- भर्ती में पारदर्शिता या पर्दे के पीछे खेल? महिला एवं बाल विकास विभाग की चयन प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
- पिछले साल निरस्त,इस साल फिर भर्ती…आखिर डाटा एंट्री ऑपरेटर पद पर क्या है राज?
- महिला एवं बाल विकास विभाग की संविदा भर्ती में फिर विवाद,चयन प्रक्रिया पर उठे भाई-भतीजावाद के सवाल
- योग्यता बनाम सेटिंग! महिला एवं बाल विकास विभाग की भर्ती प्रक्रिया पर अभ्यर्थियों का अविश्वास गहराया
- सरगुजा की संविदा भर्ती फिर सवालों के घेरे में…क्या प्रभावशाली लोगों के लिए बदले जा रहे हैं नियम?
- दावा-आपत्ति से पहले ही विवादों में भर्ती प्रक्रिया, महिला एवं बाल विकास विभाग से जवाब मांग रहे अभ्यर्थी
-संवाददाता-
अंबिकापुर,13 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ का महिला एवं बाल विकास विभाग इन दिनों एक बार फिर संविदा भर्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है,मिशन शक्ति योजना के अंतर्गत महिला सशक्तिकरण केंद्र के लिए जेंडर विशेषज्ञ,आईटी कोऑर्डिनेटर तथा पीएमएमवीवाई डाटा एंट्री ऑपरेटर सहित तीन पदों की भर्ती प्रक्रिया शुरू होते ही पुराने विवाद फिर चर्चा में आ गए हैं,विभाग ने पात्र-अपात्र सूची जारी कर 20 जुलाई तक दावा-आपत्ति आमंत्रित की है, लेकिन इस प्रक्रिया के साथ सबसे बड़ा सवाल फिर वही खड़ा हो गया है—पिछले वर्ष डाटा एंट्री ऑपरेटर का पद आखिर क्यों निरस्त किया गया था? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर विभाग ने आज तक सार्वजनिक नहीं किया। अब जब उसी पद पर दोबारा भर्ती हो रही है,तो अभ्यर्थियों और आम लोगों के बीच संदेह और गहरा गया है। बता दे की सरकारी भर्ती केवल नौकरी देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा होती है, यदि योग्य अभ्यर्थियों को यह विश्वास ही न रहे कि उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर अवसर मिलेगा, तो पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है, महिला एवं बाल विकास विभाग के पास अभी भी अवसर है कि वह इस भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाए,सभी अभिलेख सार्वजनिक करे और हर संदेह का तथ्यों के साथ उत्तर दे, अन्यथा यह भर्ती भी उन विवादित प्रक्रियाओं की सूची में शामिल हो सकती है, जिनकी चर्चा वर्षों तक होती रहती है, यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या अभ्यर्थी पर लगाए गए आरोपों के संबंध में उनका पक्ष उपलब्ध होता है, तो पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुसार उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
10 जुलाई 2026 को विभाग ने तीनों पदों के लिए पात्र-अपात्र सूची प्रकाशित कर दावा
आपत्ति आमंत्रित की, जेंडर विशेषज्ञ और डाटा एंट्री ऑपरेटर पदों के आवेदकों की सूची,अंक और पात्रता संबंधी विवरण भी प्रकाशित किए गए हैं,लेकिन सूची जारी कर देना ही पारदर्शिता नहीं कहलाता,वास्तविक पारदर्शिता तब होगी जब विभाग बताए प्रत्येक अभ्यर्थी को कितने अंक किस आधार पर दिए गए? अनुभव प्रमाण-पत्रों का सत्यापन कैसे किया गया? किस अभ्यर्थी को अपात्र घोषित करने का कारण क्या है? चयन समिति ने किस आधार पर निर्णय लिया?
क्या प्रभावशाली लोगों के लिए बदल जाते हैं नियम?- भर्ती प्रक्रिया को लेकर विभाग के भीतर और बाहर यह चर्चा है कि प्रभावशाली लोगों के परिजनों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जाती है, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है,इसलिए इन्हें आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, लेकिन यदि ऐसी आशंकाएं लगातार उठ रही हैं तो विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक जांच के लिए खोले।
पूरे प्रदेश में एक जैसी शिकायतें— क्या यह केवल संयोग है?-
यदि अलग-अलग जिलों से एक जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो यह केवल संयोग नहीं माना जा सकता,सरकार को पूरे प्रदेश की संविदा नियुक्तियों का स्वतंत्र ऑडिट कराना चाहिए।
जनता के पैसे से चलने वाली भर्ती, जनता से क्यों छिपाई जाए?
सरकारी विभागों में होने वाली हर भर्ती जनता के पैसे से संचालित होती है,फिर मेरिट सूची,अंक, अनुभव सत्यापन और चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक करने में हिचक क्यों? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो पारदर्शिता से विभाग की विश्वसनीयता और बढ़ेगी।
अब जांच से ही खत्म होगा विवाद
यदि सरकार वास्तव में पारदर्शी भर्ती व्यवस्था चाहती है तो केवल चयन सूची जारी करना पर्याप्त नहीं होगा,एक स्वतंत्र जांच समिति गठित कर निम्न बिंदुओं की जांच कराई जानी चाहिए पिछले वर्ष की भर्ती प्रक्रिया,डाटा एंट्री ऑपरेटर पद निरस्त करने का कारण,वर्तमान भर्ती में अंक निर्धारण, अनुभव प्रमाण-पत्रों का सत्यापन,चयन समिति की कार्यवाही,यदि कोई अनियमितता मिले तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही।
क्या सरकारी नौकरियां अब मेरिट से नहीं…‘मैनेजमेंट’ से तय होंगी?
सरकारी भर्ती व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार होता है,निष्पक्षता,पारदर्शिता और योग्यता,लेकिन जब बार-बार शिकायतें सामने आने लगें,चयन प्रक्रियाएं विवादों में घिर जाएं और एक ही विभाग की संविदा नियुक्तियों पर लगातार प्रश्न उठने लगें,तब यह मान लेना कठिन हो जाता है कि सब कुछ सामान्य है,महिला एवं बाल विकास विभाग की संविदा नियुक्तियों को लेकर सरगुजा संभाग के कई जिलों सरगुजा,सूरजपुर,कोरिया और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं,अभ्यर्थियों ने अनुभव प्रमाण-पत्र,मेरिट,चयन समिति और अंक निर्धारण को लेकर सवाल उठाए,लेकिन अधिकांश मामलों में जांच का परिणाम सार्वजनिक नहीं हुआ,यही कारण है कि अब हर नई भर्ती पर अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर होता जा रहा है।
डाटा एंट्री ऑपरेटर का पद ही क्यों बना रहस्य?
यदि पिछले वर्ष किसी तकनीकी कारण से पद निरस्त किया गया था,तो आदेश सार्वजनिक होना चाहिए था, यदि किसी अभ्यर्थी की पात्रता विवादित थी, तो विभाग को बताना चाहिए था,यदि कोई शिकायत आई थी,तो उसकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए थी,यदि प्रक्रिया पूरी तरह सही थी, तो फिर केवल यही पद क्यों रोका गया जबकि अन्य पदों पर नियुक्तियां हो गईं? यही वह प्रश्न है जो पूरी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
अनुभव प्रमाण-पत्र सबसे कमजोर कड़ी?
संविदा भर्ती में अनुभव के अंक निर्णायक भूमिका निभाते हैं,यदि अनुभव प्रमाण-पत्रों का वास्तविक सत्यापन नहीं होता, तो पूरी मेरिट सूची प्रभावित हो सकती है, क्या विभाग ने संबंधित संस्थानों से लिखित सत्यापन कराया? क्या वेतन भुगतान, उपस्थिति और सेवा अवधि का मिलान किया गया? क्या केवल कागज देखकर अंक दे दिए गए? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा,तब तक निष्पक्षता पर संदेह बना रहेगा।
दावा-आपत्ति केवल औपचारिकता न बन जाए…
आपत्ति प्रक्रिया का उद्देश्य केवल सूची प्रकाशित करना नहीं,बल्कि त्रुटियों को सुधारना है,यदि अभ्यर्थियों की आपत्तियों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया,तो यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
चयन समिति भी जवाबदेह बने…
सरकारी भर्ती में चयन समिति केवल हस्ताक्षर करने वाली संस्था नहीं होती,उसी के निर्णय से तय होता है कि किसे नौकरी मिलेगी और कौन बाहर रहेगा,इसलिए चयन समिति की कार्यवाही,अंक निर्धारण और निर्णय प्रक्रिया भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
सरकार से उठ रहे बड़े सवाल
– पिछले वर्ष डाटा एंट्री ऑपरेटर का पद क्यों निरस्त हुआ?
– उस निर्णय का आदेश और कारण सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
– क्या अनुभव प्रमाण-पत्रों का स्वतंत्र सत्यापन हुआ?
– क्या चयन समिति की कार्यवाही सार्वजनिक होगी?
– क्या सभी अभ्यर्थियों को समान अवसर मिला?
– क्या शिकायतों की स्वतंत्र जांच होगी?
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