत्र में?

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-शमरोज खान-
सूरजपुर,20 जून 2025 (घटती-घटना)। जिला सूरजपुर का भैयाथान तहसील कार्यालय इस समय तहसीलदार के अजीब कारनामों की वजह से सुर्खियों में है, अब आप सोच रहे होगे की तहसीलदार साहब ने ऐसा कौन सा कारनामा कर दिया कि वह तहसील कार्यालय सुर्खियों में आ गया है, इस कारनामे को जानकर शायद लोग अचंभित हो सकते है,तहसीलदार साहब ने भैयाथान कार्यालय में पदस्थ रहते हुए और लोगों के जमीन संबंधित प्रकरण का निपटारा करते हुए 30 डिसमिल जमीन अपनी पत्नी के नाम खरीद लिए, जिस जमीन को उन्होंने ख़रीदा है वह जमीन सभी के लिए बेसकिमती है पर यह बेसकीमती जमीन तहसीलदार साहब के पत्नी के लिए काफी सस्ती होगी, अब आप सोच रहे होंगे कि यह जमीन इन्होंने कितनी सस्ती खरीदी है? तो आप को बता दे की इन्होंने इस जमीन को 186000 रुपए मात्र में खरीदा है, अब इतनी सस्ती जमीन कहां मिलती होगी? अब आप यह भी सोच रहे होंगे तो इतनी सस्ती जमीन सिर्फ तहसीलदार साहब को मिलती है वह भी भैयाथान क्षेत्र के कोयलारी गांव में प्रधानमंत्री सड़क के किनारे और इतनी सस्ती जमीन देने वाला महान व्यक्ति कौन है तो यह भी आप जान के आश्चर्यचकित हो जाएंगे,इतनी सस्ता जमीन दिलवाने सिर्फ एक ही महान व्यक्ति है वह है वीरेंद्र नाथ दुबे। ये पूरी खबर शिकायतकर्ता की दी हुई जानकारी पर तयार किया गया है जानकारी की प्रमाणिकता की दैनिक घटती-घटना पुष्टि नहीं करता है।

30 डिसमिल जमीन संजय राठौर ने जमीन गिरोह के साथ मिल कर अपनी पत्नी के नाम किया
जीवित वृद्धा शैलकुमारी को दूसरी बार मृत बताकर जमीन हडपने के गिरोह में निलम्बित तहसीलदार संजय राठौर, बिरेन्द्र दुबे,कमलेश दुबे,शिवम दुबे,देवीप्रसाद दुबे आदि सम्मिलित हैं,इसी गिरोह ने एक साथ 1976 में शैलकुमारी द्वारा खरीदी भूमि पर भूमि खरीदी से आठ वर्ष पूर्व 1967 का फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र लगाकर नामान्तरण करवाया और तीसरे ही दिन बेच दिया,इसी गिरोह ने 2024-25 की इसी कालावधि में शैलकुमारी की सम्मिलात खाते की भूमि का भी उन्हें, उनके पुत्र पुत्रियों, उनके जेठ के पुत्रों पुत्रियोँ तथा देवर के भी पुत्र पुत्रियों को बिना सूचना दिये कथित आपसी समझौता के आधार पर भूमि हडप ली, नाम न बताने की शर्त पर इसी गिरोह के एक सदस्य ने बताया कि इन दोनो कार्य के प्रतिफल के रूप में संजय राठौर को करकोटी स्थित शैलकुमारी की भूमि से बीस डिसमिल व बंटवारे के लिये सम्मिलात खाता की भूमि से दस डिसमिल भूमि देने का सौदा हुआ था, इसीलिये संजय राठौर ने करकोटी स्थित शैलकुमारी की निजी भूमि का फर्जी नामान्तरण करते ही तीसरे दिन अपने दो चहेतों शिवम व संजय के नाम रजिस्ट्री करा लिया और बीरेंद्र दुबे ने अपने पुत्र कमलेश को दानपत्र के माध्यम से भूमि को अंतरित कर दिया। पर मामला शैलकुमारी के संज्ञान में आ जाने से वे उस भूमि को अपनी पत्नी के नाम शिवम व संजय से रजिस्ट्री न करा सके, इसीलिये उनके द्वारा बिरेन्द्र पर भूमि के लिए दबाव बनाया गया, तो उन्हें सम्मिलात खाता की भूमि से जहां पर 10 डिसमिल देना था उसे बढाकर तीस डिसमिल भूमि शारदा राठौर के नाम पर दिया गया। पहले के समझौते अनुसार संजय राठौर 20 डिसमिल जमीन करकोटी में लेना चाह रहे थे और 10 डिसमिल जमीन कोलयारी की जमीन से लेना तय था पर जब मामला बिगड़ गया तब यह इन्होंने पूरी जमीन 30 डिसमिल कोलयारी में ले ली और वहां पर भी है फस गए जो इन्होंने फर्द बटवारा किया वह भी उन्होंने गलत ही कर दिया उसकी भी शिकायत हो गई है, वह भी मामला जांच का है जहां जीवित महिला को मृत बता कर उस जमीन में से 20 डिसमिल लेना चाह रहे थे, पर मकसद में कामियाब नहीं हुए तब उन्होंने फर्जी फर्ज बटवारा वाले में ही 30 डिसमिल जमीन पूरी ले ली, फर्द बंटवारा में भी ऐसे व्यक्ति की सहमति ली गई जिसका उस जमीन से दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है जो जिंदा है उनसे सहमती ली नहीं गई और मारे तो सहमति देते नहीं फिर वीरेंद्र दुबे की सहमति क्यों ली गई यह तो तहसीलदार संजय राठौर ही बता सकते हैं?

दो अलग अलग बार शैलकुमारी को मृत बता बेची जमीन
वर्ष 1966 में शैलकुमारी दुबे ने ग्राम नमनाकलां,अम्बिकापुर में 17 डिसमिल भूमि क्रय की जिसे विरेन्द्र नाथ दुबे ने शैलकुमारी को 1978 में मृत बताते हुये अपने आप को उनका एकमात्र वारिस होने का फर्जी दावा कर राजस्व अधिकारियों से सांठगांठ कर 1984 में नामान्तरण करवाकर देवनारायण जायसवाल को रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से बेच दिया, इसकी सूचना मिलने पर शैलकुमारी दुबे सौतेला पुत्र होने के पश्चात भी विरेन्द्र के विरूद्ध एफआईआर नहीं किया है और माननीय न्यायालय अनुविभागीय अधिकारी अम्बिकापुर के समक्ष नामान्तरण निरस्त करने को अपील करती हैं जिस पर श्रीमान के.आर मेहरे की न्यायालय ने 30/11/1985 को अपने आदेश में शैलकुमारी को जीवित मानते हुये शैलकुमारी के पक्ष में नामान्तरण करने का आदेश दिया, शैल कुमारी उस भूमि पर सतत काबिज रहीं। बिरेन्द्र दुबे इस प्रकरण पर जेल जाने के भय से इसपर चुप रहे पर अपने कृत्यों से समूचे परिवार को त्रस्त करता रहा। इसी बीच विरेन्द्र नाथ दुबे थाना रघुनाथनगर से दिनांक 09/02/1967 का शैलकुमारी दुबे का एक और फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र 2006 में बनवाता है और तहसील अम्बिकापुर से शैलकुमारी को फौत बताकर और उनका फर्जी एकमात्र उत्तराधिकारी होने का दावा कर नामान्तरण आदेश करवा लेता है, लेकिन वह आदेश पालन नहीं करवाता, क्योंकि उसे भय था कि श्री राधेश्याम दुबे अभी जीवित हैं और वे दूसरी बार शैलकुमारी को मृत बताये जाने पर विरेन्द्र को क्षमा नहीं करेंगे और उसके विरुद्ध एफआईआर अवश्य करवायेंगे इसीलिये विरेन्द्र दुबे श्री राधेश्याम को वृद्धावस्था में लड़ाई झगड़ा कर के पीडि़त करने लगता है जिससे वे शीघ्र मरें और विरेन्द्र, अपना खेल खेल सकें। इसी दौरान श्री राधेश्याम दुबे ने अपनी पत्नी शैलकुमारी से नमनाकलां की भूमि विक्रय करवा दी, विरेन्द्र के पक्ष में नामान्तरण आदेश धरा का धरा रह गया। पण्डित श्री राधेश्याम दुबे के 2010 में देहावसान होने पर कमलेश दुबे पटवारी को धमकाने लगा कि तुमने जमीन विक्रय के दस्तावेज कैसे तैयार किये जबकि भूमि स्वामी उसके पिता विरेन्द्र हैं तब शैलकुमारी और परिजनों ने विरेन्द्र के विरुद्ध कोतवाली अम्बिकापुर में इसकी सूचना दी और विरेन्द्र को गिरफ्तार कर चालान किया गया।

बीरेंद्र दुबे ये तो बता दो शैलकुमारी दुबे की मृतु 1978 में हुई या 1967 ?
बीरेंद्र दुबे ने शैलकुमारी दुबे को 1978 व 1967 में दो बार मृत बताकर दो स्थानों नमनाकलां अम्बिकापुर व करकोटी, भैयाथान की भूमि नामान्तरित करवा के कैसे बेची? अब इस बारे में तो बीरेंद्र दुबे ही बता सकते है शैलकुमारी की मृत्यु एक बार होई कि दो बार? वहीं एक तरफ अब इस मामले को लेकर अब आम जनमानस में चर्चा हो रही है कि इतना बड़ा संगीन अपराध घटित होने के बाद भी जिला प्रशासन द्वारा तो प्रारंभिक जांच में तहसीलदार को दोषी मानते हुए निलंबन की कार्यवाही कर दी गई है कि किंतु पुलिस प्रशासन के द्वारा इस मामले को लेकर कोई भी कार्यवाही अब तक नहीं की गई है। वहीं दूसरी तरफ कुछ बुद्धजीवियों का यह भी कहना है कि पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन इस मामले में कोई ठोस कार्यवाही करने वाली है इस कारण भी विलंब हो रहा है।

करकोटी जमीन पानी में नहीं हुए सफल तब कोलयारी की जमीन पर डाला नजर
तहसीलदार संजय राठौर इतने शातिर व माहिर थे कि उन्हें जब लगा कि मुझे करकोटी में नुकसान हो जाएगा और मेरे हाथ कुछ नहीं आएगा,तब उन्होंने तत्काल योजना को बदला और फर्जी फर्द बटवारा करने की ठानी इसके बाद उन्होंने फर्जी बटवारा वाले जमीन से 30 डिसमिल जमीन हासिल करने में सफल हो गए, इस योजना की शुरुआत सम्मिलात खाता का बंटवारा आदेश संजय राठौर ने 01-01-2025 को ही दे दिया था पर करकोटी का मामला सामने आ जाने के कारण वे उसमें सीधे रूप में भूमि प्राप्त करने की स्थिति में न थे, इसीलिए उन्होने सम्मिलात खाते की भूमि का फर्द बंटवारा 01-01-2025 को करने के बाद भी अभिलेख दुरुस्ती नहीं हुआ, उनके अपने ही विश्वस्त संजय कुमार के द्वारा दस डिसमिल भूमि का एग्रीमेंण्ट देवी प्रसाद दुबे से करवा चुके थे पर और बीस डिसमिल भूमि चाहते थे जो करकोटी में वे सीधे रूप में प्रकरण के सामने आ जाने के कारण प्राप्त नहीं कर सके थे,इसीलिये बीस डिसमिल की पूर्ति के लिये सम्मिलात खाते के बंटवारा आदेश पश्चात देवीप्रसाद व बिरेन्द्र दुबे से एक पुनः आपसी सहमति का आवेदन दिनांक 02/02/2025 को दिया गया और संजय राठौर द्वारा उसे स्वीकार भी किया जाता है और देवीप्रसाद को 20 डिसमिल भूमि खसरा क्रमांक 19/1 में बढ़ जाता है। मजेदार बात यह है की तहसीलदार साहब द्वारा कोयलारी खसरा क्रमांक 19/6 में से 20 डिसमिल जमीन देवीप्रसाद को दी जाती है जिसे ही वे अपने पत्नी के नाम 05/02/2025 को रजिस्ट्री करा लेते है, भ्रष्टाचार का खेल तो देखिये कि जिस खसरा नंबर 19/6 से 20 डिसमिल रकबा कम की जाती है उसे स्वयं ही तहसीलदार फर्द बंटवारा में वंदना, गोपेश, दीपेश सीधेश, मातेश्वरी को देते है जो कि शैलकुमारी के ही संतान है, नियमत:उस बीस डिसमिल भूमि के खातेदारों की सहमति लेना था न कि बीरेंद्र दुबे का इसके बावजूद भी सभी नियमों तो ताक में रखकर देवीप्रसाद के नाम 20 डिसमिल भूमि की जाती है और 05-02-2025 को उसे शारदा राठौर के नाम रजिस्ट्री की जाती है और संजय राठौर,बिरेन्द्र,कमलेश,देवी,शिवम का गिरोह दो महीनें में यह खेल कर जाता है।

सस्ती जमीन तहसीलदार को मिली क्यों…
यह तो रही जमीन खरीदने की बात,अब इतनी सस्ती जमीन तहसीलदार को मिली क्यों? इसके पीछे की कहानियों को समझा जाए तो यह समझ में आता है कि यह जमीन सिर्फ उन्हें एक फर्द बंटवारा को एकपक्षीय कर देने के एवज में मिली वह भी वीरेंद्र नाथ दुबे के लिए, जिसके लिए वीरेंद्र नाथ दुबे ने 30 डिसमिल जमीन उनके पत्नी के नाम कर दी, यह आरोप दैनिक घटती घटना का नहीं है यह आरोप शिकायतकर्ता का है। वैसे इस मामले में एक बात सही है की तहसीलदार संजय राठौड़ ने अपनी पत्नी के नाम पर 30 डिसमिल जमीन खरीद ली है, अब यह 30 डिसमिल जमीन क्यों खरीदी कैसे खरीदी यह भी जांच का विषय है और इसका भुगतान कैसे किया या ये जमीन इन्हें उपहार में मिला? पर अपने ही तहसील कार्यालय में अपनी ही जमीन का नामांतरण इतना त्वरित किया की शायद ही इतना त्वरित नामांतरण कभी अपने कार्यकाल में किसी अन्य का किया होगा? जितना जल्दी अपने जमीन का नामांतरण उन्होंने अपनी पत्नी के नाम किया। आखिर विजय नाथ दुबे से इनके क्या संबंध थे जिस वजह से उन्होंने इतनी बड़ी गड़बड़ी कर दी? जिसके वजह से आज उन्हें निलंबित होना पड़ा और बर्खास्त होने की भी स्थिति निर्मित हो रही है, वहीं इस पूरे मामले में अब जांच विभागीय हो रही है और जल्द ही इसमें बड़ी कार्यवाही हो सकता है।
संगठन के पास गिड़गिड़ा रहे हैं…
वैसे कार्यवाही से बचने के लिए तहसीलदार संजय राठौर हाथ पैर बहुत मार रहे हैं, अपने संगठन के पास गिड़गिड़ा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी बात उन्हीं का प्रशासन नहीं सुन रहा है, जब यह अपने न्यायालय में पीडि़तों का नहीं सुनते हैं तो फिर इनकी जांच मामले में प्रशासन इनकी कैसे सुनेगा, और प्रथम दृष्टि या प्रशासन ने इन्हें दोषी मान लिया है। वैसे तहसीलदार साहब अपने आप को पाकसाफ बताना चाह रहे हैं और वह न्यायालय की शरण भी लेना चाह रहे हैं पर शिकायतकर्ता भी चाह रहे हैं कि वह न्यायालय आए,वहां पर उन्हें और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा वैसे शिकायतकर्ता विरेंद नाथ दुबे के साथ तहसीलदार पर भी अपराध दर्ज करने की शिकायत कर रहे हैं। इसी बीच शैलकुमारी दुबे के परिवार जनों ने फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र को जत कर कार्यवाही करने की मांग को लेकर भी पुलिस अधीक्षक सूरजपुर को एक शिकायत आवेदन भी प्रस्तुत किया है, शिकायतकर्ताओं ने पुलिस अधीक्षक को बताया है की कैसे एक कलयुगी पुत्र ने अपनी सौतेली माँ को कागजों में एक नहीं अलग अलग समय में दो बार मृत बताकर दो स्थानों की भूमि विक्रय की है।
वीरेंद्र दुबे एक तरफ और दूसरे तरफ उनका पूरा परिवार उनके खिलाफ
इन्हीं के कुल में इनके पौत्र पण्डित बालगोविन्द दुबे के पुत्र विद्वान ब्राह्मण द्वारका प्रसाद दुबे के चार पुत्रों के सभी पुत्र रामकृपाल दुबे, महेंद्र दुबे, गोपेश दुबे, दीपेश दुबे रविशंकर दुबे,सतीश दुबे,राजेश दुबे,सीधेश दुबे ने पुलिस अधीक्षक महोदय सुरजपुर से विरेन्द्र दुबे के कृत्यों से पीडि़त होकर उसके विरूद्ध शिकायत करते हुये कहा कि आपराधिक प्रवृत्ति के विरेन्द्र नाथ दुबे द्वारा जीवित शैल कुमारी दुबे को दो बार मृत घोषित कर शैल कुमारी के निजी जमीन के साथ ही परिवार की सम्मिलात खाते की भूमि को सांठगांठ से एक पक्षीय बंटवारा करवा के बेचा जा रहा है, जिससे पूरा परिवार त्रस्त है। सवाल यह भी है कि वीरेंद्र दुबे इतने ही पाकसाफ है और उन्होंने सब कुछ सही तरीके से किया है तो फिर वह अकेले क्यों है? बाकी परिवार के लोग उनके साथ क्यों नहीं है जबकि दूसरी तरफ वीरेंद्र नाथ दुबे को दोषी मानने वालों की संख्या सबसे अधिक है, अब सवाल यह भी की जांच में क्या आता है, वीरेंद्र दुबे जो बोल रहे हैं सही या फिर पूरा परिवार जो बोल रहा है वो सही है?
पिता की तीन शादी और तीनों मां के बच्चों की जमीन पर हिस्से की लड़ाई
पिता ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार तीन शादी की थी और तीनों पत्नियों से अलग-अलग बच्चे हैं और आज संपत्ति पर सभी अपना हक मांग रहे हैं वहीं पूरे जमीन पर विजेंद्र नाथ दुबे पूरा हक जताना चाहते हैं यही वजह है कि लड़ाई काफी दूर निकल पड़ी है वीरेंद्र दुबे किसी को भी हिस्सा नहीं देना चाहते हैं वह जमीन अपनी माता की बता रहे हैं पर वही बाकी उनके सौतेली माता के बच्चे भी उस जमीन पर हकदार हैं और वह भी उसके लिए सारे दस्तावेज प्रस्तुत कर रहे हैं पर वीरेंद्र दुबे जो दस्तावेज प्रस्तुत कर रहे हैं वह कुटरचित है ऐसा बाकी परिवार के सदस्यों का कहना है, इस संबंध में शिकायतकर्ताओं ने बताया की ग्राम कोयलारी के सम्मिलात खाते के भूमि स्वामी पण्डित द्वारका प्रसाद दुबे सूरजपुर के नगर पुरोहित भी थे, उनके चार पुत्रों पण्डित किशुन राम, पण्डित विश्वनाथ दुबे, पण्डित राधेश्याम दुबे व पण्डित ओंकार नाथ दुबे में तीसरे पुत्र पण्डित राधेश्याम दुबे जो कि वन विभाग में रेंजर के पद पर कार्यरत थे, उनके तीन विवाह हुये, पहली पत्नि ऋद्धि से 1954 में विरेन्द्र का जन्म हुआ और जन्म देने के अल्प महीनों में उनका स्वर्गवास हो गया, इसके एक वर्ष पश्चात् उन का विवाह थाड़पाथर (बिहारपुर) निवासी विश्वनाथ पाठक की पुत्री सोनामति (सोनकुंवर) से श्री भोलाप्रसाद पाण्डेय के द्वारा सम्पन्न कराया गया, ग्राम बेदमी के निवासी और सरगुजा के जनरल काउंसलर भोलाराम पाण्डेय सोनकुंवर के मामा थे और सोनकुंवर ननिहाल में ही रहती थीं, विवाह के दो वर्ष पश्चात उनकी भी मृत्यु हो गई, जिसके लगभग डेढ़ वर्ष के पश्चात श्री राधेश्याम दुबे का तृतीय विवाह शैलकुमारी से हुआ जिनसे दो पुत्री और तीन पुत्र हैं।
बिरेन्द्र ने पहली बार 1978 में शैलकुमारी दुबे को मृत बताया
पहली बार सन 1984 में शैलकुमारी दुबे को 1978 में मृत बताते हुये बिरेन्द्र ने नमनाकलां, अम्बिकापुर की भूमि पर नामान्तरण करवा कर के देवनारायण जायसवाल को बेच दिया, इस प्रकरण के पता चलने पर शैलकुमारी दुबे ने अनुविभागीय अधिकारी अम्बिकापुर के समक्ष शिकायत/अपील की,जिस पर उन्हे जीवित मानते हुये उनके नाम पर रिकार्ड पूर्ववत करने का आदेश हुआ।
बिरेन्द्र ने दूसरी बार 1967 में शैलकुमारी दुबे को मृत बताया
दूसरी बार विरेन्द्र ने 1967 में शैलकुमारी को मृत बताते हुये ग्राम करकोटी,भैयाथान की भूमि का नामान्तरण करा कर 2025 में विक्रय कर दी, इसी प्रकरण पर तहसीलदार संजय राठौर निलम्बित हुये, ध्यान देने योग्य तथ्य है कि जिस भूमि का दिनांक 09/02/1967 के फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर नामान्तरण किया वह शैलकुमारी दुबे द्वारा 11/08/1976 को खरीदी गयी थी।
विरेन्द्र के छोटे पुत्र के निधन के बादज्क्षमा याचना किये जाने पर केस पर नही दिया ध्यान जिस वजह से प्रकरण में विरेन्द्र हुए दोषमुक्त: शिकायतकर्ता
शिकायतकर्ता ने बताया की विरेन्द्र के छोटे पुत्र छोटु के दुखद निधन होने पर उपजे वातावरण और विरेन्द्र द्वारा क्षमायाचना किये जाने पर केस पर ध्यान न देकर बचा लिया गया, इस प्रकरण में विरेन्द्र को दोषमुक्त ही किया गया है न कि शैलकुमारी को मृत घोषित किया गया है। केश में बचाये जाने पर भी विरेन्द्र डूबेने दुष्टता न छोड़ी और शैलकुमारी दुबे की करकोटी,तहसील भैयाथान जिला सूरजपुर स्थित भूमि का नामान्तरण दिनांक 09/02/1967 के फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर करवा कर बेच भी दिया जिसमें संजय राठौर तहसीलदार की संलिप्तता होने पर संभागायुक्त सरगुजा ने उसे निलम्बित भी कर दिया है। ध्यान देने योग्य मुख्य बात यह है कि जिस दिनांक 09/02/1967 के फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर नामान्तरण करवा कर बेचा गया है उसे शैलकुमारी दुबे ने दिनांक 11/08/1976 को क्रय की।
मामले से जुड़े कुछ महत्पूर्ण सवाल
सवाल: क्या बिरेन्द्र जेल जाने के भय से इन्हें शैलकुमारी नहीं सोनकुंवर बता रहा है?
सवाल: मान लेते हैं कि यह सोनकुंवर है तो भी किसी की मृत्यु एक बार होती है, बिरेन्द्र ने शैलकुमारी को रिकार्ड में दो बार 1978 व 1967 में मृत घोषित करते हुये दो स्थानों नमनाकला अम्बिकापुर व करकोटी, भैयाथान की भूमि क्यों बेची?
सवाल: बिरेन्द्र दुबे को बताना चाहिए कि किसी की मृत्यु एक बार सम्भव है या दो बार?
सवाल: शैलकुमारी दुबे को 1978 में फौत बताकर नामान्तरण करवा कर देवनारायण जायसवाल को 1984 में बिरेन्द्र ने भूमि बेच दी, शैल कुमारी दुबे की अपील पर उन्हें जीवित मानते हुये न्यायालय ने शैलकुमारी दुबे के नाम रिकार्ड पूर्ववत करने का आदेश किया तो बिरेन्द्र ने अपील क्यों नहीं की?
सवाल: शैलकुमारी दुबे के पति जो कि वन विभाग में रेंजर पद पर थे, उन्होंने सेवानिवृति के समय जो पत्नी के संग संयुक्त फोटो दी जाती है वह जीवित शैलकुमारी के साथ की है तो बिरेन्द्र दुबे को बताना चाहिए कि धर्मप्राण उसके पिता झूठे थे?
सवाल: जीवित शैलकुमारी दुबे का ग्राम कोयलारी के ही जगदीश दुबे से एक भूमि विवाद पचास वर्ष से तहसील न्यायालय से शुरु होकर अभी उच्च न्यायालय तक चल रहा है, क्या जगदीश दुबे शैलकुमारी के भूत से केस लड़ रहे हैं?
सवाल: जीवित शैलकुमारी दुबे की प्रथम पुत्री वन्दना तिवारी का जन्म 1964 का है। बिरेन्द्र के अनुसार शैलकुमारी दुबे की दोनों फर्जी मृत्यु वर्ष 1978 व 1967 में से 1967 को सत्य मान लें तो वन्दना, बिरेन्द्र की सौतेली नहीं वरन सगी बहन होंगीं?
सवाल: यदि बिरेन्द्र के ही अनुसार दो फर्जी मृत्यु वर्ष में 1978 को सही मान लिया जाये तो उसके सभी सौतेले भाई बहन उसके सगे भाई बहन न हो जायेंगे?
सवाल: पण्डित श्री राधेश्याम दुबे के 2010 में दु:खद निधन पश्चात समस्त न्यायालीन प्रकरणों में उनकी पत्नी और सन्तानों का नाम जुड़ा, ऐसे समस्त प्रकरणों में जिसमें कुछ उच्च न्यायालय में भी विचाराधीन हैं उनमें पत्नि रूप में शैलकुमारी दुबे और पुत्रों के नाम बिरेन्द्र भी पक्षकार हैं, बिरेन्द्र ने क्यों नहीं आपत्ति की कि शैल कुमारी का निधन हो चुका है?
सवाल: जब पण्डित श्री राधेश्याम दुबे ने शैलकुमारी दुबे की ओर से मुख्तारनामा बनवाया था बिरेन्द्र को आपत्ति करनी थी कि पिताजी आप मृत व्यक्ति का मुख्तारनामा क्यों बनवा रहे हैं?


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