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सूरजपुर@ चुनाव समिति ही सवालों के घेरे में,जामा मस्जिद चुनाव में बढ़ा घमासान

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  • तीन सदस्यों को हटाने की मांग,मतदाता सूची से लेकर कथित ऑडियो तक विवाद…
  • जामा मस्जिद चुनाव समिति पर उठे सवाल,तीन सदस्यों को हटाने की मांग…
  • जामा मस्जिद चुनाव में बढ़ा विवाद, मतदाता सूची और समिति की भूमिका पर सवाल…
  • चुनाव समिति ही विवादों में,जामा मस्जिद के निष्पक्ष चुनाव पर उठे सवाल…
  • जामा मस्जिद चुनाव में घमासान,कथित ऑडियो ने बढ़ाई हलचल…
  • मतदाता सूची से चुनाव समिति तक विवाद,जामा मस्जिद चुनाव में बढ़ा तनाव


-शमरोज खान-
सूरजपुर,12 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
शहर की करीब एक सदी पुरानी बताई जाने वाली जामा मस्जिद में मुतवल्ली/सदर पद के चुनाव को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है, वर्षों तक आपसी सहमति और सामाजिक समन्वय के आधार पर समिति के गठन की परंपरा के बाद पिछले कुछ वर्षों से यहां चुनाव की प्रक्रिया अपनाई जा रही है,इस बार होने वाली चुनावी कवायद को तीसरा चुनाव बताया जा रहा है,लेकिन चुनाव से पहले ही मतदाता सूची,सदस्यता, चुनाव समिति की भूमिका, प्रत्याशियों को लेकर कथित पक्षपात और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में जामा मस्जिद के चुनाव सदस्य इकबाल खान ने छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज को लिखित शिकायत भेजकर चुनाव समिति के तीन सदस्यों में सेराज अहमद सेराजू,फिरोज खान और सरताज अली को समिति से हटाने की मांग की है,शिकायत में इन सदस्यों पर चुनाव मार्गदर्शिका और वक्फ बोर्ड के नियमों के कथित उल्लंघन,अभद्र व्यवहार तथा एक संभावित प्रत्याशी के खिलाफ पक्षपात करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं,हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित चारों सदस्यों का पक्ष सामने आना बाकी है,ऐसे में पूरे मामले में निष्पक्ष जांच के बाद ही आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट हो सकेगी।
100 साल पुरानी बताई जाती है जामा मस्जिद-स्थानीय लोगों के अनुसार सूरजपुर शहर की जामा मस्जिद काफी पुरानी है और इसे करीब 100 वर्ष पुराना बताया जाता है,मस्जिद से जुड़े लोगों की संख्या भी बड़ी है और स्थानीय स्तर पर इसे शहर की प्रमुख धार्मिक संस्थाओं में माना जाता है,लंबे समय तक मस्जिद की व्यवस्था और मुतवल्ली/समिति के गठन को लेकर चुनाव के बजाय आपसी सहमति को प्राथमिकता दी जाती रही है,समाज के लोगों के बीच चर्चा और सहमति के आधार पर व्यवस्था चलती रही थी,लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्थिति में बदलाव आया और समिति के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई,स्थानीय लोगों के अनुसार इस बार की प्रक्रिया तीसरे चुनाव के रूप में सामने आई है,यही चुनाव अब विवादों के बीच पहुंच गया है।
चुनाव से पहले ही क्यों बढ़ा विवाद?-मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव कराने के लिए गठित समिति पर ही यदि निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो जाएं तो चुनाव की विश्वसनीयता कैसे कायम रहेगी? शिकायतकर्ता का आरोप है कि चुनाव समिति के कुछ सदस्य अपनी भूमिका का निष्पक्ष निर्वहन करने के बजाय एक पक्ष के प्रति झुकाव रखते हैं,शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि समिति के कुछ सदस्य एक संभावित प्रत्याशी इश्तियाक अहमद के खिलाफ कथित रूप से सक्रिय हैं,यदि यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं,वहीं यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो चुनाव समिति के सदस्यों को भी अपना पक्ष रखने और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का अवसर मिलना चाहिए,यही वजह है कि अब विवाद का समाधान केवल चुनाव कराने से नहीं,बल्कि चुनाव से पहले उठे सवालों का जवाब देने से जुड़ गया है।
तीन सदस्यों को चुनाव समिति से हटाने की मांग-जामा मस्जिद चुनाव सदस्य इकबाल खान की ओर से वक्फ बोर्ड अध्यक्ष को भेजे गए आवेदन में चुनाव समिति के तीन सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, शिकायत में आरोप लगाया गया है कि चुनाव मार्गदर्शिका का कथित रूप से पालन नहीं किया जा रहा है,चुनाव समिति के कुछ सदस्यों पर मनमानी करने का आरोप है,कार्यवाहक कमेटी के सदस्यों के साथ कथित रूप से अभद्र व्यवहार किया गया,एक संभावित प्रत्याशी के खिलाफ कथित रूप से पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है,ऐसी स्थिति में निष्पक्ष चुनाव कराना मुश्किल हो सकता है,शिकायतकर्ता ने वक्फ बोर्ड से मांग की है कि आरोपों की जांच कर संबंधित सदस्यों को चुनाव समिति से हटाया जाए और नई निष्पक्ष चुनाव समिति गठित की जाए।
चुनाव कार्यक्रम में भी हुआ बदलाव- उपलब्ध दस्तावेजों से यह भी सामने आता है कि जामा मस्जिद चुनाव के लिए पहले एक समय-सारणी जारी की गई थी और बाद में नई समय-सारणी जारी की गई,पहले जारी कार्यक्रम के अनुसार मतदान की तारीख 11 जुलाई 2026 निर्धारित थी,वहीं बाद में जारी समय-सारणी के अनुसार मतदान अब 10 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है,नई समय-सारणी के मुताबिक—4 से 11 सितंबर— मतदाता सूची पर दावा-आपत्ति,17 एवं 18 सितंबर—नामांकन फार्म वितरण,20 एवं 21 सितंबर—नामांकन फार्म जमा,25 सितंबर — फार्मों की स्क्रूटनी,30 सितंबर—फार्म वापसी एवं वोटर लिस्ट,1 अक्टूबर—प्रत्याशियों के नाम नोटिस बोर्ड पर,2 से 9 अक्टूबर—चुनाव प्रचार, 10 अक्टूबर—मतदान एवं मतगणना/ परिणाम,दस्तावेज के अनुसार मतदान सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक जामा मस्जिद क्षेत्र स्थित कार्यालय में कराया जाना प्रस्तावित है।
पहले चुनाव,अब विवाद…क्यों महत्वपूर्ण है यह चुनाव?-मस्जिद की प्रबंधन व्यवस्था से जुड़े चुनाव में केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं होता,मुतवल्ली या प्रबंधन से जुड़े पदों के माध्यम से मस्जिद की व्यवस्थाओं,संपत्ति,धार्मिक गतिविधियों और प्रशासनिक मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय प्रभावित हो सकते हैं,इसी वजह से चुनाव में शामिल सदस्यों के बीच यह अपेक्षा रहती है कि प्रक्रिया स्पष्ट नियमों के तहत हो और किसी भी व्यक्ति या समूह को अनुचित लाभ न मिले, स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवाल इसी व्यापक चिंता से जुड़े हैं।
चुनाव रोकने की मांग नहीं,निष्पक्ष चुनाव की मांग-शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों को देखने पर विवाद का एक प्रमुख पहलू यह भी सामने आता है कि शिकायतकर्ता चुनाव प्रक्रिया समाप्त करने की मांग के बजाय निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव समिति की भूमिका की समीक्षा और आवश्यकता पड़ने पर नई समिति बनाने की मांग कर रहे हैं,यानी विवाद का मूल प्रश्न यह नहीं है कि चुनाव होना चाहिए या नहीं,बल्कि यह है कि चुनाव किस नियम और किस निगरानी व्यवस्था के तहत होगा, यदि सभी पक्षों को समान अवसर मिले,मतदाता सूची स्पष्ट हो, पात्र मतदाताओं की पहचान तय नियमों के अनुसार हो और चुनाव समिति की निष्पक्षता पर भरोसा कायम हो तो चुनाव परिणाम को स्वीकार करना भी आसान होगा।
वक्फ बोर्ड के सामने अब कई सवाल– इस पूरे मामले में अब नजर छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड पर है, बोर्ड के सामने मुख्य रूप से ये सवाल हैं क्या चुनाव समिति के तीन सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच होगी? मतदाता सूची तैयार करने का आधार क्या है? जामा मस्जिद के चुनाव में सदस्यता और मतदान की पात्रता किस नियम से तय होगी? अन्य मस्जिदों या क्षेत्रों से जुड़े लोगों की भूमिका क्या होगी? चुनाव कार्यक्रम में बदलाव किस आधार पर किया गया? कथित ऑडियो की सत्यता की जांच कराई जाएगी या नहीं? यदि समिति पर आरोप सही पाए जाते हैं तो क्या नई निष्पक्ष समिति गठित की जाएगी? इन सवालों के स्पष्ट जवाब चुनाव से पहले मिलना इसलिए जरूरी है ताकि मतदान के बाद परिणाम को लेकर नया विवाद खड़ा न हो।
प्रशासन की चुप्पी भी चर्चा में-मामले में स्थानीय स्तर पर जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,हालांकि मस्जिद के आंतरिक चुनाव की प्रक्रिया संबंधित धार्मिक संस्था और वक्फ व्यवस्था के नियमों के तहत संचालित होती है,लेकिन यदि विवाद कानून-व्यवस्था अथवा सार्वजनिक शांति से जुड़ता है तो प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, ऐसे में प्रशासन और वक्फ बोर्ड के स्तर से यह स्पष्ट किया जाना जरूरी होगा कि चुनाव प्रक्रिया की निगरानी और विवाद की स्थिति में किसकी क्या जिम्मेदारी है।
अब असली परीक्षा निष्पक्षता की– जामा मस्जिद चुनाव की प्रक्रिया अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां किसी एक पक्ष के आरोप या दावे से ज्यादा महत्वपूर्ण निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया है,चुनाव समिति पर लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, यह जांच का विषय है, कथित ऑडियो वास्तविक है या नहीं,यह तकनीकी परीक्षण से स्पष्ट हो सकता है, मतदाता सूची में कौन पात्र है,यह निर्धारित नियमों से तय किया जा सकता है,लेकिन यदि इन सवालों का समाधान मतदान से पहले नहीं हुआ तो 10 अक्टूबर का चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी विवाद समाप्त होने के बजाय और बढ़ सकता है,जामा मस्जिद के चुनाव में अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि ‘कौन जीतेगा?—बड़ा सवाल यह है कि‘क्या चुनाव प्रक्रिया पर सभी पक्षों का भरोसा कायम रहेगा?’ वक्फ बोर्ड की निष्पक्ष जांच,स्पष्ट मतदाता सूची और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया ही इस विवाद का सबसे विश्वसनीय समाधान बन सकती है।
मतदाता सूची भी बनी विवाद का केंद्र
उपलब्ध चुनाव संबंधी दस्तावेजों के अनुसार मतदाता सूची को लेकर दावा-आपत्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, एक पूर्व सूचना में 8 जून से 15 जून 2026 तक मतदाता सूची पर दावा-आपत्ति का समय निर्धारित किया गया था,बाद में जारी दस्तावेज में नई समय-सारणी के अनुसार 4 सितंबर से 11 सितंबर 2026 तक दावा-आपत्ति की अवधि निर्धारित की गई है,सूचना में कहा गया है कि जिन व्यक्तियों का नाम मतदाता सूची में नहीं है,वे निर्धारित अवधि के भीतर अपना नाम जोड़ने के लिए दावा-आपत्ति प्रस्तुत कर सकते हैं,इसके लिए वोटर आईडी और आधार कार्ड की छायाप्रति प्रस्तुत करने का उल्लेख है, यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—जामा मस्जिद के चुनाव में मतदाता बनने के लिए सदस्यता का आधार क्या है और कौन व्यक्ति मतदान के लिए पात्र है? यदि इस सवाल का स्पष्ट और लिखित उत्तर सभी सदस्यों के सामने रखा जाए तो विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
एक मस्जिद की सदस्यता बनाम दूसरे क्षेत्र का हस्तक्षेप?
सूरजपुर में अलग-अलग क्षेत्रों में कई मस्जिदें होने की बात स्थानीय लोग बताते हैं, सामान्य तौर पर लोग अपने क्षेत्र की मस्जिद की गतिविधियों और व्यवस्था से जुड़े रहते हैं, ऐसे में जामा मस्जिद के चुनाव को लेकर स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या किसी अन्य क्षेत्र या दूसरी मस्जिद से जुड़े व्यक्ति को जामा मस्जिद के चुनाव में मतदाता अथवा निर्णायक भूमिका मिल सकती है? शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया में ऐसे लोगों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है जिनका जामा मस्जिद की नियमित सदस्यता से सीधा संबंध नहीं है,यह आरोप भी जांच का विषय है,चुनाव की निष्पक्षता के लिए आवश्यक होगा कि चुनाव समिति और वक्फ बोर्ड स्पष्ट करें कि मतदाता सूची तैयार करने का आधार क्या है और सदस्यता के कौन से दस्तावेज मान्य हैं।
क्या चुनाव समिति की भूमिका पर उठे सवालों की जांच होगी?
किसी भी चुनाव में चुनाव समिति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, मतदाता सूची तैयार करने से लेकर नामांकन,स्क्रूटनी,प्रचार अवधि,मतदान और परिणाम तक पूरी प्रक्रिया की निगरानी समिति के जिम्मे होती है,ऐसे में समिति के सदस्यों पर पक्षपात का आरोप लगना स्वयं में गंभीर विषय है,हालांकि केवल शिकायत के आधार पर आरोपों को सत्य नहीं माना जा सकता,लेकिन यदि लिखित शिकायत के साथ दस्तावेज,गवाह या अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनकी जांच कराना आवश्यक हो जाता है,इससे न केवल शिकायतकर्ताओं को संतुष्टि मिलेगी,बल्कि चुनाव समिति पर लगाए जा रहे आरोपों की वास्तविक स्थिति भी सामने आएगी।
कथित ऑडियो ने बढ़ाई चुनावी हलचल…
विवाद के बीच चुनाव समिति के सदस्यों से संबंधित बताया जा रहा एक कथित ऑडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल होने की चर्चा है, दावा किया जा रहा है कि बातचीत में कुछ लोगों के बीच एक-दूसरे के बारे में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया,हालांकि इस ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और आवाजों की प्रामाणिकता भी आधिकारिक रूप से प्रमाणित नहीं है, इसके बावजूद कथित ऑडियो ने चुनाव समिति की विश्वसनीयता को लेकर चर्चा तेज कर दी है,लोगों का सवाल है कि यदि चुनाव समिति के भीतर ही सदस्यों के बीच मतभेद हैं तो वे पूरी प्रक्रिया को किस प्रकार निष्पक्ष तरीके से संचालित करेंगे? इसलिए ऑडियो को आधार बनाकर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय उसकी तकनीकी जांच और सत्यापन कराया जाना ही उचित रास्ता होगा।


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