- ‘सोनेश्वर महादेव’ या ‘कल्याणेश्वर’? मंदिर से पहले नाम की जंग
- शिवलिंग एक,नाम दो सोनहत में महादेव पर सियासी घमासान!
- ‘सोनेश्वर महादेव’ बनाम ‘कल्याणेश्वर’ मंदिर बनने से पहले ही नाम,जमीन और श्रेय की सियासत आमने-सामने…
- मंदिर बनने से पहले ही भिड़े दो गुट, महादेव चौक पर शक्ति प्रदर्शन
- महादेव की आड़ में श्रेय की सियासत? सोनहत में भाजपा के दो गुट आमने-सामने
- आस्था का मंदिर या श्रेय की सियासत? सोनहत में नाम को लेकर घमासान
- शिवलिंग एक,नाम दो सोनहत में मंदिर को लेकर भाजपा में तकरार
- ‘सोनेश्वर’ बनाम ‘कल्याणेश्वर’ महादेव के नाम पर आमने-सामने भाजपा के दावेदार
- फीता और शिलापूजन से पहले ही नामकरण की जंग,सोनहत में बढ़ा सियासी तनाव
- 104 गांवों के जनसहयोग का दावा, विधायक की भूमिका पर दूसरा पक्ष—मंदिर पर आमने-सामने
- महादेव चौक बना सियासी अखाड़ा, मंदिर के नाम और श्रेय पर दो गुट भिड़े
-राजन पाण्डेय-
सोनहत/कोरिया,04 सितंबर 2026(घटती-घटना)। जिस भगवान के सामने जाकर लोग अपने सारे विवाद भूलने की उम्मीद रखते हैं, उसी महादेव के नाम पर सोनहत में ऐसा विवाद खड़ा हो गया कि भगवान का मंदिर बनने से पहले ही राजनीति का अखाड़ा तैयार हो गया,मामला शिव मंदिर का है,आस्था का है,जनसहयोग का है,जमीन का है और सबसे बढ़कर मंदिर के नाम का है,लेकिन घटनाक्रम को देखकर लगता है कि फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि मंदिर में शिवलिंग किस दिशा में स्थापित होगा,बल्कि यह है कि शिलापट्ट पर नाम किसका चलेगा।
सोनहत के महादेव चौक पर शुक्रवार को इसी विवाद ने खुलकर राजनीतिक रूप ले लिया, प्रस्तावित शिव मंदिर के निर्माण और नामकरण को लेकर भाजपा से जुड़े दो पक्ष आमने-सामने आ गए, दोनों ओर से नारेबाजी हुई, विवाद बढ़ा और हल्की धक्का-मुक्की की स्थिति बनने के बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा,पुलिस के अनुसार मामला किसी दूसरे धर्म से जुड़े विवाद का नहीं,बल्कि भाजपा से जुड़े स्थानीय लोगों के बीच आपसी मतभेद और वर्चस्व का है, यानी बाहर से देखने पर मामला मंदिर का है,लेकिन भीतर से कहानी नाम,जमीन,पहल और श्रेय की दिखाई दे रही है।
महादेव एक,नाम दो…‘सोनेश्वर’ या ‘कल्याणेश्वर’?- विवाद का सबसे बड़ा केंद्र मंदिर का नाम है, एक पक्ष प्रस्तावित मंदिर को ‘श्री सोनेश्वर महादेव’ के नाम से स्थापित करने की बात कर रहा है,इस पक्ष का कहना है कि मंदिर निर्माण में सोनहत क्षेत्र के 104 गांवों के लोगों की भागीदारी होगी और मंदिर किसी व्यक्ति अथवा राजनीतिक गुट की संपत्ति नहीं होगा, दूसरी ओर ‘कल्याणेश्वर’ नाम सामने आया है, इस पक्ष का कहना है कि मंदिर के लिए भूमि विधायक के माध्यम से उपलब्ध कराई गई है और समिति के समन्वय से मंदिर के नामकरण एवं स्थापना की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है,यहीं से सवाल पैदा हुआ—मंदिर महादेव का है, लेकिन नाम पर इतनी खींचतान क्यों? एक तरफ जनसहयोग का दावा है,दूसरी तरफ जमीन उपलब्ध कराने में विधायक की भूमिका का दावा, एक पक्ष कहता है कि जनता मंदिर बनाएगी,दूसरा कहता है कि जमीन और स्थापना की प्रक्रिया में विधायक की भूमिका महत्वपूर्ण है, अर्थात मंदिर की नींव अभी पूरी तरह पड़ी भी नहीं और श्रेय की नींव काफी गहरी दिखाई देने लगी है।
जन्माष्टमी पर पूजा से शुरू हुआ विवाद- शुक्रवार को जन्माष्टमी के अवसर पर प्रस्तावित मंदिर स्थल पर पूजा-पाठ को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए, सनातन गौरव मंच से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे जन्माष्टमी के अवसर पर पूजा करने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें पूजा करने से रोकने का प्रयास किया गया, दूसरी तरफ आरोप लगाया गया कि कुछ लोग मंदिर निर्माण की घोषणा और शिला पूजन की तैयारी के साथ पहुंचे थे और इसी वजह से विरोध हुआ, कुछ ही देर में मामला पूजा से निकलकर नारेबाजी तक पहुंच गया,समर्थक आमने-सामने हुए और स्थिति तनावपूर्ण होती चली गई,ऐसे में पुलिस को मौके पर पहुंचना पड़ा, पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाइश दी और स्थिति को नियंत्रित किया। दोनों पक्षों को आपस में बैठकर विवाद का समाधान करने की सलाह दी गई, यहां एक सवाल जरूर खड़ा होता है…अगर महादेव के मंदिर की शुरुआत ही दो पक्षों के बीच नारेबाजी से हो रही है, तो आगे मंदिर की व्यवस्था किस तरह चलेगी?
मनोज साहू बोले…104 गांवों की जनता बनाएगी मंदिर-भाजपा नेता मनोज साहू ने मंदिर निर्माण को जनसहयोग से जोड़ते हुए कहा कि 104 गांवों के लोग इस संबंध में एकत्र हुए हैं, उनका कहना है कि लंबे समय तक इंतजार के बाद अब जनता ने स्वयं मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया है,मनोज साहू के अनुसार जन्माष्टमी के अवसर पर महज एक घंटे में एक लाख रुपये के सहयोग का दावा किया गया,उनका कहना है कि इससे जनता की आस्था और मंदिर निर्माण को लेकर लोगों की इच्छा स्पष्ट होती है,उनका कहना है कि मंदिर किसी व्यक्ति अथवा राजनीतिक गुट की इच्छा से नहीं,बल्कि सोनहत की जनता की श्रद्धा और सहयोग से बनना चाहिए,उन्होंने ‘श्री सोनेश्वर महादेव’ मंदिर के नाम पर किसी व्यक्ति या राजनीतिक गुट की दावेदारी स्वीकार नहीं करने की बात कही, यहीं से विवाद और स्पष्ट हो जाता है,क्योंकि यदि एक पक्ष कह रहा है कि मंदिर जनता का होगा और दूसरा पक्ष निर्माण की प्रक्रिया में विधायक की भूमिका बता रहा है, तो फिर तय कौन करेगा कि मंदिर का स्वरूप क्या होगा और अंतिम नाम क्या होगा?
संदीप जायसवाल का आरोप—नामकरण की प्रक्रिया में हस्तक्षेप-जनपद उपाध्यक्ष संदीप जायसवाल ने मनोज साहू और उनके साथियों पर मंदिर के नामकरण के नाम पर पहुंचकर शिला पूजन करने का प्रयास करने का आरोप लगाया, उनका कहना है कि इस संबंध में पुलिस को सूचना दी गई थी,उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर का नामकरण विधायक द्वारा समिति के साथ समन्वय बनाकर कराया जा रहा है, यानी उनके पक्ष में मंदिर का नाम और स्थापना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं,बल्कि समिति के स्तर पर चल रही प्रक्रिया का हिस्सा है,अब सवाल यह है कि यदि समिति के माध्यम से नामकरण की प्रक्रिया चल रही थी तो क्या सभी स्थानीय पक्षों को इसकी जानकारी थी? यदि सहमति थी तो विवाद क्यों हुआ? और यदि सहमति नहीं थी तो मंदिर निर्माण की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ाई जाएगी?
राजेश गुप्ता बोले…जमीन विधायक के माध्यम से मिली-सोनहत के उपसरपंच राजेश गुप्ता ने मंदिर के लिए जमीन विधायक के माध्यम से उपलब्ध होने की बात कही। उनका कहना है कि मंदिर की स्थापना की प्रक्रिया भी विधायक के माध्यम से हुई है और मंदिर स्थानीय लोगों की सहमति से बनना चाहिए,उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग महादेव के नाम पर राजनीति और प्रदर्शन कर रहे हैं, उनके बयान के बाद विवाद का एक और पहलू सामने आता है—भूमि किसके प्रयास से मिली? क्योंकि मंदिर निर्माण में जमीन सबसे पहली आवश्यकता है,यदि भूमि विधायक के माध्यम से उपलब्ध हुई है तो उस प्रक्रिया का दस्तावेज क्या है? भूमि किसके नाम है? क्या भूमि मंदिर के लिए विधिवत हस्तांतरित हुई है? क्या समिति का गठन हुआ है? और मंदिर निर्माण के लिए अनुमति एवं अन्य औपचारिकताएं पूरी हुई हैं? इन सवालों के जवाब सामने आने पर जमीन और निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया स्पष्ट हो सकती है।
आशा देवी सोनपाकर…महादेव किसी की राजनीतिक जागीर नहीं-जनपद अध्यक्ष आशा देवी सोनपाकर ने विवाद के बीच कहा कि महादेव का मंदिर किसी की राजनीतिक जागीर नहीं हो सकता,उनका कहना है कि जिस आस्था के लिए सोनहत की जनता धन, सामग्री और श्रम देने को तैयार है,उस आस्था को किसी व्यक्ति विशेष के प्रभाव तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए,यह बयान विवाद के मूल बिंदु को सीधे छूता है,मंदिर यदि सार्वजनिक आस्था का केंद्र बनना है तो उसमें अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। लेकिन यदि निर्माण के शुरुआती दौर में ही दो गुट यह तय करने लगें कि मंदिर हमारा और नाम हमारा, तो फिर सामूहिक आस्था का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदलने का खतरा पैदा हो जाता है।
शिव कुमारी सोनपाकर…आस्था को राजनीति से दूर रखने की अपील-जिला पंचायत सदस्य शिव कुमारी सोनपाकर ने कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर उमड़ी भीड़ और एक घंटे में एक लाख रुपये के सहयोग का दावा इस बात का संकेत है कि जनता मंदिर निर्माण को लेकर गंभीर है, उन्होंने मंदिर को आस्था का विषय बताते हुए इसे राजनीतिक विवाद में नहीं बदलने की अपील की, उनका कहना है कि मंदिर निर्माण में सहयोग करने वालों के रास्ते में राजनीति या व्यक्तिगत दावेदारी नहीं आनी चाहिए, सवाल यही है कि क्या दोनों पक्ष इस अपील को स्वीकार करेंगे? क्योंकि फिलहाल विवाद का केंद्र यही है कि आस्था की अगुवाई कौन करेगा।
सुरेश राजवाड़े बोले…जनता की भागीदारी जरूरी- युवा मोर्चा से जुड़े सुरेश राजवाड़े ने भी मंदिर निर्माण में जनता की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताया, उनका कहना है कि महादेव का मंदिर किसी राजनीतिक प्रभाव से नहीं, बल्कि लोगों की श्रद्धा और सहयोग से बनना चाहिए, उनका यह बयान भी मूल विवाद को एक ही दिशा में ले जाता है—मंदिर का निर्माण सामूहिक हो या राजनीतिक नेतृत्व के इर्द-गिर्द? यही सवाल अब सोनहत में चर्चा का विषय बन गया है।
संदीप साहू ने कहा…विधायक के साथ है सोनहत की जनता-भाजपा नेता संदीप साहू ने कहा कि विधायक सोनहत के लोगों के साथ हैं, उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों ने विधायक के साथ शिवलिंग की स्थापना की है और कुछ लोग यहां राजनीति चमकाने का प्रयास कर रहे हैं, इस बयान से विवाद का राजनीतिक कोण और स्पष्ट हो जाता है, एक तरफ विधायक के समर्थन में स्थानीय लोगों की भागीदारी का दावा है, दूसरी तरफ 104 गांवों के जनसहयोग से मंदिर बनाने की बात कही जा रही है, दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थन को जनता से जोड़ रहे हैं, लेकिन जनता के नाम पर दावा करने के बजाय यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वास्तविक सहमति किसके साथ है और क्या सभी संबंधित पक्षों को साथ लेकर कोई औपचारिक निर्णय लिया गया है।
पुलिस ने साफ किया—धार्मिक विवाद नहीं, भाजपा के दो पक्षों का मामला- सोनहत थाना प्रभारी अनिल किंडो ने बताया कि मंदिर में पूजा-पाठ के दौरान मंदिर निर्माण की घोषणा को लेकर दो पक्षों के बीच हल्के विवाद की जानकारी मिली थी, उनके अनुसार दोनों पक्ष भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं, मामला किसी अन्य धर्म से संबंधित नहीं है, बल्कि आपसी मतभेद और वर्चस्व से जुड़ा हुआ है, पुलिस ने मौके पर पहुंचकर दोनों पक्षों को समझाइश दी और स्थिति नियंत्रित की। दोनों पक्षों को आपस में बैठकर समस्या का समाधान करने की सलाह दी गई, पुलिस का यह बयान महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे साफ होता है कि विवाद को किसी धार्मिक टकराव के रूप में देखने के बजाय इसे स्थानीय राजनीतिक और संगठनात्मक मतभेद के रूप में देखा जा रहा है।
महादेव के मंदिर में पहले ही ‘श्रेय युद्ध’ क्यों?-मंदिर निर्माण में सबसे बड़ी शक्ति श्रद्धा होती है, उसके बाद जनसहयोग,श्रम और सामूहिक इच्छा,लेकिन सोनहत का मौजूदा घटनाक्रम एक अलग तस्वीर दिखा रहा है,एक पक्ष—जनसहयोग,दूसरा पक्ष—भूमि उपलब्ध कराने में विधायक की भूमिका,एक पक्ष—सोनेश्वर महादेव, दूसरा पक्ष—कल्याणेश्वर,एक पक्ष—104 गांव, दूसरा पक्ष—विधायक और समिति,और बीच में पुलिस, यानी महादेव की स्थापना से पहले ही नामकरण और श्रेयकरण का यज्ञ शुरू हो चुका है,यह स्थिति यदि समय रहते नहीं संभाली गई तो विवाद मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को लंबा कर सकता है।
समिति कौन बनाएगा? चंदा कौन लेगा? खर्च का हिसाब कौन देगा? और सबसे बड़ा सवाल
क्या मंदिर जनता की आस्था से बनेगा या राजनीतिक श्रेय की होड़ से? महादेव के नाम पर दो गुट आमने-सामने आना अपने आप में विडंबना है। जिस स्थान पर घंटियां बजनी थीं,वहां नारेबाजी हुई,जहां शंख और मंत्र गूंजने थे, वहां राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप सुनाई दिए। जहां श्रद्धालुओं को एक साथ खड़ा होना था,वहां समर्थक दो तरफ खड़े दिखाई दिए,मंदिर बने—इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। सवाल सिर्फ इतना है कि मंदिर की पहली ईंट रखने से पहले कहीं राजनीतिक दीवार तो खड़ी नहीं हो रही? सोनहत की जनता अब शायद यही चाहती है कि महादेव के नाम पर विवाद समाप्त हो, सभी पक्ष बैठें और सर्वसम्मति से मंदिर का नाम, निर्माण समिति,भूमि और वित्तीय व्यवस्था तय करें,क्योंकि अंततः महादेव किसी गुट के नहीं होते,और अगर मंदिर सचमुच जनता की आस्था का है, तो उसका रास्ता भी जनसहमति से ही निकलना चाहिए—नारेबाजी,शक्ति प्रदर्शन और श्रेय की लड़ाई से नहीं।
अब फैसला किसका…जनता का…समिति का या राजनीतिक नेतृत्व का?
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि मंदिर का अंतिम निर्णय कौन करेगा? क्या 104 गांवों के प्रतिनिधियों की बैठक होगी? क्या ग्राम स्तर पर सहमति ली जाएगी? क्या मंदिर निर्माण समिति का विधिवत गठन होगा? क्या समिति में दोनों पक्षों को प्रतिनिधित्व मिलेगा? क्या मंदिर के नाम पर सर्वसम्मति बनाई जाएगी? क्या भूमि की स्थिति सार्वजनिक की जाएगी? क्या निर्माण के लिए धनराशि का पारदर्शी हिसाब रखा जाएगा? यदि मंदिर जनसहयोग से बनेगा तो चंदे का हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। यदि भूमि किसी जनप्रतिनिधि के प्रयास से मिली है तो उसकी प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए, यदि समिति निर्माण की जिम्मेदारी संभालती है तो उसकी संरचना और अधिकार भी सामने आने चाहिए, क्योंकि मंदिर बनने के बाद विवाद समाप्त नहीं होता—तब दानपेटी, समिति, प्रबंधन और चढ़ावे की व्यवस्था जैसे सवाल भी सामने आते हैं,इसलिए शुरुआत ही पारदर्शी होना जरूरी है।
‘सोनेश्वर’ और ‘कल्याणेश्वर’ के बीच फंसा सोनहत
सोनहत में फिलहाल असली टकराव पत्थर और ईंट का नहीं, बल्कि नाम और श्रेय का है, एक नाम को जनता की भावना से जोड़ा जा रहा है तो दूसरे नाम को समिति और विधायक की पहल से, एक पक्ष कहता है कि मंदिर किसी व्यक्ति की राजनीतिक जागीर नहीं हो सकता, दूसरा पक्ष कहता है कि कुछ लोग राजनीतिक लाभ के लिए विवाद खड़ा कर रहे हैं, दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बात समान है—दोनों मंदिर निर्माण चाहते हैं, यही वह बिंदु है जहां विवाद का समाधान भी छिपा है, यदि उद्देश्य वास्तव में मंदिर निर्माण है तो नाम पर सर्वसम्मति बनाई जा सकती है, निर्माण समिति में सभी पक्षों को शामिल किया जा सकता है, भूमि, धन और निर्माण की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जा सकती है, लेकिन यदि उद्देश्य मंदिर से ज्यादा किसने बनाया साबित करना है, तो विवाद आगे भी जारी रहने की आशंका रहेगी।
अब महादेव को राजनीति से बचाने की जिम्मेदारी किसकी?
सोनहत में मंदिर निर्माण को लेकर पैदा हुआ विवाद फिलहाल पुलिस की समझाइश के बाद शांत है, लेकिन विवाद पूरी तरह समाप्त हुआ है, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि मूल सवाल अभी भी वहीं हैं मंदिर का नाम क्या होगा? भूमि किस प्रक्रिया से मिली? निर्माण कौन करेगा?
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur