10 दिन का अल्टीमेटम—रपटा मरम्मत,स्थायी पुल और 15 दिन में ध्वस्त निर्माण की जांच की मांग…
30 जून 2025 को टूटा था मुख्य पुल, 15 महीने बाद भी स्थायी समाधान नहीं
ग्रामीणों का सवाल—करोड़ों की सड़क का भूमिपूजन हो सकता है तो गोबरी नदी के पुल की स्वीकृति
और निर्माण क्यों नहीं?
पुल टूटा 15 महीने से,रपटा 15 दिन में बहा—अब एनएच-43 पर आंदोलन
15 महीने का इंतजार,15 लाख का रपटा और सिर्फ 15 दिन की राहत
गोबरी पुल का दर्द : 15 महीने से रास्ता बंद, 15 लाख का रपटा भी बहा…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,23 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। गोबरी नदी का पुल टूटे हुए 15 महीने बीत गए, इस दौरान ग्रामीणों ने इंतजार किया,आवेदन दिए,अधिकारियों से गुहार लगाई और वैकल्पिक व्यवस्था की मांग की,जब लंबे समय तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने अपने स्तर पर भी रास्ता निकालने की कोशिश की,इसके बाद प्रशासन ने करीब 15 लाख रुपये की लागत से रपटा पुल बनवाया,लेकिन जिस वैकल्पिक व्यवस्था को ग्रामीणों की परेशानी दूर करने के लिए बनाया गया था,वह भी महज 15 दिन में पानी के तेज बहाव में बह गई। अब स्थिति यह है कि मुख्य पुल पहले से टूटा है,15 लाख का रपटा भी खत्म हो चुका है और वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर ग्रामीणों के पास कुछ नहीं बचा है,यही कारण है कि अब ग्रामीणों का गुस्सा सड़क पर आने की तैयारी में है, 23 सितंबर को बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि और ग्रामीण जिला कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर रेना जमील को ज्ञापन सौंपा,ज्ञापन में तीन प्रमुख मांगें रखी गईं—ध्वस्त रपटा की तत्काल मरम्मत,गोबरी नदी पर स्थायी एवं गुणवत्तापूर्ण पुल का निर्माण तथा महज 15 दिनों में बह गए रपटा पुल की निष्पक्ष तकनीकी जांच कर जिम्मेदारी तय करना। साथ ही 10 दिन में ठोस कार्रवाई नहीं होने पर एनएच-43 पर डुमरिया स्थित विश्वकर्मा ढाबे के पास धरना-प्रदर्शन और चक्काजाम की पूर्व चेतावनी दी गई है, अब यह मामला सिर्फ एक पुल के टूटने का नहीं रह गया है, यह 15 महीने के इंतजार,15 लाख के रपटा, 15 दिन में उसके बह जाने और अब प्रशासन को दिए गए 10 दिन के अल्टीमेटम का मामला बन चुका है।
30 जून 2025 को टूटा था पुल,15 महीने में नहीं मिला स्थायी रास्ता- गोबरी नदी पर बना मुख्य पुल 30 जून 2025 को टूट गया था, पुल टूटते ही डुमरिया नाका से शिवप्रसाद नगर, भंवराही और आसपास के गांवों की आवाजाही प्रभावित हो गई, पुल किसी एक गांव का रास्ता नहीं था,इस मार्ग से रोजाना ग्रामीणों का आवागमन होता था,स्कूल जाने वाले बच्चे,किसान, मजदूर,मरीज और अन्य जरूरतमंद लोग इसी संपर्क पर निर्भर थे,पुल टूटने के बाद सबसे पहली जरूरत थी—तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था,और दूसरी जरूरत थी—स्थायी पुल का निर्माण,लेकिन 15 महीने बाद भी ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्थायी पुल का निर्माण आखिर कब होगा, समय बीतता गया और समस्या बनी रही।
क्या 15 लाख की वैकल्पिक व्यवस्था केवल 15 दिन के लिए थी?- यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच सबसे ज्यादा उठ रहा है, रपटा निर्माण की लागत करीब 15 लाख रुपये बताई गई है,ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि इतनी राशि खर्च होने के बावजूद संरचना 15 दिन भी नहीं टिक सकी,ग्रामीणों के इन आरोपों की वास्तविकता तकनीकी जांच से ही स्पष्ट होगी,लेकिन 15 दिन में निर्माण के बह जाने की घटना अपने आप में जांच का पर्याप्त आधार जरूर बनती है,इसीलिए ज्ञापन में केवल मरम्मत की मांग नहीं की गई है,बल्कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच,उपयोग की गई सामग्री की जांच,निर्धारित तकनीकी मापदंडों की जांच,निर्माण एजेंसी और ठेकेदार की भूमिका की जांच,संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी की जांच की मांग की गई है,ग्रामीण चाहते हैं कि जांच किसी सामान्य कागजी प्रक्रिया तक सीमित न रहे,बल्कि तकनीकी विशेषज्ञों से कराई जाए।
ग्रामीणों का गंभीर आरोप—भुगतान भी रुका-इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी सामने आई है कि पूर्व में बनाए गए रपटा पुल के ठेकेदार का भुगतान विभाग द्वारा रोका गया है,यदि विभाग ने भुगतान रोक रखा है तो इसके पीछे कारण भी सार्वजनिक होना चाहिए,क्या भुगतान रोकने की वजह रपटा का 15 दिन में बह जाना है? क्या निर्माण की गुणवत्ता पर विभागीय स्तर पर सवाल उठे हैं? क्या तकनीकी जांच की प्रक्रिया शुरू हुई है? क्या ठेकेदार को नोटिस दिया गया है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा गया है? इन सवालों का जवाब अब जरूरी हो गया है, क्योंकि एक तरफ जनता का पैसा खर्च हुआ और दूसरी तरफ जनता को उसका स्थायी लाभ नहीं मिला।
7 जुलाई को खतरे की सूचना, फिर भी क्यों नहीं बचा रपटा?- ज्ञापन में ग्रामीणों ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य रखा है,ग्रामीणों के अनुसार, 7 जुलाई 2026 को अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, भैयाथान को पत्र के माध्यम से पुल की स्थिति और संभावित खतरे से अवगत कराया गया था,यानी प्रशासन को पहले ही स्थिति की जानकारी दी गई थी, इसके बावजूद बाद में रपटा बह गया, अब सवाल यह भी है कि 7 जुलाई के पत्र पर क्या कार्रवाई हुई? क्या मौके का निरीक्षण किया गया? क्या निर्माण की तकनीकी स्थिति देखी गई? क्या संबंधित विभाग को कोई निर्देश दिया गया? क्या संभावित खतरे को देखते हुए कोई सुरक्षा उपाय किया गया? यदि नहीं किया गया तो क्यों? इन सवालों का जवाब भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
रपटा बहा तो हजारों लोगों की समस्या फिर वहीं- रपटा के बह जाने का असर सिर्फ उस स्थान तक सीमित नहीं है,ज्ञापन में बताया गया है कि इसके कारण स्कूली बच्चों, किसानों,मजदूरों, मरीजों और 108 जैसे आपातकालीन वाहनों के आवागमन में परेशानी हो रही है,यह स्थिति बताती है कि गोबरी नदी का पुल ग्रामीणों के लिए केवल सुविधा का साधन नहीं है,यह उनके दैनिक जीवन की आवश्यकता है, किसान के लिए खेत और बाजार के बीच का रास्ता है,बच्चों के लिए स्कूल जाने का रास्ता है,मरीज के लिए अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता है,और आपातकालीन वाहन के लिए समय पर मरीज तक पहुंचने का रास्ता है,ऐसे में 15 महीने तक पुल का स्थायी समाधान नहीं होना ग्रामीणों के लिए गंभीर समस्या है।
अब कलेक्टर के आश्वासन पर टिकी निगाहें- 23 सितंबर को ग्रामीणों ने कलेक्टर रेना जमील को ज्ञापन सौंपा, प्रतिनिधिमंडल से चर्चा के दौरान 15 दिनों के भीतर धरातल पर काम शुरू कराने का आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई है,अब ग्रामीणों के सामने दो समय सीमाएं हैं,ग्रामीणों ने प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है,वहीं कलेक्टर की ओर से 15 दिन में काम शुरू कराने का आश्वासन दिया गया है,इसका अर्थ साफ है—अब ग्रामीण यह देखना चाहते हैं कि आश्वासन के बाद वास्तव में मशीनें कब पहुंचती हैं और काम कब शुरू होता है, क्योंकि इस मामले में ग्रामीण पहले ही लंबे समय तक इंतजार कर चुके हैं।
तीन मांगें, लेकिन मुद्दा एक—स्थायी रास्ता, ज्ञापन में ग्रामीणों ने तीन मुख्य मांगें रखी हैं…
- तत्काल रपटा की मरम्मत ध्वस्त रपटा की तत्काल मरम्मत कर सुरक्षित आवागमन बहाल किया जाए।
- स्थायी पुल का निर्माण गोबरी नदी पर स्थायी एवं गुणवत्तापूर्ण पुल का निर्माण स्वीकृत कर धरातल पर काम शुरू किया जाए।
- 15 दिन में बह गए रपटा की जांच निर्माण की गुणवत्ता, उपयोग की गई सामग्री और तकनीकी मापदंडों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। लापरवाही या अनियमितता पाए जाने पर संबंधित ठेकेदार,निर्माण एजेंसी और अधिकारियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए,इन तीनों मांगों के पीछे ग्रामीणों की एक ही जरूरत है—हर मौसम में सुरक्षित आवागमन।
स्थायी पुल की स्वीकृति कहां अटकी है?- अब यह सबसे बड़ा सवाल है, 30 जून 2025 को पुल टूट गया, 15 महीने गुजर गए, वैकल्पिक रपटा बना,15 दिन में बह गया,अब ग्रामीण फिर स्थायी पुल की मांग कर रहे हैं, तो आखिर स्थायी पुल की स्वीकृति कहां अटकी है? क्या प्रस्ताव तैयार नहीं हुआ? क्या तकनीकी स्वीकृति लंबित है? क्या प्रशासकीय स्वीकृति बाकी है? क्या बजट उपलब्ध नहीं है? क्या निविदा की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई? या कोई अन्य प्रशासनिक कारण है? इनमें से वास्तविक स्थिति क्या है,यह संबंधित विभाग और शासन को स्पष्ट करना चाहिए,ग्रामीणों को अब सिर्फ यह सुनना नहीं है कि पुल बनेगा,वे जानना चाहते हैं की कब बनेगा? किस राशि से बनेगा? कब काम शुरू होगा? कब पूरा होगा?
इधर सड़क चौड़ीकरण का भूमिपूजन, उधर पुल का इंतजार– इसी क्षेत्र में डुमरिया-केवड़ा मार्ग के चौड़ीकरण को लेकर हाल ही में भूमिपूजन हुआ है, सड़क परियोजना के लिए 30.41 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति की बात सामने आ चुकी है,यहीं से गोबरी नदी का मामला और बड़ा हो जाता है, एक तरफ सड़क चौड़ीकरण के लिए करोड़ों रुपये की परियोजना आगे बढ़ रही है,दूसरी तरफ उसी मार्ग की महत्वपूर्ण कड़ी गोबरी नदी पर ग्रामीणों को स्थायी पुल का इंतजार है,यही वजह है कि ग्रामीण अब सवाल कर रहे हैं की जब सड़क चौड़ीकरण की परियोजना आगे बढ़ सकती है तो उसी मार्ग के टूटे पुल का स्थायी समाधान क्यों नहीं? सड़क तभी पूरी तरह उपयोगी होगी जब उस पर निर्बाध आवागमन हो, यदि नदी के पास पहुंचकर रास्ता फिर टूट जाए या आवागमन बाधित हो जाए तो चौड़ी सड़क का पूरा लाभ ग्रामीणों तक पहुंचना मुश्किल होगा।
अब सवाल केवल प्रशासन से नहीं, जनप्रतिनिधियों से भी-क्षेत्र के ग्रामीण लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि जब उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों की स्वीकृतियां और योजनाएं सामने आती हैं,तो गोबरी नदी का स्थायी पुल 15 महीने बाद भी क्यों नहीं बन पाया? यह सवाल स्थानीय विधायक एवं मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण जनप्रतिनिधित्व के स्तर पर भी उठ रहा है,ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब केवल आश्वासन नहीं चाहिए,उन्हें चाहिए की स्थायी पुल, सुरक्षित रास्ता व जवाबदेही, और यदि 15 लाख का रपटा वास्तव में निर्माण संबंधी कमी के कारण बहा है तो दोषियों पर कार्रवाई।
अब एनएच-43 पर बैठने की तैयारी- ग्रामीणों ने अब प्रशासन को लिखित चेतावनी दे दी है, यदि 10 दिन में ठोस कार्रवाई नहीं होती है तो एनएच-43 पर डुमरिया स्थित विश्वकर्मा ढाबे के पास धरना-प्रदर्शन और चक्काजाम की चेतावनी दी गई है। ज्ञापन में इसे लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण आंदोलन बताया गया है और प्रशासन को इसकी पूर्व सूचना दी गई है, जनपद सभापति राजू कुमार गुप्ता ने भी ग्रामीणों के साथ धरने में शामिल होने की बात कही है, अब प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि आंदोलन की स्थिति बनने से पहले समस्या का समाधान किया जाए।
यह सिर्फ पुल नहीं, भरोसे का सवाल भी- 15 महीने का समय ग्रामीणों के लिए बहुत लंबा समय है, एक पुल टूटने के बाद तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए थी, वैकल्पिक व्यवस्था के साथ स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए थी, लेकिन यहां पहले मुख्य पुल टूटा, फिर इंतजार हुआ,फिर रपटा बना, फिर रपटा 15 दिन में बह गया, और अब ग्रामीण फिर उसी जगह खड़े हैं,इसलिए यह सवाल अब सिर्फ ‘पुल कब बनेगा?’ का नहीं है, यह सवाल यह भी है कि क्या जनता की शिकायत को समय पर गंभीरता से लिया गया? क्या निर्माण से पहले पर्याप्त तकनीकी तैयारी हुई? क्या चेतावनी मिलने के बाद कार्रवाई हुई? क्या निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी हुई? और—यदि गलती हुई तो जिम्मेदारी तय होगी या मामला फिर फाइलों में चला जाएगा?
दैनिक घटती-घटना का धारदार सवाल ये है की…गोबरी नदी का पूरा घटनाक्रम अब पांच आंकड़ों में समझा जा सकता है 30 जून 2025 — पुल टूटा, 15 महीने — ग्रामीणों का इंतजार, 15 लाख — रपटा निर्माण की लागत।, 15 दिन — रपटा की उम्र, 10 दिन — ग्रामीणों का अल्टीमेटम,और अब कलेक्टर की ओर से 15 दिन में काम शुरू कराने का आश्वासन,इन आंकड़ों के बीच जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है 15 महीने में स्थायी पुल नहीं बना और 15 लाख का रपटा 15 दिन में बह गया, आखिर गोबरी नदी के नाम पर जनता कब तक इंतजार करती रहेगी रपटा 15 दिन में बहा तो गुणवत्ता की जांच कब होगी 7 जुलाई को खतरे की सूचना के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई ठेकेदार का भुगतान रोका गया है तो जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कब पूरी होगी करोड़ों की सड़क का भूमिपूजन हो सकता है तो उसी रास्ते के टूटे पुल का स्थायी समाधान क्यों नहीं और सबसे बड़ा सवाल अब वैकल्पिक व्यवस्था भी खत्म हो चुकी है,तो ग्रामीणों को स्थायी रास्ता कब मिलेगा ग्रामीणों ने कलेक्टर के सामने अपनी मांग रख दी है, प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया जा चुका है। अब अगली तस्वीर कागज पर नहीं, गोबरी नदी के किनारे दिखाई देनी चाहिए—जहां या तो काम शुरू होगा, या फिर एनएच-43 पर ग्रामीणों का आंदोलन दिखाई देगा।
ग्रामीणों ने पहले गुहार लगाई,फिर खुद मोर्चा संभाला
ग्रामीणों के ज्ञापन में कहा गया है कि मुख्य पुल क्षतिग्रस्त होने के बाद क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से कई बार पुल निर्माण की मांग की,आवेदन और निवेदन का दौर चला, जब समस्या का स्थायी समाधान सामने नहीं आया तो ग्रामीणों ने जनसहयोग से स्वयं रपटा निर्माण शुरू करने का कदम उठाया,इसके बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और रपटा निर्माण के लिए करीब 15 लाख रुपये की शासकीय स्वीकृति दी गई,यानी जिस वैकल्पिक व्यवस्था के लिए ग्रामीण लंबे समय से मांग कर रहे थे, वह आखिरकार बनी,ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इससे कम से कम आवागमन की समस्या कुछ समय के लिए दूर हो जाएगी,लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए।
15 लाख का रपटा…और सिर्फ 15 दिन की राहत
रपटा बना, लागत करीब 15 लाख रुपये, लेकिन राहत मिली कितने दिन? सिर्फ 15 दिन, पानी का बहाव बढ़ा और रपटा पुल धराशायी हो गया, यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है, अगर किसी सार्वजनिक निर्माण पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से जनता यह उम्मीद करती है कि वह निर्माण अपने निर्धारित उद्देश्य को पूरा करेगा, लेकिन यहां स्थिति उलट है, 15 महीने से टूटा मुख्य पुल, 15 लाख रुपये से बना वैकल्पिक रपटा, 15 दिन में रपटा भी बह गया, अब ग्रामीणों के पास फिर वही समस्या है, जो मुख्य पुल टूटने के दिन थी।
करोड़ों की सड़क और 15 लाख का रपटा—दोनों की कहानी अलग क्यों?
डुमरिया-केवड़ा सड़क परियोजना के भूमिपूजन के बाद क्षेत्र में विकास की चर्चा है, लेकिन गोबरी नदी की स्थिति उसी विकास की दूसरी तस्वीर सामने रखती है,एक तरफ करोड़ों की सड़क,दूसरी तरफ 15 लाख का रपटा, एक तरफ भूमिपूजन, दूसरी तरफ 15 महीने से टूटा पुल,एक तरफ विकास की बड़ी परियोजना,दूसरी तरफ ग्रामीणों के लिए नदी पार करने की मूल समस्या,यही विरोधाभास अब ग्रामीणों के आक्रोश की वजह बन रहा है।
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