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रायपुर@एक की मेज पर पूरा विभाग, दूसरे की पहुंच रायपुर तक! बेनी राम और नितेश के इर्द-गिर्द घूमते सवाल, कुर्सी का कमाल या प्रभाव का जाल?

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  • बेनी राम के पास प्रभारों का पहाड़,नितेश की रायपुर तक पकड़ की चर्चा,खाद्य एवं औषधि प्रशासन में ‘प्रभाव’ का खेल कितना गहरा?
  • अंबिकापुर की पोस्टिंग,रायपुर की दौड़ और कई शाखाओं की चाबी : बेनी राम-नितेश पर उठे सवाल,विभाग में आखिर किसका चलता है?
  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन में ‘दो पावर सेंटर’ की चर्चा, बेनी राम के पास कई शाखाओं की चाबी, नितेश की रायपुर तक दौड़ पर सवाल…
  • एक को जिम्मेदारियों का अंबार,
  • दूसरे की वर्षों से एक ही संभाग में मौजूदगी की चर्चा…प्रभार और पदस्थापना का खेल… नियमों से चलता है…या प्रभाव से?
  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन में दो चर्चित चेहरे,बेनी राम साहू और नितेश मिश्रा पर सवालों का घेरा
  • एक के पास कई शाखाओं की चाबी,दूसरे की लंबे समय तक एक ही संभाग में पदस्थापना
  • की चर्चा…क्या यह महज प्रशासनिक
  • संयोग है या प्रभाव की कहानी?


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,02 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन में इन दिनों दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं,एक तरफ सहायक औषधि नियंत्रक बेनी राम साहू, जिनके पास एक साथ कई महत्वपूर्ण शाखाओं की जिम्मेदारी होने का दस्तावेज सामने है,दूसरी तरफ खाद्य विभाग के नितेश मिश्रा, जिनके बारे में लंबे समय से एक ही संभाग से बाहर नहीं जाने, एक ही जिले में लंबे समय तक काम करने और अन्य जिलों का प्रभार संभालने की चर्चा है,सवाल यह नहीं कि किसी अधिकारी को जिम्मेदारी क्यों दी गई। सवाल यह है कि जिम्मेदारियों, पदस्थापना और प्रभार का यह असाधारण संतुलन आखिर बनता कैसे है और किन नियमों के तहत बनता है? सरकारी दफ्तरों में आम कर्मचारी अगर एक जगह कुछ साल टिक जाए तो स्थानांतरण की फाइल उसके पीछे ऐसे पड़ती है जैसे विभाग को उसकी कुर्सी से व्यक्तिगत शिकायत हो,लेकिन यदि कोई अधिकारी लंबे समय तक एक ही प्रभाव क्षेत्र में बना रहे और ऊपर से अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी मिलती रहें,तो सवाल उठना स्वाभाविक है, यहां मामला दो अधिकारियों का है,लेकिन बहस पूरे सिस्टम की है—क्या विभाग में जिम्मेदारी योग्यता के आधार पर बांटी जाती है या फिर प्रभाव के आधार पर? इस 4 अप्रैल 2025 के आदेश में बेनी राम साहू के लिए ऊपर बताए चार प्रमुख शाखा-प्रभार स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, वही सूत्रों की माने तो स्टेट लाइसेंस अथॉरिटी, ब्लड बैंक कंट्रोलिंग अथॉरिटी,हृष्ठक्कस् या बलौदाबाजार लाइसेंस अथॉरिटी जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी इनके पास है,इसलिए उन्हें इस सारणी में जोड़ना दस्तावेज के आधार पर उचित नहीं होगा।
अब खाद्य विभाग के नितेश मिश्रा की बारी- दूसरा नाम है नितेश कुमार मिश्रा का,पूर्व में सामने रखे गए तथ्यों और आरोपों के अनुसार दिसंबर 2015 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने के बाद उनका मूल प्रभार बलरामपुर रहा,अलग-अलग अवधियों में सरगुजा, सूरजपुर और कोरिया जैसे जिलों के अतिरिक्त प्रभार से भी उनका नाम जोड़ा गया,2015 से 2025 के बीच सरगुजा संभाग में लंबे समय तक बने रहने,बाद में पदोन्नति के बाद अंबिकापुर मुख्यालय मिलने तथा 2024-25 में बलरामपुर के मूल दायित्व के साथ अन्य जिम्मेदारियां संभालने को लेकर सवाल उठाए गए हैं, इसीलिए सवाल अब सीधे उठ रहा है…नितेश कुमार मिश्रा अंबिकापुर के अधिकारी हैं या रायपुर के? पदस्थापना अंबिकापुर में हो और विभागीय गलियारों में सक्रियता रायपुर मुख्यालय तक की चर्चा का विषय बने,तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी औपचारिक जिम्मेदारी क्या है और स्थापना,स्थानांतरण तथा पदोन्नति जैसे मामलों में उनकी कोई अधिकृत भूमिका है या नहीं, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उपरोक्त बातें आरोप और विभागीय चर्चाओं के रूप में सामने आई हैं,नितेश मिश्रा की पूरी सेवा-पुस्तिका,पदस्थापना आदेश, अतिरिक्त प्रभार के आदेश और पदोन्नति के बाद की पोस्टिंग का स्वतंत्र दस्तावेजी परीक्षण इन दावों की पुष्टि के लिए आवश्यक होगा,लेकिन यदि सेवा अभिलेख इन दावों की पुष्टि करते हैं तो सवाल निश्चित रूप से बड़ा होगा—क्या सरकारी स्थानांतरण नीति सभी अधिकारियों के लिए समान है?
बेनी राम साहू,प्रभार की फेहरिस्त छोटी नहीं- 4 अप्रैल 2025 के विभागीय आदेश में बेनी राम साहू को कई महत्वपूर्ण शाखाओं का शाखा प्रभारी अधिकारी बनाया गया है,आदेश में स्थापना शाखा,औषधि शाखा और स्टोर शाखा से जुड़ी जिम्मेदारियां उनके नाम दर्ज हैं, इसलिए उनके पास कई जिम्मेदारियां होने की बात महज चर्चा नहीं,बल्कि उपलब्ध दस्तावेज में दर्ज प्रशासनिक व्यवस्था है,स्थापना शाखा में विधानसभा,लोकसभा और राज्यसभा से संबंधित कार्य,पदोन्नति एवं सेवा संबंधी काम,विभागीय जांच,आपसी आवंटन,उच्च स्तर से प्राप्त पत्रों पर कार्रवाई,पेंशन/सेवानिवृत्ति,न्यायालयीन प्रकरण और अवकाश से संबंधित काम शामिल हैं,यानी फाइलें यहां केवल घूमती नहीं हैं,कर्मचारियों की सेवा से लेकर विभागीय विवादों तक का भविष्य तय करती हैं,औषधि शाखा में औषधि निर्माण,लोक सेवा गारंटी,सेल्स/प्राइमरी सेल्स,मान्यता प्राप्त मेडिकल स्टोर और मेडिकल डिवाइस से जुड़े कार्य शामिल हैं,इसके अलावा स्टोर शाखा में मुख्यालय और प्रयोगशाला की स्टोर शाखा से संबंधित कार्य भी उनके प्रभार में दर्ज हैं,अब सवाल यह नहीं कि जिम्मेदारी बड़ी है या छोटी,सवाल यह है कि इतनी अलग-अलग प्रकृति की महत्वपूर्ण शाखाओं को एक ही अधिकारी के पास रखने की प्रशासनिक जरूरत क्या थी? अगर विभाग में अधिकारियों की कमी थी,तो विभाग को यह बताना चाहिए,अगर यह अस्थायी व्यवस्था थी, तो इसकी समयसीमा क्या थी? और अगर यह स्थायी रूप से चली,तो इसकी समीक्षा कब हुई? सरकारी फाइलों में अक्सर ‘अतिरिक्त प्रभार’ दो शब्द होते हैं,लेकिन उसके पीछे काम इतना होता है कि एक अधिकारी के दिन में 24 घंटे भी कम पड़ जाएं,फिर सवाल यह भी है कि इतने काम पूरे करने की जिम्मेदारी तो एक अधिकारी की, लेकिन निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
अब नितेश मिश्राः दस साल की पदस्थापना का दावा-खाद्य विभाग से जुड़े नितेश मिश्रा को लेकर यह दावा सामने आया है कि वे लगभग दस वर्षों तक एक ही संभाग से बाहर नहीं गए और एक ही जिले में लंबे समय तक काम किया,साथ ही अन्य जिलों का प्रभार संभालने तथा पदोन्नति के बाद गृह जिले को चुनने की बात भी सामने रखी जा रही है,लेकिन यहां खबर की सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए,उपलब्ध दस्तावेज में नितेश मिश्रा की पूरी सेवा अवधि,पदस्थापना इतिहास और पदोन्नति के बाद गृह जिले की पोस्टिंग का स्वतंत्र प्रमाण मौजूद नहीं है, इसलिए इन बातों को दावे और जांच योग्य सवाल के रूप में ही रखा जाना चाहिए,यदि सेवा अभिलेख इन दावों की पुष्टि करते हैं तो सवाल गंभीर होगा—क्या सरकारी पदस्थापना नीति में लंबे समय तक एक ही संभाग में बने रहने की कोई विशेष प्रशासनिक वजह थी? और यदि रिकॉर्ड इन दावों को खारिज करते हैं,तो वही रिकॉर्ड चर्चा का सबसे साफ जवाब होगा। आखिर सरकारी व्यवस्था में सबसे मजबूत जवाब बयान नहीं,आदेश होता है।
रायपुर की दौड़ आखिर क्यों?-नितेश मिश्रा को लेकर विभागीय सूत्रों के हवाले से यह आरोप भी सामने आता रहा है कि वे अपने कार्यस्थल की तुलना में रायपुर स्थित उच्च कार्यालय में अधिक सक्रिय रहते हैं और स्थापना,स्थानांतरण तथा पदोन्नति से जुड़े मामलों में प्रभाव रखते हैं,यहां तक कहा जाता है कि मनचाही जगह पदस्थापना चाहिए या पदोन्नति में कोई अड़चन है तो उनसे संपर्क करने की चर्चा होती है,यह आरोप गंभीर है, लेकिन बिना दस्तावेज इसे सच मानना पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा,फिर भी सवाल यह है कि ऐसी चर्चा पैदा क्यों हुई? क्या उनके पास इन मामलों में कोई औपचारिक अधिकार है? यदि नहीं, तो विभागीय कर्मचारी उन्हें इन प्रक्रियाओं से जोड़कर क्यों देखते हैं? और यदि वे केवल अपने नियमित दायित्व निभाते हैं, तो उनकी भूमिका को लेकर बनी धारणा खत्म करने के लिए विभाग स्पष्ट स्थिति क्यों नहीं रखता? यही वह जगह है जहां ‘सेटिंग’जैसे शब्द विभागीय फुसफुसाहट से निकलकर सार्वजनिक सवाल बन जाते हैं,आरोप की पुष्टि जांच से होगी,लेकिन जांच की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, पिछले वर्षों के स्थानांतरण और पदोन्नति आदेशों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पता चल सकता है कि निर्णय सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुए या किसी विशेष पैटर्न के साथ।
प्रभाव या सिर्फ संयोग…फैसला फाइल करेगी- बेनी राम साहू के मामले में उपलब्ध आदेश यह बताता है कि कई संवेदनशील शाखाओं की जिम्मेदारी एक ही अधिकारी के पास है, नितेश मिश्रा के मामले में लंबे समय तक एक ही संभाग में बने रहने और कई जिलों के दायित्व संभालने के दावे हैं,इन दोनों स्थितियों से अपने आप राजनीतिक संरक्षण या किसी सिंडिकेट का प्रमाण नहीं मिलता,लेकिन अगर विभाग पारदर्शिता को लेकर गंभीर है तो दोनों मामलों की प्रशासनिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने में उसे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए,क्या अतिरिक्त प्रभार देने के लिए लिखित कारण दर्ज हैं? क्या ऐसे प्रभार की समय-समय पर समीक्षा होती है? क्या लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में पदस्थ अधिकारियों के लिए रोटेशन की नीति लागू होती है? क्या पदोन्नति के बाद गृह जिले की पोस्टिंग के लिए सभी अधिकारियों को समान अवसर मिलता है? और यदि किसी अधिकारी की मुख्यालय में सक्रिय भूमिका की चर्चा है तो क्या उसका कोई अधिकृत दायरा निर्धारित है? व्यंग्य में कहें तो सरकारी सेवा में नियमों की किताब मोटी जरूर है,लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब कोई कर्मचारी पूछता है— ‘यह नियम मेरे लिए भी है न?’अगर जवाब हां है, तो वही नियम हर अधिकारी पर दिखाई भी देना चाहिए।
संरक्षण किसका,व्यवस्था किसके भरोसे?- नितेश मिश्रा को लेकर कथित सिंडिकेट और अपने समाज के लोगों को लाभ पहुंचाने जैसे आरोप भी सामने रखे गए हैं,इन आरोपों को प्रमाणित करने के लिए ठोस दस्तावेज जरूरी हैं और किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान के आधार पर पक्षपात का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है,लेकिन यदि दावा किसी खास समूह को बार-बार लाभ पहुंचाने का है तो संबंधित वर्षों के पदस्थापना,प्रभार और पदोन्नति आदेशों का तुलनात्मक परीक्षण किया जा सकता है,इसी तरह बेनी राम साहू के प्रभार को लेकर भी सवाल व्यक्ति की क्षमता पर नहीं,व्यवस्था के केंद्रीकरण पर है, यदि इतने महत्वपूर्ण काम एक अधिकारी को सौंपना प्रशासनिक आवश्यकता थी तो कारण स्पष्ट होना चाहिए। अगर विभाग में अधिकारियों की कमी थी तो वह स्थिति भी सामने आनी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि व्यवस्था मजबूरी थी या पसंद,अंततः सवाल दो अधिकारियों के नाम से शुरू होकर पूरे विभाग की कार्यशैली तक पहुंचता है,क्या पदस्थापना और प्रभार के निर्णय रिकॉर्ड पर आधारित हैं? क्या उनकी नियमित समीक्षा होती है? और क्या किसी अधिकारी की व्यक्तिगत पहुंच प्रशासनिक प्रक्रिया से बड़ी तो नहीं हो रही? खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जिम्मेदारी जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए इस विभाग में केवल खाद्य और औषधि की गुणवत्ता ही नहीं,प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता भी साफ होनी चाहिए,बेनी राम साहू और नितेश मिश्रा से जुड़े सवालों का अंतिम उत्तर आरोप नहीं,बल्कि सेवा अभिलेख,आदेश और विभागीय जांच ही दे सकते हैं।
बेनी राम साहू : एक अधिकारी,कई
शाखाएं और सवालों की लंबी सूची…

बेनी राम साहू के मामले में सबसे मजबूत आधार खुद विभाग का 4 अप्रैल 2025 का कार्यालयीन आदेश है,इस आदेश में उन्हें कई शाखाओं का शाखा प्रभारी अधिकारी बनाया गया है,यानी यह केवल विभागीय गलियारों की चर्चा नहीं,बल्कि उपलब्ध दस्तावेज से सामने आने वाली प्रशासनिक व्यवस्था है,आदेश में स्थापना शाखा की जिम्मेदारी बेनी राम साहू को दी गई है,स्थापना शाखा में विधानसभा,लोकसभा और राज्यसभा से संबंधित कार्य,पदोन्नति एवं सेवा संबंधी कार्य,विभागीय जांच,आपसी आवंटन,उच्च स्तर से प्राप्त पत्रों पर कार्रवाई,पेंशन/सेवानिवृत्ति,न्यायालयीन प्रकरण और अवकाश जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं,यानी स्थापना की फाइलें कोई ऐसी फाइलें नहीं हैं जिन्हें चाय की प्याली के साथ आराम से निपटा दिया जाए,यहां कर्मचारियों की सेवा से लेकर विभागीय जांच और न्यायालयीन मामलों तक की जिम्मेदारी जुड़ी है,लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसी आदेश में औषधि शाखा में भी बेनी राम साहू को शाखा प्रभारी अधिकारी बनाया गया है,इस शाखा में औषधि निर्माण,लोक सेवा गारंटी, सेल्स/प्राइमरी सेल्स, मान्यता प्राप्त मेडिकल स्टोर और मेडिकल डिवाइस से जुड़े प्रकरण शामिल हैं,इसके बाद स्टोर शाखा भी उनके हिस्से में है,आदेश में मुख्यालय और प्रयोगशाला की स्टोर शाखा से संबंधित समस्त कार्य उनके प्रभार में दर्शाए गए हैं,अब जरा हिसाब लगाइए…स्थापना,औषधि और स्टोर जैसी अलग-अलग प्रकृति की महत्वपूर्ण शाखाएं एक ही अधिकारी के पास। सवाल उठना लाजिमी है कि एक अधिकारी एक साथ इतने मोर्चों पर कितनी प्रभावी निगरानी कर सकता है? सरकारी व्यवस्था में अतिरिक्त प्रभार कोई अपराध नहीं है,स्टाफ की कमी या प्रशासनिक आवश्यकता में ऐसा होना संभव है,लेकिन जब अतिरिक्त जिम्मेदारियां लगातार बनी रहें तो उसकी समीक्षा भी होनी चाहिए। वरना स्थिति ऐसी हो सकती है कि विभाग में फाइलें ज्यादा हों और फाइल देखने वाले वही पुराने दो हाथ!


बेनी राम साहू के पास कौन-कौन सी शाखाएं और क्या-क्या काम?


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