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कविता@सोचती हूँ कविता लिखूँ…

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पर क्या लिखूं?
कब लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
यह उलझन ही
कब और क्यो के
मध्य की कहानी है?
यह आज की नही,
सदियों पुरानी है।
खत्म हो रही जिन्दगी से-
गीत की रवानी है,
आख भर पानी है-
प्रीति राजा रानी है।
कल कोई कह रहा था,
पहले आया सूरज,
फिर चाँद ; फिर तारे,
फिर जीवन सारे,
मंगल गीत गाने।
पर आज महसूस हुआ-
पहले आया इन्सान,
फिर आई इन्सानियत,
फिर आये हम और तुम?
आत्मा और परमात्मा बनकर-
शून्य से शिखर तक की,
महागाथा रचने।
इसी गाथा मे समाया है,
हमारा समाज,
हमारी संस्कृति,
हमारी सभ्यता,
प्रेम सौन्दर्य मनुहार और
जीवन की अभिलाषा।


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