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कोरिया/सोनहत@ विकास के नक्शे से गायब रेवला,जंगलों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार

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  • अमृतकाल के दावों के बीच रेवला की हकीकत,न सड़क,न स्कूल,न बिजली, न पानी
  • मोबाइल टावर खड़ा,नेटवर्क गायब;पाइपलाइन बिछी,पानी नहीं…यही है रेवला की कहानी
  • अंधेरे,प्यास और बदहाल रास्तों के बीच जी रहा रेवला, आखिर कब जागेगा सिस्टम?
  • जहां बच्चे हैं,लेकिन स्कूल नहीं…विकास की राह अब भी देख रहा रेवला
  • देश अमृतकाल मना रहा,रेवला अब भी मूलभूत सुविधाओं से महरूम
  • विशेष पिछड़ी जनजाति का गांव, लेकिन विकास से सबसे ज्यादा दूर रेवला
  • बच्चे हैं, लेकिन स्कूल नहीं…सड़क नहीं, बिजली नहीं, पीने का पानी नहीं; विशेष पिछड़ी जनजाति के इस
  • गांव में आज भी मूलभूत सुविधाओं का इंतजार


कोरिया/सोनहत,28 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
देश आज़ादी के अमृतकाल का उत्सव मना रहा है,प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ की बात कर रहे हैं,गांव-गांव तक सड़क,बिजली,नल-जल, शिक्षा,स्वास्थ्य और डिजिटल सेवाएं पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं,सरकारी विज्ञापनों में विकास की तस्वीर चमकती नजर आती है,लेकिन यदि इन दावों की हकीकत देखनी हो तो कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के सुदूर वनांचल में बसे रेवला गांव तक पहुंचना होगा,यहां पहुंचते ही सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला साफ दिखाई देता है,घने जंगल,ऊंचे पहाड़ और पगडंडियों के बीच बसे इस छोटे से गांव में करीब 50 से अधिक लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के बिना जीवन जीने को मजबूर हैं,गांव में सड़क नहीं, बिजली नहीं,शुद्ध पेयजल नहीं, मोबाइल नेटवर्क नहीं,स्वास्थ्य सुविधा नहीं और सबसे बड़ी विडंबना यह कि करीब 15 बच्चे होने के बावजूद गांव में एक भी स्कूल नहीं है,गांव में प्रवेश करते ही ग्रामीणों का एक ही सवाल सुनाई देता है साहब…हम भी छत्तीसगढ़ में ही रहते हैं…फिर हमारी इतनी अनदेखी क्यों? यह सवाल केवल किसी सरकार से नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र से है।
अंधेरे में गुजरती हर रात-जब शहरों और गांवों में शाम होते ही बिजली की रोशनी फैल जाती है, तब रेवला अंधेरे में डूब जाता है, गांव में न बिजली है और न ही कोई स्थायी सौर ऊर्जा व्यवस्था, करीब पांच वर्ष पहले क्रेडा द्वारा कुछ सोलर होम लाइटें दी गई थीं, लेकिन अधिकांश अब खराब हो चुकी हैं, आज भी ग्रामीण ढिबरी,दीया और टॉर्च के सहारे रात बिताते हैं, बच्चे पढ़ नहीं पाते, महिलाएं अंधेरे में भोजन बनाती हैं, बीमार व्यक्ति का इलाज भी टिमटिमाती रोशनी में होता है,यह केवल बिजली का अंधेरा नहीं, बल्कि विकास की रोशनी से दूर छूटे एक गांव की तस्वीर है।
विशेष पिछड़ी जनजाति का गांव, फिर भी सबसे ज्यादा उपेक्षित-रेवला में मुख्य रूप से विशेष पिछड़ी जनजाति पंडो और चेरवा समाज के लोग रहते हैं, पंडो जनजाति को विशेष संरक्षण की आवश्यकता वाले समुदाय के रूप में जाना जाता है, सरकारें इनके विकास के लिए विशेष योजनाओं और पैकेजों की घोषणा करती रही हैं,लेकिन रेवला की तस्वीर उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है,जब विशेष पिछड़ी जनजाति के लोग भी ड़क,बिजली,पानी,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हों, तब योजनाओं की जमीनी स्थिति पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
ग्रामीणों की सिर्फ एक मांग-पहले सड़क बनाइए…
रेवला के लोगों की मांग बहुत बड़ी नहीं है, वे कहते हैं पहले सड़क बना दीजिए,सड़क होगी तो—एम्बुलेंस आएगी,बच्चे स्कूल जाएंगे, किसान धान बेच पाएंगे, बिजली पहुंचेगी,पानी पहुंचेगा,स्वास्थ्य सेवाएं आएंगी,विकास अपने आप पहुंच जाएगा।
आखिर कब सुनेगा सिस्टम?
रेवला केवल एक गांव नहीं, बल्कि उन तमाम वनांचल गांवों का प्रतीक है जो आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं, जब पूरा देश अमृतकाल की उपलब्धियों का जश्न मना रहा है,तब रेवला के लोग आज भी एक सड़क, एक स्कूल,एक हैंडपंप और एक बिजली के खंभे का इंतजार कर रहे हैं,यह ग्राउंड रिपोर्ट केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उस सवाल की पड़ताल है जिसका जवाब शायद व्यवस्था के पास अभी भी नहीं है क्या इन ग्रामीणों का कसूर सिर्फ इतना है कि उनका जन्म जंगलों के बीच बसे एक दूरस्थ गांव में हुआ? और रेवला के हर घर से आज भी एक ही आवाज निकलती है—साहब…हम भी छत्तीसगढ़ में ही रहते हैं…फिर हमारी इतनी अनदेखी क्यों? क्या सरगुजा संभाग का पहला स्कूल विहीन गांव है रेवला?
रेवला की सबसे बड़ी पीड़ा शिक्षा है, गांव में लगभग 15 स्कूली बच्चे हैं, लेकिन उनके लिए एक भी प्राथमिक विद्यालय नहीं है,विडंबना यह है कि विकासखंड में ऐसे कई स्कूल संचालित हैं जहां विद्यार्थियों की संख्या दस से भी कम है,लेकिन रेवला आज भी स्कूल का इंतजार कर रहा है,सबसे निकट का प्राथमिक विद्यालय मेण्ड्रा में है,जो लगभग 20 किलोमीटर दूर है, पंचायत मुख्यालय कछाड़ी करीब 35 किलोमीटर दूर पड़ता है,ऐसे में ग्रामीण मजबूरी में बच्चों को मेण्ड्रा,सोनहत और तेलीमुड़ा की आश्रम शालाओं में भेजते हैं,एक ग्रामीण महिला भावुक होकर कहती है बच्चा बीमार हो जाए या उससे मिलने जाना हो,पूरा दिन लग जाता है…हमारे गांव में भी अगर एक छोटा-सा स्कूल होता तो शायद बच्चों का बचपन हमारे सामने बीतता।
यहां बीमार होना मतलब मौत से लड़ना…
रेवला में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है, गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती, जब कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ता है या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है तो ग्रामीण मरीज को खाट पर लिटाकर कई किलोमीटर तक पहाड़ और जंगल पार कर मुख्य सड़क तक ले जाते हैं,इसके बाद ही एम्बुलेंस मिलती है,अर्थात जिस समय मरीज को अस्पताल में होना चाहिए,उस समय वह जंगल के रास्ते जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा होता है, ग्रामीण बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की चिरायु टीम कभी-कभार आती है,लेकिन नियमित स्वास्थ्य सुविधा आज भी उपलब्ध नहीं है।
जल जीवन मिशन पहुंचा… लेकिन पानी नहीं…
रेवला में जल जीवन मिशन की पाइपलाइन जरूर दिखाई देती है,लेकिन पानी आज तक नहीं आया,ग्रामीण बताते हैं कि पाइप तो बिछा दिए गए, लेकिन न टंकी बनी,न बोरिंग हुई और न जलापूर्ति शुरू हुई, गांव में एक भी हैंडपंप नहीं है,ऐसे में पूरा गांव आज भी नाले का पानी पीने को मजबूर है,बरसात के दौरान यही पानी गंदगी से भर जाता है, जिससे मौसमी बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।
धान उगाते हैं…लेकिन बेच नहीं पाते…
रेवला के अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं, वे धान तो उगाते हैं,लेकिन सड़क नहीं होने के कारण उपज को सहकारी समिति तक नहीं पहुंचा पाते,कई किसानों का किसान पंजीयन नहीं हो पाया है,केसीसी और खाद-बीज जैसी सुविधाओं का लाभ भी सीमित है, ग्रामीण बताते हैं कि पटवारी केवल गिरदावरी के समय आते हैं, इसके अलावा शायद ही कोई अधिकारी गांव तक पहुंचता हो।
मोबाइल टावर बना…नेटवर्क आज तक नहीं…
डिजिटल इंडिया के दौर में भी रेवला संचार व्यवस्था से लगभग कटा हुआ है,ग्रामीण बताते हैं कि पिछली सरकार के दौरान बीएसएनएल का टावर लगाया गया,निर्माण पूरा हुआ,मशीनें भी लग गईं,लेकिन आज तक नेटवर्क चालू नहीं हुआ,टावर खड़ा है,लेकिन मोबाइल में सिग्नल नहीं आता।


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