नई दिल्ली,13 मई 2025 (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि जब महिलाएं राफेल जैसे लड़ाकू विमान उड़ा सकती हैं, तो उन्हें जज एडवोकेट जनरल के पदों पर कम मौके क्यों दिए जा रहे हैं? कोर्ट ने यह सवाल एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उठाया। इस याचिका में महिलाओं के लिए जेएजी के पदों पर कम वेकेंसी होने को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देते हुए सेना को उसे अगले ट्रेनिंग कोर्स में शामिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा कि जब पद जेंडर न्यूट्रल हैं, तो महिलाओं के लिए कम पद क्यों रखे गए हैं?
अगर एक महिला राफेल उड़ा सकती है…
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच ने कहा, अगर एयर फोर्स में एक महिला राफेल उड़ा सकती है,तो आर्मी में जेएजी के पद पर नियुक्ति करने में क्या दिक्कत है? कोर्ट ने सरकार से पूछा कि जब वो कहती है कि जेएजी के पद जेंडर न्यूट्रल हैं, तो महिलाओं के लिए कम पद क्यों रखे जाते हैं। यह याचिका अर्शनूर कौर और एक अन्य महिला ने दायर की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने परीक्षा में चौथा और पांचवां स्थान हासिल किया। वे पुरुष उम्मीदवारों से ज्यादा नंबर लाईं,लेकिन महिलाओं के लिए कम वेकेंसी होने के कारण उनका चयन नहीं हो सका।
जेंडर न्यूट्रैलिटी का मतलब 50ः50 नहीं
कोर्ट ने अर्शनूर कौर को अंतरिम राहत दी। कोर्ट ने केंद्र सरकार और सेना को निर्देश दिया कि उन्हें जेएजी अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए अगले उपलब्ध ट्रेनिंग कोर्स में शामिल किया जाए। अदालत सरकार के इस तर्क से सहमत नहीं थी कि जेएजी के पद जेंडर न्यूट्रल हैं और 2023 से 50:50 का अनुपात रखा जाएगा। कोर्ट ने कहा,जेंडर न्यूट्रैलिटी का मतलब 50:50 प्रतिशत नहीं है। जेंडर न्यूट्रैलिटी का मतलब है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस जेंडर से हैं।
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