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संपादकीय@जब चुनाव आयोग की कुर्सी पर ‘टाइगर’ बैठा था

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दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी पर बैठे एक अधिकारी ने एक दिन ऐसा संदेश दिया था, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी। नाम था—टी.एन. शेषन। दिसंबर 1990 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला और बहुत जल्दी यह स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग किसी सरकार का विभाग नहीं है।
कहा जाता है कि उन्होंने अपने कार्यालय में ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ के बजाय भारत के निर्वाचन आयोग की पहचान को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। यह केवल शब्दों का बदलाव नहीं था, संदेश बड़ा था—निर्वाचन आयोग सरकार से ऊपर नहीं,लेकिन सरकार से स्वतंत्र संवैधानिक संस्था जरूर है।
उस समय चुनावी आचार संहिता मौजूद थी,लेकिन उसका असर आज की तरह व्यापक रूप से महसूस नहीं होता था। शेषन ने उसे चुनावी अनुशासन का औजार बना दिया। सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर रोक,चुनावी खर्च की निगरानी,प्रचार के नियम और मतदाताओं को प्रभावित करने के तौर-तरीकों पर कार्रवाई—इन सबको लेकर आयोग पहले से ज्यादा सक्रिय दिखाई दिया। राजनीतिक नेताओं को यह सख्ती रास नहीं आई। विरोध हुआ,आरोप लगे,अधिकारों की सीमा को लेकर सवाल उठे। लेकिन शेषन पीछे नहीं हटे। उनका तर्क सीधा था—मेरी सीमा संविधान है।
यही वह बात है जो आज फिर याद करने की जरूरत है…
आज चुनाव का मैदान बदल गया है। तब दीवारों पर लिखे नारे, पोस्टर, जुलूस और लाउडस्पीकर चुनावी प्रचार के बड़े माध्यम थे। आज एक मोबाइल फोन हजारों पोस्टर से ज्यादा असर पैदा कर सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ मिनट में संदेश लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। फर्जी खबर, एडिटेड वीडियो, डिजिटल विज्ञापन और ऑनलाइन प्रचार ने चुनाव आयोग के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
इसलिए आज सवाल यह नहीं होना चाहिए
कि क्या आज कोई दूसरा शेषन आएगा?
सवाल यह होना चाहिए कि क्या चुनाव आयोग की संस्था इतनी मजबूत है कि किसी भी सरकार,दल या प्रभावशाली नेता के सामने नियमों को समान रूप से लागू कर सके? लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता केवल मतदान मशीन या मतदान केंद्र से तय नहीं होती। इसकी शुरुआत चुनाव से पहले ही हो जाती है। कौन सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कर रहा है? कौन आचार संहिता की सीमा लांघ रहा है? किसके खिलाफ शिकायत पर कितनी जल्दी कार्रवाई हो रही है? क्या एक ही नियम सभी पर समान रूप से लागू हो रहा है? इन सवालों के जवाब जनता के भरोसे से जुड़े हैं।
यहां एक बात साफ होनी चाहिए—किसी भी राजनीतिक दल या नेता के खिलाफ कार्रवाई होना अपने आप में पक्षपात का प्रमाण नहीं है। उसी तरह कार्रवाई न होना भी अपने आप में पक्षपात का प्रमाण नहीं। असली कसौटी है नियम,प्रक्रिया,प्रमाण और सभी पक्षों के लिए समान मानदंड। शेषन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने चुनाव आयोग की ताकत को केवल कानून की किताब में नहीं रहने दिया,बल्कि उसे चुनावी मैदान में दिखाई देने वाली संस्था बनाया। आज जरूरत किसी व्यक्ति को ‘टाइगर’ बनाने की नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है,जिसमें व्यक्ति बदल जाए,लेकिन संस्था की रीढ़ न बदले। क्योंकि सरकार किसी भी दल की हो सकती है। मुख्यमंत्री कोई भी हो सकता है। प्रधानमंत्री कोई भी हो सकता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष भी समय के साथ बदलते रहते हैं। लेकिन चुनाव आयोग को बदलती राजनीति के साथ नहीं,संविधान के साथ खड़ा रहना है। और शायद यही शेषन के दौर से आज के लिए सबसे बड़ा सबक है…चुनाव में मुकाबला नेताओं का होता है,लेकिन चुनाव की निष्पक्षता की जिम्मेदारी संस्था की होती है।


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