
- शिवप्रसादनगर में रकबा बढ़ा,धान बिका…खबरें भी छपीं,फिर भी प्रशासन की आंखें बंद!
- 23 किसानों के नाम पर 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे का आरोप, 4728.80 क्विंटल धान बिक्री पर सवाल
- खबरें लगातार प्रकाशित होती रहीं, दस्तावेज सामने आते रहे…कार्रवाई की फाइल कहां अटकी?
- 20.94 हेक्टेयर जमीन से 88.27 हेक्टेयर पंजीयन! 47A28 क्विंटल धान बिक्री ने खड़े किए बड़े सवाल
- 67.33 हेक्टेयर कथित फर्जी रकबा, 4728.80 क्विंटल धान बिक्री…फिर भी कार्रवाई का इंतजार
- धान खरीदी का ‘खेल’ या कागजों का कमाल? 23 किसानों के नाम पर रकबा बढ़ने का आरोप
- जमीन बदली, रकबा बढ़ा,धान बिका…कई खबरों के बाद भी जांच फाइल क्यों नहीं खुली?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,02 सितम्बर 2026(घटती-घटना)। सूरजपुर जिले के ओड़गी ब्लॉक की शिवप्रसादनगर धान खरीदी समिति से जुड़ा मामला अब सिर्फ धान खरीदी में कथित गड़बड़ी का मामला नहीं रह गया है,यहां सवाल जमीन के रकबे से शुरू होकर किसान पंजीयन,धान खरीदी,बैंक ऋण,फसल बीमा,भूमि हस्तांतरण और प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया है, सबसे दिलचस्प बात यह है कि मामले से जुड़े आरोप और दस्तावेज पहले भी कई बार खबरों के माध्यम से सार्वजनिक किए जा चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के मोर्चे पर अब तक वह तेजी दिखाई नहीं दी,जिसकी उम्मीद ऐसे गंभीर आरोपों के बाद की जाती है।
कागजों में यदि आंकड़े सच हैं तो कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती—वास्तविक रकबा 20.94 हेक्टेयर, पंजीयन रकबा 88.27 हेक्टेयर और धान बिक्री 4728.80 क्विंटल, यानी 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे का सवाल सामने है। अब सवाल यह है कि खेत की जमीन बढ़ी कैसे? क्या कागज पर खेतों में ऐसी उपजाऊ मिट्टी है जो सरकारी रिकॉर्ड देखते ही अचानक फैल जाती है? बेशक, यह व्यंग्य है,लेकिन असली सवाल बेहद गंभीर है—यदि यह अंतर रिकॉर्ड में मौजूद है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है और इसकी जांच अब तक निर्णायक स्तर तक क्यों नहीं पहुंची?
20.94 हेक्टेयर से 88.27 हेक्टेयर—कागजों में जमीन का ‘विकास’ कैसे हुआ?– शिकायत में उपलब्ध विवरण के अनुसार 23 किसानों का वास्तविक रकबा कुल 20.94 हेक्टेयर बताया गया है, इसके मुकाबले समिति के रिकॉर्ड में कुल 88.27 हेक्टेयर रकबा दर्ज होने का आरोप है, अर्थात 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे का सवाल सामने आता है,अब प्रशासन को सिर्फ एक सवाल का जवाब देना है,यह अतिरिक्त रकबा आया कहां से? यदि यह राजस्व रिकॉर्ड में है तो किसके नाम है? यदि राजस्व रिकॉर्ड में नहीं है तो समिति के पंजीयन में कैसे आया? यदि पंजीयन ऑनलाइन रिकॉर्ड से सत्यापित हुआ था तो इतनी बड़ी विसंगति कैसे बच गई? और यदि सत्यापन हुआ ही नहीं तो फिर धान खरीदी किस आधार पर हुई? यहीं से मामला गंभीर हो जाता है।
खबरें छपीं,दस्तावेज सामने आए…फिर प्रशासन की फाइल क्यों सोती रही?- इस पूरे मामले का सबसे व्यंग्यात्मक पहलू यही है कि मामला पहली बार सामने नहीं आया है, पूर्व में भी इस प्रकरण को लेकर कई बार खबरें प्रकाशित की गईं,आरोपों और दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया,सवाल उठाए गए,लेकिन कार्रवाई की तस्वीर अब भी धुंधली है,सरकारी व्यवस्था में आम आदमी की छोटी सी शिकायत पर कभी-कभी दस्तावेजों की पूरी बारात निकल पड़ती है—आवेदन,पावती,जांच, बयान,पंचनामा और फिर दूसरी जांच,लेकिन यहां सवाल है कि जब मामला सरकारी धान खरीदी और हजारों क्विंटल धान से जुड़ा बताया जा रहा है, तो जांच की फाइल आखिर किस मौसम का इंतजार कर रही है? धान की फसल हर साल आती है, खरीदी हर साल होती है,लेकिन जांच की गति देखकर लगता है कि फाइल ने शायद मानसून में चलना सीखा ही नहीं,हालांकि यह भी स्पष्ट है कि केवल समाचार प्रकाशित होना किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करता,लेकिन खबरों में उठे गंभीर और दस्तावेज-आधारित सवालों का प्रशासनिक सत्यापन तो होना ही चाहिए।
सवाल समिति से आगे बढ़कर अधिकारियों तक-यदि पंजीयन में गलत रकबा दर्ज हुआ तो इसकी जिम्मेदारी केवल किसान की नहीं मानी जा सकती,यह पता लगाना जरूरी होगा कि पंजीयन किसने किया, सत्यापन किसने किया और अंतिम रूप से रिकॉर्ड को किसने स्वीकार किया,शिकायत में समिति प्रबंधक तथा धान खरीदी प्रभारी सोहराब अंसारी और साधना कुशवाहा की भूमिका पर आरोप लगाए गए हैं,इन आरोपों को जांच का विषय माना जाना चाहिए,निष्कर्ष नहीं,जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित लोगों की वास्तविक भूमिका क्या थी,किस स्तर पर रिकॉर्ड तैयार हुआ और धान खरीदी की अनुमति किस आधार पर मिली।
साधना कुशवाहा का पुराना मामला भी फिर चर्चा में- शिकायत में साधना कुशवाहा से जुड़े पूर्व प्रकरण का भी उल्लेख किया गया है, आरोप है कि पशुपालन से संबंधित दो करोड़ रुपये से अधिक के कथित वितरण के मामले में उनके विरुद्ध कार्रवाई हुई थी,उन्हें जेल भेजे जाने और समिति के कार्य से बर्खास्त किए जाने की बात कही गई है,यह तथ्य भी आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना चाहिए,यदि पूर्व में किसी गंभीर वित्तीय मामले में कार्रवाई हुई थी तो वर्तमान मामले की जांच करते समय उस रिकॉर्ड को भी सामने रखना स्वाभाविक होगा।
फसल बीमा और ऋण वितरण के आरोप भी कम गंभीर नहीं-शिकायत में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की राशि के कथित गलत आहरण और किसानों के नाम पर दो करोड़ रुपये से अधिक के पशुपालन ऋण वितरण का भी आरोप लगाया गया है,इसके अलावा 20 प्रतिशत कमीशन लिए जाने की बात भी कही गई है,यदि ये आरोप सही हैं तो मामला केवल धान खरीदी तक सीमित नहीं रहेगा,तब बैंकिंग रिकॉर्ड,बीमा दावे,किसान खातों और भुगतान की पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी होगी,यानी एक तरफ खेत, दूसरी तरफ बैंक और बीच में धान की बोरी—तीनों का हिसाब एक साथ मिलाना पड़ेगा।
जमीन से धान तक कोई कड़ी है या अलग-अलग मामले?-स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि जमीन हस्तांतरण,बैंक ऋण,फसल बीमा और धान खरीदी में कथित अनियमितताएं एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं,लेकिन चर्चा और प्रमाण में फर्क होता है,इसलिए स्वतंत्र जांच का महत्व यहीं बढ़ जाता है,यदि सभी मामले अलग-अलग हैं तो रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो जाएगा,और यदि इनके बीच कोई कड़ी है तो बैंकिंग,राजस्व और धान खरीदी रिकॉर्ड के मिलान से वह भी सामने आ सकती है।
अब जांच हो तो इन सवालों का जवाब मिले-पूरे मामले में जांच के दौरान कम से कम इन बिंदुओं को देखा जाना चाहिए,23 किसानों के वास्तविक रकबे का राजस्व रिकॉर्ड से मिलान, 67.33 हेक्टेयर अतिरिक्त बताए जा रहे रकबे की जांच,4728.80 क्विंटल धान बिक्री का सत्यापन,किसान पंजीयन और धान खरीदी रिकॉर्ड का मिलान,धान बिक्री की राशि किसके खातों में गई,इसका परीक्षण,समिति प्रबंधक और खरीदी प्रभारियों की भूमिका, संबंधित भूमि के हस्तांतरण की वैधानिकता, बैंकों की एनओसी और ऋण स्थिति,फसल बीमा भुगतान का सत्यापन,पशुपालन ऋण वितरण और कथित कमीशन की जांच,आवश्यकता होने पर ईडब्ल्यूओ से स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
अब प्रशासन के सामने दो ही रास्ते- इस मामले में प्रशासन चाहे तो बहुत आसानी से तस्वीर साफ कर सकता है,पहला रास्ताः दस्तावेजों की जांच कर यह बताया जाए कि लगाए गए आरोप गलत हैं और वास्तविक रिकॉर्ड क्या है, दूसरा रास्ताः यदि रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां मिलती हैं तो जिम्मेदारों की भूमिका तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए,लेकिन लगातार खबरें प्रकाशित होती रहें,दस्तावेज सामने आते रहें और प्रशासन की तरफ से न जांच की स्पष्ट जानकारी मिले,न कार्रवाई की—तो सवाल उठना स्वाभाविक है,आखिर फाइल को भी कभी तो खेत तक पहुंचना होगा,क्योंकि यहां सवाल सिर्फ कागज पर बढ़े 67.33 हेक्टेयर रकबे का नहीं है,सवाल 4728.80 क्विंटल धान का है,सवाल किसानों के नाम पर हुए पंजीयन का है,सवाल सरकारी भुगतान का है, सवाल बैंक ऋण का है,सवाल जमीन हस्तांतरण का है,और सबसे बड़ा सवाल—जब इन सब पर पहले भी खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं और दस्तावेज सामने रखे जा चुके हैं,तो प्रशासन की जांच अब तक निर्णायक मोड़ तक क्यों नहीं पहुंची? यदि सब कुछ नियम से हुआ है तो जांच से डर कैसा? और यदि नियम टूटे हैं तो कार्रवाई में देरी क्यों? अब शिवप्रसादनगर की जनता शायद यही जानना चाहती है कि धान की बोरियों का हिसाब कब होगा और उन बोरियों तक पहुंचने वाले कागजों की जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?

तालिका के अनुसार कुल स्थिति
= कुल वास्तविक रकबाः 20.94 हेक्टेयर
= दर्ज फर्जी रकबाः 67.33 हेक्टेयर
= कुल पंजीयन रकबाः 88.27 हेक्टेयर
= कुल धान बिक्रीः 4728.80 क्विंटल
आरोप है कि समिति प्रबंधक एवं धान खरीदी प्रभारी ने कथित रूप से बैंक से जुड़े व्यक्तियों के साथ मिलीभगत कर अतिरिक्त रकबा जोड़कर धान बिक्री दर्शाई।
4728.80 क्विंटल धान
आखिर किस खेत में उगा?- शिकायत के अनुसार इन्हीं पंजीकृत रकबों के आधार पर 4728.80 क्विंटल धान की बिक्री दर्शाई गई,यही वह आंकड़ा है जो पूरे मामले को साधारण रिकॉर्ड त्रुटि से निकालकर जांच के बड़े दायरे में ले जाता है,मसलन,उपलब्ध तालिका में दोसल मो. का वास्तविक रकबा 0.21 हेक्टेयर बताया गया,जबकि पंजीयन रकबा 2.82 हेक्टेयर और धान बिक्री 145.20 क्विंटल दर्ज होने का दावा है, कृष्णा सिंह के मामले में वास्तविक रकबा 0.29 हेक्टेयर, पंजीयन 2.57 हेक्टेयर और धान बिक्री 126.40 क्विंटल बताई गई है,रामसाय के नाम 0.84 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 4.36 हेक्टेयर पंजीयन और 404.40 क्विंटल धान बिक्री का विवरण दिया गया है,संताबाई के मामले में 0.45 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 6.76 हेक्टेयर पंजीयन और 366.40 क्विंटल धान बिक्री बताई गई है,शिवनाथ के मामले में 0.54 हेक्टेयर वास्तविक रकबे के मुकाबले 5.95 हेक्टेयर पंजीयन तथा 419.60 क्विंटल धान बिक्री का दावा है,विजय कुमार के मामले में तो वास्तविक रकबा 0.36 हेक्टेयर,पंजीयन 4.66 हेक्टेयर और धान बिक्री 441.20 क्विंटल बताई गई है, इन आंकड़ों की आधिकारिक जांच जरूरी है,लेकिन अगर ये आंकड़े सही हैं तो सवाल यह नहीं कि ‘कुछ गलती हुई?‘,बल्कि सवाल यह होगा कि इतनी बड़ी गलती कई स्तरों से गुजरकर धान खरीदी तक कैसे पहुंची?
जमीन बदली, बैंक ऋण था …और धान भी बिक गया…
संयोग या जांच का विषय? मामले का दूसरा सिरा ग्राम सोनपुर,तहसील भैयाथान की लगभग 3.13 हेक्टेयर यानी 7.7 एकड़ कृषि भूमि से जुड़ा बताया गया है, शिकायत के अनुसार यह भूमि पहले जरीफुल्ला के नाम थी और बाद में हदीस मोहम्मद,रिजवान अंसारी और साधना कुशवाहा के नाम दर्ज होने की बात कही गई है,भूमि हस्तांतरण के समय और संबंधित आपराधिक मामलों की परिस्थितियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं,इसके साथ ही संबंधित जमीन पर एचडीएफसी बैंक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के ऋण दर्ज होने का दावा है, तो अगला सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है यदि जमीन पर ऋण या बंधक था तो रजिस्ट्री से पहले बैंक की एनओसी क्या थी? यदि एनओसी थी तो सामने लाई जाए, यदि ऋण चुका दिया गया था तो भुगतान का रिकॉर्ड सामने आए, यदि बंधक हटा था तो उसका दस्तावेज दिखे,क्योंकि जमीन की रजिस्ट्री कोई ऐसा कागज नहीं जिसे चाय की दुकान पर बैठकर मौखिक रूप से बदल दिया जाए।
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