- शौचालय योजना पर सवाल,पुराने शौचालयों पर दोबारा लाभ का आरोप,200 पात्रों की अनदेखी…
- पति पीएमएवाई ऑपरेटर,पत्नी स्वच्छ भारत मिशन की समन्वयक, योजनाओं में लाभ वितरण पर सवाल
- कागजों में लाभ,जमीन पर कितने शौचालय? शाहनाज परवीन की भूमिका जांच के घेरे में…
- शौचालय योजना की सूची ने खोली पोल? करीबी को लाभ,पात्र हितग्राही इंतजार में…
- स्वच्छ भारत मिशन की व्यक्तिगत शौचालय योजना में लाभ वितरण पर सवाल, पति-पत्नी की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग,दस्तावेजों में12 हजार की भुगतान प्रविष्टि
-रवि सिंह-
कोरिया,26 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े कार्यों में कथित अनियमितताओं को लेकर जिला प्रशासन के समक्ष पहुंची शिकायतों ने अब हितग्राही चयन,योजना की राशि जारी करने और शौचालय निर्माण के सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जिला समन्वयक स्वच्छ भारत अभियान शहनाज परवीन और पीएमएवाई ऑपरेटर उनके पति मोहम्मद आसिफ की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। शिकायत में सबसे गंभीर आरोप व्यक्तिगत शौचालय योजना को लेकर है,आरोप है कि ऐसे अनेक लोग, जो वास्तव में योजना के पात्र थे,उन्हें लाभ नहीं मिला, जबकि पहले से शौचालय बनवा चुके अथवा कथित रूप से करीबी लोगों के नाम पर दोबारा लाभ स्वीकृत किए गए, शिकायतकर्ता का दावा है कि करीब 200 पात्र हितग्राही लाभ से वंचित हैं, इसी शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि शहनाज परवीन के ड्राइवर को शौचालय योजना का लाभ मिला,हालांकि उपलब्ध सरकारी लाभार्थी सूची में कथित नाम की एक प्रविष्टि अवश्य दिखाई देती है,लेकिन उपलब्ध दस्तावेज यह प्रमाणित नहीं करता कि उक्त व्यक्ति शहनाज परवीन का ड्राइवर है,इसलिए ड्राइवर होने का दावा फिलहाल शिकायत का आरोप है,जिसकी स्वतंत्र जांच जरूरी है।
दस्तावेज में 12 हजार की प्रविष्टि, प्रशासनिक स्वीकृति भी दर्ज-उपलब्ध लाभार्थी सूची में अलग-अलग पंचायतों के हितग्राहियों के नाम,पिता/पति का नाम, प्रोत्साहन राशि और प्रशासनिक स्वीकृति क्रमांक दर्ज हैं,इसी सूची में क्रमांक 194 पर ‘शाहेनापरवीन – मो इरशाद’ नाम दर्ज है,उसके सामने 12,000 की राशि और प्रशासनिक स्वीकृति क्रमांक 5063 दिनांक 01-07-2026 अंकित है,यही प्रविष्टि अब शिकायत में लगाए गए आरोपों के संदर्भ में जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन सकती है,प्रशासन को यह देखना होगा कि संबंधित लाभार्थी कौन है, उसकी पात्रता क्या थी,उसके घर में शौचालय की वास्तविक स्थिति क्या थी और भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किया गया,सिर्फ सूची में नाम दर्ज होना अनियमितता का प्रमाण नहीं है,लेकिन यदि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों के साथ इसे जोड़कर देखा जाए तो संबंधित लाभार्थी की पहचान और पात्रता का भौतिक सत्यापन जरूरी हो जाता है।
लाभार्थी सूची में सैकड़ों नाम, पंचायतवार जांच की मांग…
उपलब्ध दस्तावेज में केवल एक-दो नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में पंचायतों के हितग्राहियों के नाम दर्ज हैं,उदाहरण के तौर पर गिरजापुर पंचायत की सूची में क्रमांक 419 से 442 तक कई हितग्राहियों के नाम दर्ज हैं और प्रत्येक के सामने ?12,000 की राशि तथा प्रशासनिक स्वीकृति क्रमांक दिया गया है,इसी प्रकार अन्य पंचायतों के नाम भी सूची में लगातार दर्ज हैं, इसका अर्थ यह है कि यदि शिकायत की जांच होती है तो मामला किसी एक नाम तक सीमित नहीं रहना चाहिए,पूरी सूची का पंचायतवार भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए, खासकर उन हितग्राहियों की अलग सूची तैयार की जा सकती है जिनके नाम पर वर्ष 2026 में भुगतान हुआ है और फिर यह देखा जा सकता है कि उनके घर में वास्तविक शौचालय मौजूद है या नहीं।
2020 की पटना पंचायत की फाइल भी सामने-मामले में उपलब्ध एक अन्य दस्तावेज में ग्राम पंचायत पटना में दिव्यांग व्यक्तियों के व्यक्तिगत शौचालय निर्माण का उल्लेख है, इसमें कार्यालय जिला पंचायत कोरिया के प्रशासनिक स्वीकृति आदेश क्रमांक 3029 दिनांक 05.08.2020 का संदर्भ दिया गया है,पत्र के अनुसार ग्राम पंचायत पटना में 26 दिव्यांग व्यक्तिगत शौचालयों के निर्माण के लिए राशि स्वीकृत की गई थी। दस्तावेज में कहा गया है कि पंचायत को 7,15,894 प्राप्त हो चुके थे तथा चार दिव्यांग व्यक्तिगत शौचालयों का कार्य पूर्ण होना शेष बताया गया था,पत्र में यह भी उल्लेख है कि ग्राम पंचायत पटना नगर पंचायत में परिवर्तित हो जाने के कारण राशि प्राप्त नहीं होने से सामग्री प्रदाता को भुगतान नहीं किया जा सका,यह पत्र तत्कालीन स्थिति से जुड़ा है और अपने आप में किसी घोटाले की पुष्टि नहीं करता, लेकिन वर्तमान शिकायत के संदर्भ में पुराने और नए लाभार्थी रिकॉर्ड का मिलान महत्वपूर्ण हो सकता है।
कार्यालय सामग्री बेचने का आरोप, स्टॉक रजिस्टर से खुल सकता है सच- शिकायत में फरवरी 2026 में कार्यालय के लिए खरीदे गए प्रिंटर और अन्य सामग्री को कथित रूप से बेच दिए जाने का आरोप भी लगाया गया है, शिकायतकर्ता ने इसके लिए स्टॉक एंट्री की जांच की मांग की है,यदि सरकारी सामग्री वास्तव में खरीदी गई थी तो उसका खरीद बिल,भुगतान वाउचर, स्टॉक रजिस्टर,उपयोग की स्थिति और वर्तमान भौतिक उपलब्धता रिकॉर्ड से जांची जा सकती है,इस आरोप में भी दस्तावेजी जांच महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल शिकायत के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता।
नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल– उपलब्ध शिकायत में आसिफ मोहम्मद की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं,शिकायतकर्ता ने उनके निवास प्रमाण-पत्र,पुलिस/चरित्र सत्यापन और नियुक्ति के समय प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच की मांग की है,शिकायत में सात बिंदुओं में जांच की मांग की गई है। इनमें यह पता लगाने की मांग की गई है कि नियुक्ति किस पद पर और किस आदेश के तहत हुई, पद के लिए निर्धारित पात्रता एवं चयन प्रक्रिया क्या थी, नियुक्ति के समय कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और निवास प्रमाण-पत्र का सत्यापन किस अधिकारी अथवा कार्यालय ने किया,साथ ही पुलिस/चरित्र सत्यापन कराया गया था या नहीं तथा चयन/नियुक्ति में किस अधिकारी ने अनुशंसा और अनुमोदन किया, इसकी भी जांच की मांग की गई है।
महिला कर्मचारियों को प्रताडि़त करने का आरोप-शिकायत में शहनाज परवीन पर पूर्व में तीन महिला कर्मचारियों को कथित रूप से प्रताडि़त करने का आरोप भी लगाया गया है, शिकायतकर्ता का दावा है कि या तो उन्हें नौकरी से हटाया गया या नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया,यह आरोप भी दस्तावेजी और विभागीय जांच का विषय है,संबंधित कर्मचारियों के बयान,उनके सेवा रिकॉर्ड, स्थानांतरण/हटाने के आदेश तथा शिकायतों की पुरानी फाइलों से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
समुदाय विशेष को लाभ देने के आरोप पर भी जांच जरूरी-शिकायत में कुछ छोटे कर्मचारियों को परेशान करने तथा प्लंबर, चौकीदार, इलेक्टि्रशियन सहित अन्य कामों में कथित रूप से परिचित लोगों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया गया है,यह आरोप संवेदनशील प्रकृति का है। इसलिए बिना प्रमाण किसी समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा,यदि इसकी जांच की जाती है तो पिछले कुछ वर्षों के कार्यादेश, भुगतान रिकॉर्ड,वेंडर सूची और काम आवंटित करने की प्रक्रिया का रिकॉर्ड निकालकर निष्पक्ष तुलना की जा सकती है।
जांच हुई तो सामने आएगा असली लाभार्थी और असली खेल-पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उपलब्ध दस्तावेज आरोपों की जांच की आवश्यकता जरूर दिखाते हैं,लेकिन किसी व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करते,शौचालय योजना में यदि शिकायतकर्ता के दावे के अनुसार करीब 200 पात्र परिवार वास्तव में लाभ से वंचित हैं और दूसरी ओर ऐसे लोगों को राशि दी गई है जिनके घर में पहले से शौचालय मौजूद था,तो यह योजना की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल होगा, वहीं यदि जांच में सभी लाभार्थी पात्र पाए जाते हैं और भुगतान नियमों के अनुसार हुआ है तो शिकायत में लगाए गए आरोपों का तथ्यात्मक निराकरण भी उतना ही आवश्यक होगा,इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि जांच को केवल कागजों तक सीमित न रखकर पंचायतवार और हितग्राहीवार भौतिक सत्यापन कराए।
जांच के लिए सात बड़े बिंदू…
वर्ष 2026-27 के सभी शौचालय हितग्राहियों का भौतिक सत्यापन।
पुराने ओडीएफ रिकॉर्ड और नई लाभार्थी सूची का मिलान।
प्रत्येक लाभार्थी के बैंक खाते में भुगतान की जांच।
. शौचालय की फोटो,जियो-टैगिंग और निर्माण की तारीख का सत्यापन।
पीएमएवाई और स्वच्छ भारत मिशन की संबंधित आईडी/लॉगिन का परीक्षण।
- कमीशन मांगने के आरोपों पर सरपंच, सचिव, वेंडर और हितग्राहियों के बयान।
- शहनाज परवीन और मोहम्मद आसिफ से जुड़े सभी आरोपों की मूल दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्र जांच।
फिलहाल सवाल यही है…
कागजों में जिन हितग्राहियों के नाम पर 12 हजार की राशि स्वीकृत है,क्या उनके घरों में वास्तव में शौचालय बने हैं? और जिन करीब 200 लोगों को पात्र होने के बावजूद लाभ नहीं मिला बताया जा रहा है,उनकी फाइलें आखिर किस स्तर पर अटकीं? अगर जिला प्रशासन इन सवालों का पंचायतवार जवाब तलाश लेता है,तो शौचालय योजना में लाभार्थी चयन और भुगतान की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।
सवाल यह नहीं कि सूची में नाम हैं,सवाल यह कि पात्र कौन था?
व्यक्तिगत शौचालय योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को शौचालय निर्माण के लिए प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराना है,ऐसे में शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि क्या वास्तविक पात्र परिवारों को योजना से बाहर कर दिया गया और पहले से लाभ प्राप्त कर चुके लोगों को दोबारा लाभ मिला? शिकायतकर्ता का आरोप है कि क्षेत्र में ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके घर में पहले ही शौचालय बन चुका था, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम पर दोबारा योजना का लाभ पहुंचाया गया,वहीं जिन परिवारों के घर में शौचालय नहीं है, वे अब भी योजना के लाभ का इंतजार कर रहे हैं,यदि यह आरोप सही है तो इसकी पुष्टि के लिए केवल सरकारी सूची देखना पर्याप्त नहीं होगा,प्रत्येक लाभार्थी के घर जाकर यह देखना होगा कि घर में शौचालय पहले से बना था या नहीं? शौचालय किस वर्ष और किस योजना से बना? क्या उसी परिवार को पहले भी प्रोत्साहन राशि मिली? वर्ष 2026-27 में उसके नाम पर दोबारा भुगतान क्यों हुआ? लाभार्थी का चयन किस स्तर पर हुआ? शौचालय निर्माण की फोटो और जियो-टैगिंग उपलब्ध है या नहीं? राशि किस खाते में भेजी गई? इन सवालों के जवाब ही वास्तविक स्थिति सामने ला सकते हैं।
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