- बारिश में बढ़ता पानी,घटती सुरक्षाः हादसे का इंतजार या पहले होगी व्यवस्था?
- वार्ड क्रमांक 07 में किताबों से ज्यादा जरूरी हो गया पानी के बहाव से बचना, पुलिया के अभाव में हर दिन जोखिम उठा रहे बच्चे
- सोनवर्षा में नाला पार कर स्कूल जाने को मजबूर बच्चे, बदहाल व्यवस्था ने बढ़ाया जान का खतरा
राजन पाण्डेय
मनेंद्रगढ़,02 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। मानसून आते ही ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में विकास के दावों की असली तस्वीर सामने आने लगती है, मनेंद्रगढ़ क्षेत्र के सोनवर्षा वार्ड क्रमांक 07 से सामने आई तस्वीरें इसी जमीनी हकीकत को बयां कर रही हैं,यहां स्कूली बच्चों को शिक्षा हासिल करने के लिए किसी सामान्य रास्ते से नहीं,बल्कि बरसात में उफनते नाले को पार कर स्कूल पहुंचना पड़ रहा है,बच्चों के कंधे पर स्कूल बैग है, हाथों में किताबें हैं और सामने तेज बहाव वाला पानी—ऐसे में हर कदम सिर्फ स्कूल की ओर नहीं,बल्कि जोखिम की ओर भी बढ़ता दिखाई देता है,सरकार की योजनाओं में बच्चों की शिक्षा,सुरक्षित आवागमन और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही जाती है,लेकिन सोनवर्षा की स्थिति इन दावों के सामने एक सीधा सवाल खड़ा करती है—क्या स्कूल तक पहुंचने के लिए किसी बच्चे को अपनी जान जोखिम में डालनी चाहिए?
किताबों के साथ नाला पार करते मासूम
सोनवर्षा वार्ड क्रमांक 07 में बारिश के दिनों में नाले का जलस्तर बढ़ जाता है, स्थानीय स्तर पर सामने आई तस्वीरों और ग्रामीणों के अनुसार बच्चों को इसी पानी को पार कर स्कूल जाना पड़ता है, पानी का बहाव बढ़ने पर यह रास्ता और अधिक खतरनाक हो जाता है,जिस उम्र में बच्चों को स्कूल की कक्षा में बैठकर पढ़ाई करनी चाहिए,उसी उम्र में उन्हें पानी की गहराई, बहाव और फिसलन का अंदाजा लगाकर कदम बढ़ाना पड़ रहा है, एक तरफ स्कूल पहुंचने की मजबूरी है तो दूसरी तरफ रास्ते में किसी अनहोनी की आशंका, सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है, जब तेज बारिश के बाद नाले में अचानक पानी बढ़ जाता है, बरसाती नालों का जलस्तर स्थिर नहीं रहता, कुछ समय पहले तक सामान्य दिखने वाला रास्ता अचानक तेज बहाव वाली धारा में बदल सकता है। ऐसे में छोटे बच्चों के लिए नाला पार करना बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता है।
अभिभावकों के सामने मजबूरी, बच्चों के सामने जोखिम- स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के दौरान नाले का पानी बढ़ने पर बच्चों को स्कूल भेजना अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बन जाता है, बच्चे शिक्षा से वंचित न हों, इसलिए उन्हें भेजना पड़ता है, लेकिन रास्ते का जोखिम हर समय डर पैदा करता है, ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बच्चे भी शहरों के बच्चों की तरह सुरक्षित रास्ते से स्कूल पहुंचने के हकदार हैं, किसी बच्चे का ग्रामीण या दूरस्थ क्षेत्र में रहना उसके लिए अतिरिक्त जोखिम का कारण नहीं होना चाहिए, यदि किसी इलाके में वर्षों से आवागमन की समस्या है और बरसात में वह समस्या जानलेवा रूप ले लेती है, तो उसे केवल मौसमी परेशानी मानकर छोड़ देना प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
विकास के दावों और जमीनी तस्वीर में कितना अंतर?- ग्रामीण इलाकों में सड़क, पुल-पुलिया और आवागमन की सुविधाओं को लेकर लगातार विकास कार्यों की बातें होती हैं, लेकिन सोनवर्षा वार्ड क्रमांक 07 की तस्वीर यह पूछने को मजबूर करती है कि विकास की योजनाओं की प्राथमिकता तय करते समय ऐसे रास्तों का सर्वेक्षण कितना गंभीरता से किया जाता है, एक तरफ बड़े विकास कार्यों की चर्चा होती है, दूसरी तरफ किसी छोटे से नाले पर सुरक्षित पुलिया का अभाव बच्चों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहा है, सवाल यह नहीं है कि समस्या कितनी बड़ी है, सवाल यह है कि समस्या के कारण कितने लोग प्रभावित हो रहे हैं और कब तक होते रहेंगे।
‘हादसा होने के बाद’ वाली व्यवस्था से कब मिलेगी मुक्ति?- ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि कहीं इस समस्या का समाधान किसी दुर्घटना के बाद करने की परंपरा न बन जाए, अक्सर किसी घटना के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचते हैं, स्थिति का जायजा लिया जाता है और कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि जब खतरा पहले से दिखाई दे रहा है तो हादसे का इंतजार क्यों? सोनवर्षा में बच्चों का नाला पार करना कोई छिपी हुई समस्या नहीं है, तस्वीरें खुद इस स्थिति की गंभीरता बयान कर रही हैं, ऐसे में संबंधित विभागों को मौके का निरीक्षण कर यह पता लगाना चाहिए कि यहां स्थायी पुलिया, पुल या सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग की क्या आवश्यकता है।
स्कूल जाना शिक्षा का अधिकार,जोखिम उठाना मजबूरी क्यों?
शिक्षा बच्चों के भविष्य की बुनियाद है,लेकिन यदि विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता ही सुरक्षित नहीं है तो ग्रामीण बच्चों के सामने एक अजीब परिस्थिति पैदा हो जाती है,अभिभावकों के सामने भी दोहरी चिंता है,बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे तो पढ़ाई प्रभावित होगी और भेजेंगे तो रास्ते में उनकी सुरक्षा को लेकर डर बना रहेगा,खासकर छोटे बच्चों के मामले में यह चिंता और गंभीर हो जाती है,सवाल यह भी है कि यदि किसी बच्चे का पैर फिसल जाए,वह पानी के बहाव में गिर जाए या अचानक जलस्तर बढ़ जाए तो उस स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी?
बरसात में नाला बन जाता है ‘अघोषित परीक्षा केंद्र’
सोनवर्षा की तस्वीर को अगर व्यंग्यात्मक अंदाज में देखा जाए तो यहां बच्चों की पढ़ाई के साथ एक अतिरिक्त विषय भी जुड़ गया है नाला पार करने की कला,स्कूल बैग में किताबें हैं,लेकिन रास्ते में बच्चों को किताबों से ज्यादा पानी की गहराई और बहाव पर ध्यान देना पड़ता है, शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना होना चाहिए,मगर यहां रास्ता ही बच्चों की परीक्षा लेता नजर आ रहा है, यह स्थिति केवल एक सड़क या पुलिया की कमी नहीं बताती,बल्कि यह भी दिखाती है कि विकास की योजनाएं बनाते समय छोटी लेकिन बेहद जरूरी आधारभूत जरूरतों को कितना महत्व दिया जाता है।
जिम्मेदारी तय करने की जरूरत
यदि किसी बच्चे के साथ नाला पार करते समय दुर्घटना होती है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा कि संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन को इस जोखिम की जानकारी थी या नहीं, क्या पंचायत ने इस समस्या को चिन्हित किया है? क्या संबंधित विभाग ने स्थल का निरीक्षण किया है? क्या पुलिया निर्माण के लिए कोई प्रस्ताव तैयार किया गया है? क्या स्कूल प्रबंधन ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन को अवगत कराया है? इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।
पहले अस्थायी व्यवस्था,फिर स्थायी समाधान
स्थायी पुलिया या सुरक्षित मार्ग बनने में यदि समय लगता है तो तब तक प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करना चाहिए,बारिश के दिनों में बच्चों को जोखिम वाले रास्ते से रोकने,सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने और जलस्तर बढ़ने की स्थिति में निगरानी व्यवस्था करने जैसे कदम तत्काल उठाए जा सकते हैं,इसके साथ ही नाले की तकनीकी स्थिति, जल प्रवाह और बरसात में अधिकतम जलस्तर का आकलन कर स्थायी निर्माण की योजना तैयार करना जरूरी होगा।
सोनवर्षा पूछ रहा है…किताबें भारी हैं या व्यवस्था की चुप्पी?
सोनवर्षा वार्ड क्रमांक 07 की तस्वीर सिर्फ बच्चों के नाला पार करने की तस्वीर नहीं है, यह ग्रामीण विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल है, यह उस व्यवस्था से सवाल है,जहां बच्चे स्कूल जाने के लिए किताबों के साथ जोखिम भी लेकर निकलते हैं, बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए,पानी के तेज बहाव में संतुलन बनाने की मजबूरी नहीं,उनके रास्ते में स्कूल की घंटी होनी चाहिए, खतरे की धारा नहीं,अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इस समस्या को केवल बरसात की मौसमी परेशानी न मानकर बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़ा गंभीर विषय समझे, संबंधित अधिकारी मौके का निरीक्षण करें, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करें और स्थायी पुलिया अथवा सुरक्षित मार्ग के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाएं, क्योंकि किसी मासूम के बह जाने के बाद पुलिया बनाना विकास नहीं, बल्कि व्यवस्था की देर से जागी संवेदना होगी, सोनवर्षा के बच्चों को हादसे का इंतजार नहीं, सुरक्षित रास्ता चाहिए।
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