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रायपुर@ 2019 के नियम पर सवाल, 2021 की पदोन्नतियां जांच के घेरे में—किसने बनाई ‘तरक्की की सीढ़ी’?

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  • चपरासी से Food Safety Officer तक का रास्ता
  • 2023 में केंद्र का संशोधन सामने आया तो 2019 में छत्तीसगढ़ ने किस
  • आधार पर बदला नियम? पदोन्नति के रास्ते से किसे मिला लाभ,अब जांच की मांग…
  • खाद्य सुरक्षा विभाग में 2019 का ‘नियमों का खेल’! 2023 में
  • केंद्र ने बदला नियम,2025 में छत्तीसगढ़ ने फिर किया संशोधन…
  • 2015 के बाद 11 साल तक खाद्य सुरक्षा अधिकारी की
  • सीधी भर्ती क्यों बंद? 2019 के भर्ती संशोधन पर भी उठे बड़े सवाल…
  • व्यापमं का रास्ता बंद,पदोन्नति की सीढ़ी चालू! 11 साल की ‘भर्ती छुट्टी’ और 2019 के नियम पर बड़ा सवाल…
  • 2019 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में खाद्य सुरक्षा अधिकारी की योग्यता और पदोन्नति का प्रावधान
  • 2023 में केंद्र ने किया पहला संशोधन,2025 में छत्तीसगढ़ ने फिर बदले नियम— अब 2019 के प्रावधानों की वैधानिकता और उससे हुई नियुक्तियों की जांच की मांग…


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,13 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन ऐसा विभाग है जिसकी जिम्मेदारी सीधे आम आदमी की थाली, दवा और स्वास्थ्य से जुड़ी है, लेकिन इसी विभाग में खाद्य सुरक्षा अधिकारी की भर्ती, योग्यता और पदोन्नति के रास्ते को लेकर सामने आए सरकारी दस्तावेज अब विभाग की स्थापना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। मामला किसी सामान्य पदोन्नति का नहीं है, मामला उस पद का है जिसके कंधों पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता,नमूना कार्रवाई,निरीक्षण और खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं,ऐसे पद पर नियुक्ति की योग्यता अगर नियमों के अनुसार तय होती है तो उसमें मामूली भी हेरफेर पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर सकता है,इस पूरे प्रकरण में तीन तारीखें बेहद महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं—10 जुलाई 2019,16 जनवरी 2023 और 26 नवंबर 2025, इन तीनों दस्तावेजों को सामने रखकर अब सीधा सवाल है की 2019 में छत्तीसगढ़ ने ऐसा क्या बदला था, जिसका स्पष्ट केंद्रीय नियम संशोधन 2023 में सामने आया?
2013 और 2015 में भर्ती, फिर 11 साल तक ‘भर्ती सूखा’…सिर्फ पदोन्नति का रास्ता खुला?- खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पदों पर भर्ती की प्रक्रिया को लेकर एक और गंभीर सवाल सामने आता है,उपलब्ध तथ्यों के अनुसार 2012 में भर्ती नियम बनाए जाने के बाद 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लगभग 55 पदों व 2015 में व्यापमं के माध्यम से खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लगभग 66 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया और भर्ती प्रक्रिया वर्ष 2013 व 2015 दो चरणों में आगे बढ़ी,इसके बाद करीब 11 वर्षों तक व्यापमं अथवा पीएससी के माध्यम से खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर नियमित सीधी भर्ती के लिए कोई नया विज्ञापन सामने नहीं आया, जबकि इस अवधि में पदोन्नति का रास्ता चलता रहा,यानी सीधी भर्ती के दरवाजे पर जैसे ताला लगा रहा और विभागीय पदोन्नति की सीढ़ी लगातार खुली रही,सवाल यह है कि क्या इतने लंबे अंतराल में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पदों पर भर्ती की आवश्यकता ही नहीं पड़ी,या फिर रिक्तियों को भरने के लिए विभाग ने सीधी भर्ती के बजाय पदोन्नति को ही प्राथमिक रास्ता बना लिया? इससे भी बड़ा सवाल शैक्षणिक योग्यता को लेकर है, खाद्य सुरक्षा अधिकारी जैसे तकनीकी पद के लिए रसायन शास्त्र जैसे विषय में निर्धारित उच्च शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान होने के बावजूद यदि लंबे समय तक सीधी भर्ती नहीं हुई और विभागीय पदोन्नति के माध्यम से पद भरे जाते रहे, तो प्रत्येक पदोन्नति की पात्रता और योग्यता की जांच जरूरी हो जाती है।
2019 का संशोधन सबसे बड़ा सवाल- मामले का सबसे पेचीदा हिस्सा वर्ष 2019 में छत्तीसगढ़ के भर्ती नियमों में किया गया संशोधन है,क्योंकि उपलब्ध केंद्रीय दस्तावेजों के अनुसार खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी से संबंधित पहला संशोधन 2022 के पहले संशोधन नियम,जिसे 16 जनवरी 2023 को भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित किया गया, के माध्यम से हुआ,तो फिर सवाल सीधा है जब केंद्र सरकार के स्तर पर संबंधित नियम में पहला संशोधन 2022 का बताया गया और उसका राजपत्र प्रकाशन जनवरी 2023 में हुआ,तब छत्तीसगढ़ में 2019 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी से संबंधित भर्ती नियमों में संशोधन आखिर किस केंद्रीय नियम,अधिसूचना या वैधानिक आधार पर किया गया था? क्या 2019 का संशोधन केंद्र के उस समय लागू किसी अन्य प्रावधान के आधार पर था? क्या राज्य शासन ने केंद्र से आवश्यक अनुमोदन लिया था? क्या संबंधित फाइल में केंद्रीय अधिनियम और नियमों का स्पष्ट हवाला दिया गया था? और यदि सब कुछ नियमसम्मत था तो 2019 के संशोधन की पूरी नोटशीट, विधिक परीक्षण और अनुमोदन प्रक्रिया सामने आने में आखिर परेशानी क्या है?
‘गलत जानकारी’ देकर नियम बदलने का आरोप…जांच में खुले सच- विभागीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि कहीं उच्चाधिकारियों अथवा सक्षम प्राधिकारी को अपूर्ण अथवा गलत जानकारी प्रस्तुत कर 2019 का संशोधन तो नहीं कराया गया? फिलहाल यह एक आरोप है और इसकी पुष्टि स्वतंत्र जांच के बिना नहीं की जा सकती, लेकिन यदि ऐसा कोई आरोप सामने आया है तो इसकी जांच बेहद गंभीरता से होनी चाहिए। खासकर यह पता लगाना जरूरी है कि 2019 के संशोधन का प्रस्ताव किसने तैयार किया, किस अधिकारी ने नियमों की व्याख्या की, किस स्तर पर फाइल चली,किसने अनुमोदन दिया और किस आधार पर खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति का रास्ता खोला गया,क्योंकि यहां मामला सिर्फ एक भर्ती नियम का नहीं है,इस संशोधन के आधार पर यदि वर्षों तक पदोन्नतियां हुईं और लोगों को खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनाया गया, तो उस पूरे तंत्र की वैधानिकता स्वतः जांच के दायरे में आती है।
2015 में सीधी भर्ती के समय योग्यता थी स्पष्ट-उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों में 2015 का भर्ती विज्ञापन भी मौजूद है,खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने उस समय खाद्य सुरक्षा अधिकारी के 71 पदों के लिए भर्ती विज्ञापन जारी किया था, विज्ञापन में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता में खाद्य प्रौद्योगिकी,डेयरी प्रौद्योगिकी,जैव प्रौद्योगिकी,कृषि विज्ञान,पशु चिकित्सा विज्ञान,जैव-रसायन,सूक्ष्म जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान जैसे विषयों में निर्धारित डिग्री का उल्लेख किया गया था, अर्थात सीधी भर्ती के समय विभाग स्वयं यह स्पष्ट कर रहा था कि खाद्य सुरक्षा अधिकारी कोई सामान्य प्रशासनिक पद नहीं है,इसके लिए निर्धारित विषय में निर्धारित शैक्षणिक योग्यता आवश्यक है,यहीं से आगे की कहानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
10 जुलाई 2019 : राजपत्र में आया नया रास्ता-10 जुलाई 2019 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में खाद्य एवं औषधि प्रशासन की भर्ती नियमावली में संशोधन प्रकाशित हुआ, इसके अनुसूची-III में खाद्य सुरक्षा अधिकारी की शैक्षणिक योग्यता का उल्लेख है,दस्तावेज में खाद्य प्रौद्योगिकी,डेयरी प्रौद्योगिकी,जैव प्रौद्योगिकी,तेल प्रौद्योगिकी,कृषि विज्ञान,पशु चिकित्सा विज्ञान,जैव-रसायन,सूक्ष्म जीव विज्ञान तथा रसायन विज्ञान आदि से संबंधित डिग्री का प्रावधान दिखाई देता है,लेकिन इसी राजपत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अनुसूची-IV है, इसमें चपरासी/ऑफिस अटेंडेंट से असिस्टेंट ग्रेड-III/सैंपल असिस्टेंट तक प्रमोशन का रास्ता दिया गया है,इसके लिए पांच साल की सेवा का प्रावधान है,इसके बाद सैंपल असिस्टेंट से ड्रग इंस्पेक्टर/फूड सेफ्टी ऑफिसर तक प्रमोशन का प्रावधान दर्ज है, जिसके लिए 10 वर्ष की सेवा का उल्लेख है, दस्तावेज में पदोन्नति के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता का भी संदर्भ अनुसूची-III से जोड़ा गया है,यानी दस्तावेजों को देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि 2019 में चपरासी को सीधे फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाने का नियम बना दिया गया,वास्तविक व्यवस्था एक पदोन्नति श्रृंखला की थी,लेकिन इसी कारण सवाल और गंभीर हो जाता है,अगर पदोन्नति की सीढ़ी बनाई गई थी तो उस सीढ़ी पर चढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास फूड सेफ्टी ऑफिसर के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता थी या नहीं? यह जांच का विषय है।
2019 का संशोधन आखिर किस प्रक्रिया से हुआ?- अब सबसे कठोर सवाल विभाग की स्थापना शाखा से है, अगर 2019 में फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद की योग्यता और पदोन्नति व्यवस्था में संशोधन किया गया, तो उस संशोधन की मूल नस्ती कहां है? उस फाइल में क्या प्रस्ताव था? किस अधिकारी ने प्रस्ताव तैयार किया? किस स्तर पर परीक्षण हुआ? क्या विधि विभाग की राय ली गई? क्या खाद्य सुरक्षा आयुक्त की स्वीकृति थी? क्या केंद्र सरकार के संबंधित प्रावधानों का परीक्षण किया गया? क्या आवश्यक अनुमोदन प्राप्त किया गया? और सबसे अहम 2019 के इस संशोधन के आधार पर जिन कर्मचारियों को आगे चलकर पदोन्नति मिली, उनकी शैक्षणिक योग्यता की जांच किस स्तर पर हुई? इन सवालों का जवाब केवल विभागीय रिकॉर्ड दे सकता है।
फिर 16 जनवरी 2023 को केंद्र सरकार का संशोधन क्यों महत्वपूर्ण है?- भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 16 जनवरी 2023 को खाद्य सुरक्षा और मानक (प्रथम संशोधन) नियम, 2022 अधिसूचित किए गए,राजपत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह संशोधन खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम,2006 की धारा 91 के तहत किया गया, इसमें 2020 के मसौदा नियमों पर जनता से प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर केंद्र सरकार द्वारा विचार किए जाने का उल्लेख भी है, इसके बाद खाद्य सुरक्षा और मानक नियम,2011 के नियम 2.1 में संशोधन किया गया, खाद्य सुरक्षा अधिकारी से संबंधित नियम 2.1.3 में योग्यता का प्रावधान बदला गया, इसमें फूड टेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी,ऑयल टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चरल साइंस,वेटरनरी साइंसेज,बायो-केमिस्ट्री,माइक्रोबायोलॉजी और केमिस्ट्री जैसे सब्जेक्ट्स में बैचलर, मास्टर या डॉक्टरेट डिग्री की व्यवस्था दिखती है,यानी केंद्र का संशोधन कोई तय किया गया डिविजनल बदलाव नहीं था,उसके लिए ड्राफ्ट जारी हुआ,आपत्तियां आमंत्रित हुईं,उन पर विचार हुआ और फिर राजपत्र में अंतिम अधिसूचना प्रकाशित हुई,यहीं से 2019 के राज्य संशोधन को लेकर सवाल और धरदार हो जाता है।
अगर केंद्र ने 2023 में संशोधन किया तो 2019 में राज्य ने किस आधार पर बदलाव किया?-यह प्रश्न किसी अनुमान पर नहीं बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों की तारीखों के कारण उठ रहा है, 10 जुलाई 2019 — छत्तीसगढ़ राजपत्र में संशोधन,16 जनवरी 2023 — केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा और मानक नियम,2011 में प्रथम संशोधन नियम, 2022 की अधिसूचना,26 नवंबर 2025 — छत्तीसगढ़ शासन द्वारा अपने भर्ती नियमों में फिर संशोधन, 2025 के छत्तीसगढ़ राजपत्र में संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन (अराजपत्रित) सेवा भर्ती नियम,2011 में संशोधन किया गया, इसमें खाद्य सुरक्षा अधिकारी की योग्यता से संबंधित प्रावधानों को फिर से अधिकृत किया गया और बैचलर/मास्टर/डॉक्टरेट डिग्री से संबंधित योग्यता शामिल की गई,तो फिर 2019 और 2023 के बीच लागू व्यवस्था का आधार क्या था? यही वह सवाल है जिस पर विभाग को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए।
‘नियम’ अगर सही थे तो फाइल खोलने में डर कैसा?– विभाग के पास यदि 2019 का संशोधन पूरी तरह नियमसम्मत था तो संबंधित पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड में होगी, नोटशीट होगी, प्रस्ताव होगा,अनुमोदन होगा, विधिक परीक्षण होगा,संबंधित अधिकारियों की टिप्पणियां होंगी,राजपत्र प्रकाशन की प्रक्रिया होगी,और यदि किसी केंद्रीय प्रावधान के आधार पर राज्य ने संशोधन किया था तो उसका पत्राचार भी उपलब्ध होना चाहिए,फिर इस मामले में जांच इतनी कठिन क्यों होनी चाहिए? जनता यह जानना चाहती है कि नियम किसके लिए बनाए गए और उनका इस्तेमाल किस तरह हुआ।
सैंपल असिस्टेंट से फ़ूड सेफ़्टी ऑफि़सर असली जांच यहां से शुरू होनी चाहिए- 2019 के राजपत्र में सैंपल असिस्टेंट से ड्रग इंस्पेक्टर/फ़ूड सेफ़्टी ऑफि़सर तक पदोन्नति के लिए 10 वर्ष की सेवा का प्रावधान दर्ज है,साथ ही पदोन्नति के लिए शैक्षणिक योग्यता का संदर्भ भी दिया गया है,इसलिए अब प्रत्येक पदोन्नति की अलग-अलग जांच की आवश्यकता है, कर्मचारी की नियुक्ति किस पद पर हुई थी? सैंपल असिस्टेंट कब बना? 10 वर्ष की सेवा कब पूरी हुई? डीपीसी में कौन-कौन सदस्य थे? अनुशंसा किसने की? अंतिम पदोन्नति आदेश किस अधिकारी ने जारी किया? इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह पता चल सकेगा कि 2019 के नियमों का वास्तविक इस्तेमाल किस प्रकार हुआ।
2021 की पदोन्नतियों पर भी उठे सवाल-इस पूरे प्रकरण में विभागीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आया है कि 2019 के संशोधित प्रावधानों के आधार पर बाद के वर्षों में सैंपल असिस्टेंट्स को फ़ूड सेफ़्टी ऑफि़सर के पद पर पदोन्नति दी गई, यदि ऐसा हुआ है तो उन सभी आदेशों की वैधानिक जांच आवश्यक है,खासकर उन कर्मचारियों के मामले में जिन्हें लंबे समय तक सैंपल असिस्टेंट्स के पद पर रहने के बाद फ़ूड सेफ़्टी ऑफि़सर बनाया गया, यहां किसी कर्मचारी को दोषी मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन पदोन्नति की फाइल खोलकर योग्यता और प्रक्रिया की जांच करना विभाग की जिम्मेदारी जरूर है,क्योंकि सरकारी पदोन्नति में केवल वरिष्ठता या सेवा अवधि ही सब कुछ नहीं होती,संबंधित पद के लिए निर्धारित योग्यता और नियमों का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
‘खाद्य सुरक्षा’ के विभाग में नियमों की सुरक्षा कौन करेगा?- जिस विभाग की जिम्मेदारी मिलावट रोकने और जनता को सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की है, उसी विभाग में अगर भर्ती नियमों और पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर सवाल उठें तो इसे सामान्य प्रशासनिक विवाद कहकर टालना बेहद आसान रास्ता होगा,लेकिन आसान रास्ता हमेशा सही रास्ता नहीं होता,यहां जरूरत है स्वतंत्र और दस्तावेज आधारित जांच की, 2019 के संशोधन की मूल फाइल निकाली जाए, उसमें दर्ज सभी अनुमोदनों की जांच हो,2019 से अब तक खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद पर हुई सभी पदोन्नतियों की सूची बनाई जाए,प्रत्येक कर्मचारी की शैक्षणिक योग्यता का सत्यापन किया जाए,डीपीसी की कार्यवाही सार्वजनिक की जाए,और यदि नियम बनाने या लागू करने में किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाए, क्योंकि सरकारी नियम कोई निजी संपत्ति नहीं हैं, जिन्हें सुविधा के हिसाब से मोड़ा जाए,अगर 2019 का संशोधन नियमों के मुताबिक था तो विभाग को पूरे दस्तावेज सामने रखने चाहिए और सवालों का पटाक्षेप करना चाहिए,अगर प्रक्रिया में कमी थी तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए,और अगर किसी कर्मचारी को निर्धारित योग्यता के बिना लाभ मिला है तो वह भी रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए, अब सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं रह गया है,सवाल है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पद की नियुक्ति और पदोन्नति व्यवस्था में नियम सर्वोपरि थे या फिर नियमों के साथ सुविधा का रास्ता भी बनाया गया था, जवाब विभाग को देना है,दस्तावेजों के साथ देना है, और साफ-साफ देना है,क्योंकि खाद्य सुरक्षा विभाग में अगर नियमों की ही सुरक्षा संदिग्ध हो जाए,तो फिर जनता अपनी थाली की सुरक्षा का भरोसा किस पर करे?
11 साल में भर्ती नहीं तो सवाल और बड़ा
2015 के बाद लंबे समय तक सीधी भर्ती नहीं होने और इसी बीच पदोन्नति से पद भरने की स्थिति पर भी विभाग को जवाब देना चाहिए,क्या पद रिक्त नहीं थे? यदि रिक्त थे तो भर्ती क्यों नहीं हुई? यदि भर्ती की जरूरत थी तो व्यापमं अथवा पीएससी के माध्यम से विज्ञापन क्यों नहीं निकला? और यदि पदोन्नति से ही पद भरने थे तो पदोन्नत कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता और पात्रता का सत्यापन किस स्तर पर किया गया? यही वह जगह है जहां विभागीय व्यवस्था को अपने ही दस्तावेजों के सामने खड़ा होना पड़ेगा,नियम अगर साफ हैं तो जवाब भी साफ होना चाहिए,और अगर नियमों के रास्ते में कहीं कोई ‘शॉर्टकट’ लिया गया है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए,क्योंकि खाद्य सुरक्षा अधिकारी की कुर्सी कोई सामान्य कुर्सी नहीं है…यह जनता की थाली की सुरक्षा से जुड़ी कुर्सी है,उस कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता अगर नियमों से बना है तो पूरा नक्शा सार्वजनिक होना चाहिए, और अगर नक्शे में कहीं गुप्त दरवाजा बनाया गया था तो उसे भी खोलना होगा।
क्या स्थापना शाखा ने
नियमों की निगरानी की?

भर्ती नियमों में संशोधन कोई कार्यालयीन नोटिंग की मामूली प्रक्रिया नहीं है,यह तय करता है कि सरकारी सेवा में कौन व्यक्ति किस पद तक पहुंच सकता है, ऐसे में यदि नियमों में कोई विसंगति है तो उसका प्रभाव वर्षों तक चलता है,और यदि किसी पद के लिए योग्यता का रास्ता बदलता है तो उसका लाभ लेने वाले प्रत्येक कर्मचारी की पात्रता का परीक्षण होना चाहिए, इसीलिए स्थापना शाखा की भूमिका इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण हो जाती है,किसके कार्यकाल में प्रस्ताव चला? किसने नियम का मसौदा तैयार किया? किसने उसे अनुमोदित किया? किस आधार पर पदोन्नति की पात्रता तय हुई? किसने डीपीसी को रिकॉर्ड उपलब्ध कराया? और यदि कहीं कोई आपत्ति आई थी तो उसका निराकरण किस प्रकार किया गया? इन सवालों को दबाने से मामला खत्म नहीं होगा।
दस्तावेज बोल रहे हैं,
अब विभाग की बारी है…

इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि विभाग के सामने सवाल कागजों से निकलकर आ रहे हैं, 2019 का राजपत्र मौजूद है,2023 का केंद्र सरकार का संशोधन मौजूद है,2025 का छत्तीसगढ़ राजपत्र मौजूद है, 2015 की भर्ती का दस्तावेज मौजूद है,अब जरूरत केवल यह पता लगाने की है कि इन नियमों के बीच अधिकारियों ने क्या प्रक्रिया अपनाई,2019 के नियम में पदोन्नति का रास्ता मौजूद है, 2023 में केंद्र सरकार ने क्रह्वद्यद्ग 2.1.3 में संशोधन किया, 2025 में छत्तीसगढ़ ने फिर अपने भर्ती नियम में संशोधन किया, अब सवाल केवल इतना है की इन बदलावों के बीच जिन लोगों को पदोन्नति मिली, वे किस नियम के तहत पात्र थे?


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