- मुख्यमंत्री ने किया लोकार्पण,अब वाहन की तलाश! गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बड़ा सवाल
- मुख्यमंत्री ने किया लोकार्पण,अब वाहन की तलाश! गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में बड़ा सवाल
- फीता कटते ही वाहन की कहानी खत्म? गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटक वाहन पर सवाल
- लोकार्पण मंच पर चमका पर्यटक वाहन,बाद में कहां हुआ ‘अदृश्य’?
- फोटो में वाहन मौजूद,जमीन पर गायब! पर्यटक वाहन की ‘गुमशुदगी’ पर जांच की मांग
- मुख्यमंत्री के हाथों उद्घाटन…अब वाहन का अता-पता नहीं! किसके पास है सरकारी सुविधा?
- लोकार्पण की तस्वीर बची,पर्यटक वाहन नहीं! गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में फर्जीवाड़े की बू
- फीता कटा तो वाहन सरकारी,अब पूछो तो ठिकाना गायब! गुरु घासीदास में बड़ा सवाल…
- तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल,गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू,प्रभारी सचिव एस.प्रकाश समेत प्रशासन और वन विभाग के आला अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ था लोकार्पण…
- अब कोरिया जन सहयोग समिति ने पूछा—वाहन खरीदा गया था तो कहां है, किराए पर था तो भुगतान किसे हुआ?
राजन पाण्डेय
कोरिया,04 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी कामकाज में लोकार्पण का अपना ही जादू है, मंच सजा,कुर्सियां लगीं,माइक चालू हुआ,बड़े-बड़े नाम मंच पर पहुंचे,फीता कटा और कैमरे ने इतिहास को कैद कर लिया,उसके बाद अगर सुविधा जनता को दिखाई दे तो ठीक,नहीं दिखाई दे तो कम से कम लोकार्पण की तस्वीर तो रिकॉर्ड में सुरक्षित रहती ही है। गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े कथित पर्यटक वाहन का मामला कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर रहा है,दावा है कि जून 2022 में रामगढ़ में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के ‘भेंट-मुलाकात’ कार्यक्रम के दौरान वन विभाग से जुड़े पर्यटक वाहन का लोक अर्पण कराया गया था,उस कार्यक्रम में तत्कालीन गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू, प्रभारी सचिव एस.प्रकाश,कलेक्टर,पुलिस अधीक्षक, डीएफओ तथा वन विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी की बात सामने आई है, अब असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
जिस वाहन का लोकार्पण इतने बड़े मंच पर हुआ, वह आज कहां है?-यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब कोरिया जन सहयोग समिति मांग रही है,और सवाल सिर्फ यह नहीं कि वाहन कहां खड़ा है,सवाल यह भी है कि वह आया कैसे था,किस पैसे से आया था, किसके नाम था,किसे सौंपा गया कितने दिन चला, कितने पर्यटकों को घुमाया और उससे कितनी आमदनी हुई? यानी मामला अब लोकार्पण से निकलकर लॉगबुक तक पहुंच गया है।
अगर वाहन खरीदा गया था तो ‘खरीद की कुंडली’ खोलिए-मामले की जांच में पहला सवाल होना चाहिए कि वाहन खरीदा गया था या नहीं,यदि वाहन खरीदा गया था तो उसके लिए वित्तीय स्वीकृति किस अधिकारी ने दी? राशि किस मद से जारी हुई? कुल लागत कितनी थी? वाहन किस कंपनी अथवा एजेंसी से खरीदा गया? क्या खरीद प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन किया गया? बिल किसके नाम पर बना? भुगतान किस खाते से हुआ? वाहन किसके नाम पर पंजीकृत हुआ? क्या इसे वन विभाग की संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया या ईको विकास समिति की? और सबसे महत्वपूर्ण—स्टॉक रजिस्टर में आज भी वह वाहन मौजूद है या नहीं? अगर कागज में वाहन मौजूद है तो भौतिक रूप से भी उसका मिलना चाहिए,यदि भौतिक सत्यापन में वाहन नहीं मिलता,तो सवाल और गंभीर हो जाता है।
और अगर किराए का वाहन था तो फिर ‘लोकार्पण’ का हिसाब अलग होगा-दूसरी संभावना यह हो सकती है कि कार्यक्रम में वाहन किराए पर लेकर प्रस्तुत किया गया हो, अगर ऐसा था तो फिर सवाल यह नहीं कि वाहन खरीदा कहां से गया,बल्कि यह होगा कि किससे किराए पर लिया गया? कितने समय के लिए लिया गया? किराया कितना तय हुआ? किस अधिकारी ने अनुमति दी? किस मद से भुगतान हुआ? किसे भुगतान किया गया? क्या इसके लिए निविदा या निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई? क्या वाहन केवल मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के लिए उपलब्ध कराया गया था? यदि हां,तो उसे पर्यटक वाहन के रूप में प्रस्तुत करने का आधार क्या था? और अगर बाद में भी पर्यटन के लिए इस्तेमाल किया गया तो उसकी अवधि और भुगतान का रिकॉर्ड कहां है? यानी वाहन खरीद का मामला हो या किराए का—दोनों रास्ते दस्तावेजों तक पहुंचते हैं।
लोकार्पण के बाद ‘पर्यटक’ कहां और वाहन कहां?-पर्यटक वाहन का उद्देश्य पर्यटक को सुविधा देना है, लेकिन अगर पर्यटक ही वाहन को तलाशता रह जाए तो योजना का उद्देश्य उलट जाता है,कल्पना कीजिए—पर्यटक गुरु घासीदास क्षेत्र में पहुंचता है और पूछता है, ‘साहब,पर्यटक वाहन कहां मिलेगा?’जवाब आता है— ‘वाहन तो है।’ पर सवाल…‘कहां है?’जवाब—‘रिकॉर्ड में होगा।’ फिर अगला सवाल…‘चलता है?’ जवाब— ‘कभी चला होगा।’ यही वह स्थिति है, जिसे अब दस्तावेजों से साफ करना होगा,क्योंकि सरकारी योजना का मूल्यांकन उद्घाटन की भीड़ से नहीं,उपयोगिता और परिणाम से होता है।
ईको विकास समिति लोलकी के खाते की जांच जरूरी-वाहन पर ईको विकास समिति लोलकी का नाम अंकित होने की बात सामने आई है, इसलिए जांच में समिति की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, यदि वाहन समिति को सौंपा गया था तो उसका सुपुर्दगी पत्र कहां है? क्या समिति के पास वाहन की चाबी और दस्तावेज थे? क्या समिति ने वाहन चलाने के लिए चालक रखा? क्या पर्यटकों से शुल्क लिया गया? क्या समिति के बैंक खाते में उस आय की राशि जमा हुई? क्या ईंधन और रखरखाव का खर्च समिति के खाते से हुआ? क्या समिति की बैठक में वाहन संचालन का हिसाब प्रस्तुत किया गया? यदि इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड में हैं तो पूरा मामला कुछ ही दस्तावेजों में साफ हो सकता है। अगर रिकॉर्ड ही नहीं है, तो फिर जांच का दायरा और बढ़ना स्वाभाविक है।
वीवीआईपी मंच की चमक से बढ़ी जवाबदेही- इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि कथित तौर पर वाहन का लोक अर्पण कोई सामान्य कार्यालयीन कार्यक्रम नहीं था,तत्कालीन मुख्यमंत्री,गृह मंत्री,प्रभारी सचिव,कलेक्टर,एसपी,डीएफओ और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में किसी सुविधा का लोकार्पण हुआ था तो स्वाभाविक रूप से उसका महत्व भी सामान्य विभागीय संपत्ति से अधिक था, इसलिए सवाल भी सामान्य नहीं हो सकता,क्या लोकार्पण से पहले वाहन की जांच हुई थी? क्या वाहन उसी दिन विभाग की संपत्ति था? क्या वाहन का पंजीयन हो चुका था? क्या इसे ईको विकास समिति को विधिवत सौंपा गया था? लोकार्पण के बाद इसकी निगरानी किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी? और सबसे बड़ा सवाल…अगर वाहन जनता के लिए था तो जनता से दूर क्यों हो गया?
‘तस्वीर बनाम हकीकत’ की जांच जरूरी-इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है कि लोकार्पण की तस्वीर एक ठोस चीज है,तस्वीर कहती है…वाहन मंच पर था,अब रिकॉर्ड को बताना होगा…उसके बाद क्या हुआ? क्योंकि किसी वाहन का अस्तित्व केवल फोटो खिंचने से साबित नहीं होता। उसका वास्तविक अस्तित्व उसके दस्तावेज और भौतिक सत्यापन से साबित होता है,इसलिए स्वतंत्र जांच में लोकार्पण की तस्वीर के साथ-साथ वाहन का पंजीयन, चेसिस-इंजन नंबर, स्टॉक रजिस्टर और भौतिक सत्यापन सबसे अहम कडि़यां होंगी।
कोरिया जन सहयोग समिति ने खोला सवालों का पिटारा-मामले को लेकर कोरिया जन सहयोग समिति ने गंभीर आपत्ति जताई है,समिति के कार्यकारी अध्यक्ष अधिवक्ता जयचन्द सोनपाकर एवं पुष्पेंद्र राजवाड़े ने मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, समिति के अनुसार गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के संचालक को औपचारिक ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की जांच की मांग की जाएगी,समिति का जोर इस बात पर है कि वाहन की खरीद अथवा किराए,भुगतान,संचालन, आय-व्यय और वर्तमान स्थिति का पूरा रिकॉर्ड सामने आना चाहिए,यदि जांच में वाहन की खरीद प्रमाणित होती है तो उसकी वर्तमान भौतिक मौजूदगी की जांच हो,यदि वाहन किराए का था तो किराया और भुगतान की प्रक्रिया सामने आए,यदि वाहन पर्यटकों के लिए चलाया गया तो उसकी लॉगबुक और आय का हिसाब सामने आए, और यदि वाहन लंबे समय से अनुपयोगी पड़ा है तो उसका रखरखाव और वर्तमान स्थिति बताई जाए।
समिति ने दी आंदोलन की चेतावनी-समिति पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि मामले में त्वरित जांच कर जिम्मेदारी तय नहीं की गई तो आंदोलन किया जाएगा, समिति का कहना है कि यह मामला केवल एक वाहन तक सीमित नहीं है,यदि जांच शुरू होती है तो राष्ट्रीय उद्यान में पूर्व में हुए अन्य वित्तीय एवं निर्माण संबंधी कार्यों की कथित अनियमितताओं को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की जाएगी,हालांकि इन व्यापक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए फिलहाल सबसे ठोस सवाल उसी वाहन से जुड़े रिकॉर्ड का है।
जांच हुई तो खुलेंगे ये दस्तावेजः-
वाहन की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति।
खरीद अथवा किराए का आदेश।
निविदा/खरीद प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज।
बिल और भुगतान वाउचर।
वाहन का पंजीयन प्रमाणपत्र।
चेसिस और इंजन नंबर।
स्टॉक रजिस्टर।
ईको विकास समिति को सुपुर्दगी पत्र।
वाहन की लॉगबुक।
ईंधन खर्च का रिकॉर्ड।
चालक की नियुक्ति/भुगतान संबंधी रिकॉर्ड।
पर्यटकों से प्राप्त शुल्क का हिसाब।
समिति के बैंक खाते का संबंधित अवधि का विवरण।
वाहन के रखरखाव एवं मरम्मत का रिकॉर्ड।
नवीनतम भौतिक सत्यापन रिपोर्ट।
इन दस्तावेजों की एक-एक कड़ी जुड़ते ही यह पता लगाया जा सकता है कि वाहन वास्तव में पर्यटन सुविधा बना या केवल लोकार्पण की एक दिवसीय ‘सरकारी कहानी’ बनकर रह गया।
अब ‘फीता काटने’ से आगे की कहानी चाहिए-सरकारी परियोजनाओं में सबसे आसान काम उद्घाटन करना है। कठिन काम है—उसे वर्षों तक चलाना, उसका हिसाब रखना और जनता तक उसका लाभ पहुंचाना,गुरु घासीदास-तमोर पिंगला क्षेत्र में ईको-पर्यटन और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने की सरकारी सोच के बीच पर्यटक वाहन जैसी सुविधाओं का महत्व और बढ़ जाता है, सरकार स्वयं पर्यटक वाहन संचालन को स्थानीय रोजगार से जोड़ने की बात कह चुकी है, ऐसे में कथित पर्यटक वाहन का वर्तमान पता स्पष्ट न होना महज प्रशासनिक जिज्ञासा नहीं है, यह सवाल है कि सरकारी योजना जमीन पर कितनी उतरी?
अब विभाग को देना होगा ‘पांच सवालों’ का जवाबः-
पहला—वाहन खरीदा गया था या किराए पर लिया गया था?
दूसरा—यदि खरीदा गया था तो किस मद से और कितनी राशि में?
तीसरा—यदि किराए का था तो किसे और कितना भुगतान किया गया?
चौथा—जून 2022 के बाद वाहन कितने समय तक पर्यटकों के लिए चला?
पांचवां—आज वाहन किसके कब्जे में और किस स्थान पर है?
इन पांच सवालों के जवाब यदि दस्तावेजों के साथ मिल जाते हैं तो मामला खत्म,लेकिन अगर जवाब के बजाय फाइलें घूमने लगें,अधिकारी एक-दूसरे की ओर देखने लगें और वाहन का पता लगाने के लिए सरकारी मशीनरी को जंगल-जंगल भटकना पड़े,तो सवाल और बड़ा हो जाएगा,क्योंकि लोकार्पण की तस्वीर में वाहन साफ दिखाई देता है—अब जनता सिर्फ यह देखना चाहती है कि वह तस्वीर के बाहर आज कहां खड़ा है,और यदि वाहन मौजूद है तो सामने आए,यदि नहीं है तो उसके गायब होने की जवाबदेही तय हो,फीता काटने वाले मंच की तस्वीर बहुत हो चुकी—अब वाहन के पहियों का हिसाब चाहिए।
मुख्यमंत्री के हाथों उद्घाटन,फिर वाहन ने कौन-सा रास्ता पकड़ा?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार वाहन पर ‘पर्यटक वाहन ईको विकास समिति लोलकी,गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान’ अंकित था,नाम से ही उद्देश्य स्पष्ट नजर आता है को पर्यटक आएंगे,वाहन उन्हें जंगल और पर्यटन स्थलों तक ले जाएगा, स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ेगा और ईको-पर्यटन को गति मिलेगी, सरकार ने बाद के वर्षों में भी गुरु घासीदास-तमोर पिंगला क्षेत्र में ईको-पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय ग्रामीणों के लिए गाइड तथा पर्यटक वाहन संचालन जैसे रोजगार के अवसर पैदा करने की बात कही है,लेकिन सवाल यह है कि जिस दिशा में सरकारी नीति आगे बढ़ रही है, उस दिशा में यह कथित वाहन कितनी दूर चला? क्या पर्यटक वाहन सचमुच पर्यटकों को लेकर जंगल गया? या फिर उसकी सबसे बड़ी यात्रा लोकार्पण मंच से फोटो खिंचवाने तक ही सीमित रह गई? यही जांच का विषय है।
लोकार्पण की फोटो मिल सकती है,तो वाहन क्यों नहीं?
किसी सरकारी संपत्ति के लोकार्पण के बाद सबसे सामान्य प्रक्रिया यही होती है कि संबंधित संपत्ति को किसी विभाग,संस्था,समिति या जिम्मेदार व्यक्ति को सुपुर्द किया जाए,वाहन हो तो मामला और भी आसान है, उसका पंजीयन नंबर होगा,चेसिस नंबर होगा,इंजन नंबर होगा,आरसी होगी,बीमा होगा,स्टॉक रजिस्टर में प्रविष्टि होगी, लॉगबुक होगी,ईंधन का हिसाब होगा,रखरखाव का रिकॉर्ड होगा,चालक की जानकारी होगी, और अगर पर्यटकों से शुल्क लिया गया तो आय का रिकॉर्ड भी होगा,फिर आखिर ऐसा कौन-सा सरकारी रहस्य है,जिसे खोलने में इतनी परेशानी हो रही है? वाहन है तो दिखाइए,नहीं है तो रिकॉर्ड बताइए,खरीदा गया तो बिल दिखाइए,किराए का था तो भुगतान दिखाइए,सीधी बात है—सरकारी वाहन कोई जंगल का ऐसा जानवर तो है नहीं जो कैमरे के सामने आए और फिर झाडि़यों में गायब हो जाए।
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