
- सोनहत महिला-बाल विकास में गुरुजी को प्रभार मिलने से सुशासन पर नई बहस
- कलेक्टर बदले,सरकारें बदलीं…नहीं बदली तो 25 साल पुरानी स्टेनो की कुर्सी,अब गुरुजी को मिला दूसरे विभाग का प्रभार
- कोरिया में ‘सुशासन’ का
- नया मॉडल? 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति के बीच शिक्षक को महिला-बाल विकास की जिम्मेदारी…
- एक कुर्सी 25 साल से कायम,दूसरी पर गुरुजी की तैनाती,कोरिया में प्रतिनियुक्ति व्यवस्था पर उठे सवाल…
- 25 साल पुराना ‘स्टेनो राज’ बरकरार, अब महिला-बाल विकास में भी प्रतिनियुक्ति का नया खेल?
- 25 साल पुरानी कुर्सी से लेकर गुरुजी के नए प्रभार तक…कोरिया की प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल…
-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर/कोरिया,13 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। देश में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया,लेकिन कोरिया जिले में प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े दो मामले ऐसे हैं,जो ‘प्रतिनियुक्ति’और ‘अतिरिक्त प्रभार’ की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं,एक ओर कलेक्टर कार्यालय में करीब 25 वर्षों से चली आ रही स्टेनोग्राफर की व्यवस्था को लेकर सवालों का सिलसिला थम नहीं रहा है,वहीं दूसरी ओर अब एक माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक को महिला एवं बाल विकास विभाग,सोनहत की विकासखंड स्तरीय जिम्मेदारी दिए जाने का मामला सामने आया है। एक मामले में सवाल है कि एक कर्मचारी इतने लंबे समय तक मूल विभाग से अलग प्रशासनिक कार्यालय में कैसे बना रहा, जबकि दूसरे मामले में सवाल यह है कि एक शिक्षक को उसकी मूल शैक्षणिक जिम्मेदारी के साथ दूसरे विभाग की महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी देने की आवश्यकता और नियम क्या हैं? दोनों मामलों को एक साथ देखने पर कोरिया की प्रशासनिक व्यवस्था में प्रतिनियुक्ति, संलग्नीकरण, अतिरिक्त प्रभार,विभागीय विशेषज्ञता और वित्तीय अधिकारों को लेकर पारदर्शिता की जरूरत और अधिक स्पष्ट होती है।
एक कुर्सी 25 साल से कायम, कलेक्टर बदलते रहे-कोरिया कलेक्टर कार्यालय में लंबे समय से स्टेनो के रूप में कार्यरत घनश्याम मिश्रा की पदस्थापना/ प्रतिनियुक्ति को लेकर दैनिक घटती-घटना द्वारा पूर्व में लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं, उपलब्ध दस्तावेजों और पूर्व में सामने आई जानकारी के आधार पर यह दावा किया जाता रहा है कि संबंधित कर्मचारी मूल रूप से मत्स्य विभाग से जुड़े रहे हैं,लेकिन लंबे समय से कलेक्टर कार्यालय में स्टेनोग्राफर के रूप में कार्य करते रहे,यहां सबसे बड़ा सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं,बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की अवधि और वैधानिक आधार का है,यदि यह प्रतिनियुक्ति है तो इसकी मूल अवधि क्या थी? यदि अवधि समाप्त होने के बाद बढ़ाई गई तो प्रत्येक विस्तार का आदेश कहां है? यदि यह संलग्नीकरण है तो इसे इतने लंबे समय तक जारी रखने का नियम क्या है? यदि कर्मचारी का संविलियन हो चुका है तो उसका आदेश क्या है? और यदि संविलियन नहीं हुआ तो मूल विभाग से अलग इतने लंबे समय तक कार्य करने की अनुमति किस आधार पर बनी रही? इन सवालों का जवाब केवल सरकारी रिकॉर्ड और सक्षम प्राधिकारी के आदेश से ही दिया जा सकता है।
और अब शुरू हुआ ‘दूसरा अध्याय’- पुरानी प्रतिनियुक्ति का सवाल अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि महिला एवं बाल विकास विभाग सोनहत से जुड़ी नई प्रशासनिक व्यवस्था ने बहस को और तेज कर दिया,सामने आई जानकारी के अनुसार एक माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक,जो पहले से एक अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिए प्रतिनियुक्ति पर बताए जा रहे हैं, उन्हें सोनहत महिला एवं बाल विकास विभाग के विकासखंड स्तर के कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है,यहीं से सवाल उठता है क्या एक शिक्षक को एक साथ दो अलग-अलग विभागों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि संबंधित विभाग में अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? या फिर यह प्रशासनिक सुविधा के आधार पर लिया गया निर्णय है? यदि यह प्रशासनिक आवश्यकता है तो उसके कारण क्या हैं?
‘गुरुजी’ के पास शिक्षा भी और महिला-बाल विकास की जिम्मेदारी भी?– माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक का मूल दायित्व शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है,दूसरी ओर महिला एवं बाल विकास विभाग की विकासखंड स्तरीय परियोजना में आंगनबाड़ी केंद्रों,पोषण कार्यक्रमों,महिला एवं बाल कल्याण योजनाओं तथा विभागीय प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य होते हैं,ऐसे में शिक्षक को इस विभाग की जिम्मेदारी दिए जाने से विभागीय विशेषज्ञता और कार्य-विभाजन का सवाल सामने आया है,यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को अतिरिक्त प्रभार दिया जाना अपने आप में नियमविरुद्ध नहीं माना जा सकता,वास्तविक स्थिति यह जानने के बाद ही तय होगी कि संबंधित शिक्षक को किस आदेश के तहत प्रभार दिया गया? प्रभार की अवधि कितनी है? क्या यह केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी है? क्या वित्तीय अधिकार भी दिए गए हैं? क्या आहरण एवं संवितरण अधिकारी के अधिकार दिए गए हैं? यदि वित्तीय अधिकार दिए गए हैं तो किस नियम और सक्षम स्वीकृति के तहत? उनकी मूल शैक्षणिक जिम्मेदारी कौन निभाएगा? पहले से चल रही उनकी प्रति नियुक्ति की स्थिति क्या है? यही वे सवाल हैं जिनका उत्तर इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
शिक्षा विभाग के आदेश के बीच शिक्षक की दोहरी जिम्मेदारी पर सवाल- मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 9 सितंबर 2026 को स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से प्राचार्यों के नियमित अध्यापन कार्य को लेकर निर्देश जारी किए जाने की बात सामने आई है,एक तरफ शिक्षा विभाग विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था मजबूत करने और शिक्षकों की शैक्षणिक भूमिका सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा है,दूसरी ओर यदि किसी शिक्षक/प्रधान पाठक को दूसरे विभाग में विकासखंड स्तरीय प्रशासनिक जिम्मेदारी दी जाती है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि उनकी मूल जिम्मेदारी का निर्वहन किस प्रकार होगा, यह विरोधाभास है या प्रशासनिक आवश्यकता—इसका जवाब संबंधित आदेश ही दे सकता है।
सबसे बड़ा सवाल वित्तीय अधिकारों का-महिला एवं बाल विकास विभाग में किसी परियोजना की जिम्मेदारी केवल नाम मात्र का प्रभार नहीं होती,यदि संबंधित व्यक्ति को वित्तीय अधिकार भी दिए गए हैं तो मामला और गंभीर हो जाता है, इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित प्रधान पाठक को केवल परियोजना का प्रशासनिक प्रभार दिया गया है या उनके साथ वित्तीय शक्तियां भी जुड़ी हैं,क्योंकि प्रभार और आहरण-संवितरण अधिकार एक ही चीज नहीं हैं,यदि डीडीओ अथवा अन्य वित्तीय अधिकार दिए गए हैं तो उसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति,लागू वित्तीय नियम और आदेश की शर्तें सामने आना जरूरी है।
एक तरफ 25 साल,दूसरी तरफ नई प्रतिनियुक्ति—क्या व्यवस्था की समीक्षा होगी?- कोरिया में दोनों मामलों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रतिनियुक्ति और अतिरिक्त प्रभार की नीति का समान रूप से पालन कैसे हो रहा है? एक कर्मचारी के कलेक्टर कार्यालय में वर्षों तक बने रहने की स्थिति पर सवाल हैं और अब एक अन्य विभाग के शिक्षक को महिला एवं बाल विकास विभाग में जिम्मेदारी दिए जाने पर सवाल उठ रहे हैं,दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन दोनों में एक साझा प्रश्न है क्या प्रशासनिक पदस्थापना व्यक्ति के अनुसार तय हो रही है या नियम और आवश्यकता के अनुसार? यदि नियम स्पष्ट हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाए। यदि विशेष परिस्थिति में अपवाद किया गया है तो उसका कारण बताया जाए।
‘25 साल पुरानी कुर्सी’ के बाद ‘दूसरी कुर्सी’ की कहानी– कोरिया के इन दोनों मामलों को लेकर अब प्रशासनिक गलियारों में व्यंग्य भी सुनाई दे रहा है कि एक कुर्सी 25 साल से नहीं बदली और अब दूसरी कुर्सी भी नए प्रयोग के साथ चर्चा में आ गई,बेशक यह व्यंग्य है, सरकारी तथ्य नहीं। लेकिन व्यंग्य के पीछे छिपा सवाल गंभीर है—क्या प्रशासनिक व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाओं की समय-समय पर समीक्षा होती है? यदि समीक्षा होती है तो 25 साल पुरानी स्टेनो व्यवस्था पर अब तक निर्णायक फैसला क्यों नहीं हुआ? और यदि शिक्षक को महिला एवं बाल विकास विभाग की जिम्मेदारी देना प्रशासनिक आवश्यकता है तो उस आवश्यकता का आधार क्या है?
‘सुशासन’ की कसौटी पर दोनों मामले- जिला प्रशासन की ओर से पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन पर जोर दिया जाता है, ऐसे में इन दोनों मामलों को भी उसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए,सुशासन का अर्थ केवल नए आदेश जारी करना नहीं है, इसका अर्थ यह भी है कि पुराने आदेशों,प्रतिनियुक्तियों और लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाओं की समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि नियम सभी के लिए समान रूप से लागू हों,एक कर्मचारी को वर्षों तक एक ही जगह बनाए रखने के पीछे यदि ठोस प्रशासनिक कारण है तो वह रिकॉर्ड पर होना चाहिए,इसी तरह किसी शिक्षक को दूसरे विभाग का प्रभार देने के पीछे प्रशासनिक आवश्यकता है तो वह भी आदेश में स्पष्ट होनी चाहिए।
अब प्रशासन के सामने दो सीधे सवाल- कोरिया प्रशासन के सामने अब दो अलग-अलग लेकिन महत्वपूर्ण सवाल खड़े हैं…
पहला— कलेक्टर कार्यालय में करीब 25 वर्षों से चली आ रही स्टेनोग्राफर की व्यवस्था का वर्तमान वैधानिक आधार क्या है और क्या 3 अगस्त 2026 के कार्य-पटल परिवर्तन संबंधी शासन निर्देश के बाद इसकी समीक्षा होगी?
दूसरा—माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक को महिला एवं बाल विकास विभाग सोनहत की जिम्मेदारी देने का आधार क्या है और क्या उन्हें वित्तीय/आहरण-संवितरण अधिकार भी प्रदान किए गए हैं? इन दोनों सवालों का जवाब किसी बयान से नहीं,बल्कि आदेश,सेवा अभिलेख और लागू नियमों से मिलना चाहिए।
‘आजादी’ का सवाल अब प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल- 15 अगस्त का संदर्भ अब भले गुजर चुका हो,लेकिन कोरिया कलेक्टरेट की 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति का सवाल अभी भी कायम है,वहीं महिला एवं बाल विकास विभाग में शिक्षक को जिम्मेदारी देने का नया मामला इस बहस को और आगे ले गया है, एक व्यवस्था 25 साल से चल रही है और दूसरी व्यवस्था अभी शुरू हुई है, पहले मामले में सवाल है—इतने वर्षों बाद समीक्षा कब? दूसरे में सवाल है—शुरुआत ही किस नियम और आवश्यकता के तहत? और दोनों मामलों में जनता का सीधा सवाल है सरकारी व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी है या व्यक्ति व्यवस्था से बड़ा हो गया है?
यदि दोनों व्यवस्थाएं नियमसम्मत हैं तो प्रशासन को स्पष्ट दस्तावेजी जवाब देना चाहिए। यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया संबंधी कमी है तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए,क्योंकि सवाल किसी कर्मचारी के खिलाफ नहीं,उस व्यवस्था के पक्ष में है जिसमें पद,प्रभार,प्रतिनियुक्ति और वित्तीय अधिकार—सब कुछ नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ तय हो, 25 साल पुरानी ‘कुर्सी’ और अब शुरू हुई ‘नई प्रतिनियुक्ति’—दोनों ही मामलों में अब असली परीक्षा कोरिया प्रशासन की है।
कलेक्टर बदले,सरकारें बदलीं…लेकिन सवाल वहीं
कोरिया में समय के साथ कलेक्टर बदले,अधिकारी बदले और प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदलीं, लेकिन घनश्याम मिश्रा से जुड़ी वर्षों पुरानी व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल अब भी बने हुए हैं,इसीलिए यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि शासन-प्रशासन लंबे समय से एक ही स्थान या एक ही कार्य-पटल पर जमे कर्मचारियों को बदलने की नीति पर जोर दे रहा है,तो 25 वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था की समीक्षा कब होगी? यही सवाल उस समय और महत्वपूर्ण हो गया,जब 3 अगस्त 2026 के सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश में लंबे समय से एक ही कार्य-पटल पर काम कर रहे अधिकारी-कर्मचारियों के कार्य-पटल में बदलाव को लेकर व्यवस्था लागू किए जाने की बात सामने आई,यदि किसी कर्मचारी को विशेष परिस्थिति में उसी कार्य-पटल पर बनाए रखना आवश्यक हो तो कारणयुक्त सक्षम अनुमोदन की व्यवस्था भी बताई गई है, ऐसे में कोरिया कलेक्टर कार्यालय को लेकर सीधा सवाल है क्या 25 साल पुरानी व्यवस्था के लिए भी कोई विशेष अनुमति या कारणयुक्त आदेश मौजूद है? यदि है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि नहीं है तो फिर इतने लंबे समय तक यह व्यवस्था कैसे चलती रही,यह जांच का विषय बनता है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur