
- कटकोना…सिर्फ एक कॉलरी नहीं, हजारों सपनों और यादों की जन्मभूमि
- जहां बचपन ने सपने देखे और सफलता ने उड़ान भरी,वही है कटकोना
- डॉ. सरिता झा की भावुक पोस्ट ने ताजा कर दी कटकोना की सुनहरी यादें…
- कटकोना प्रकृति की गोद में बसा वह स्वर्ग,जो जीवनभर दिल में बस जाता है…
- कोरिया का कटकोना,जहां की मिट्टी ने गढ़े डॉक्टर,इंजीनियर और हजारों सफल चेहरे…
- बचपन,बरसात,पहाड़ और सरकारी क्वार्टर… कटकोना की यादों ने फिर कर दिया भावुक…
- रोजगार ने बुलाया,यादों ने हमेशा के लिए अपना बना लिया…यही है कटकोना की पहचान…
- कटकोना जहां हर पहाड़ी,हर बादल और हर रास्ता सुनाता है सफलता की कहानी…
- स्वर्ग कहीं और नहीं,कटकोना की उन्हीं पहाडि़यों में था… डॉ. सरिता झा की पोस्ट ने छुए हजारों दिल…
- बरसों बाद डॉ. सरिता झा की भावुक पोस्ट ने ताजा कर दी बचपन, प्रकृति और संघर्ष से सफलता तक की अनमोल यादें…
- एसईसीएल की कोयला नगरी नहीं, हजारों परिवारों की भावनाओं का संसार है कटकोना,डॉ. सरिता झा की फेसबुक पोस्ट ने ताजा कर दी बचपन और सफलता की अनमोल यादें…
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कटकोना 13 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। दुनिया में कुछ स्थान ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल नक्शे पर मौजूद एक गांव,कस्बा या कॉलोनी कह देना उनके साथ अन्याय होगा,वे स्थान लोगों के व्यक्तित्व,संस्कार,संघर्ष और सफलता की कहानी का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं,ऐसे स्थानों से लोग भले ही वर्षों पहले दूर चले जाएं,लेकिन उनकी स्मृतियां कभी दूर नहीं होतीं,छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला कटकोना कॉलरी भी ऐसा ही एक स्थान है। कटकोना केवल एक कोलियरी क्षेत्र नहीं है, यह हजारों परिवारों के जीवन का वह अध्याय है,जहां बच्चों ने चलना सीखा, स्कूल जाना सीखा,सपने देखना सीखा और उन्हीं सपनों को पूरा करने की पहली उड़ान भी यहीं से भरी, यही कारण है कि जो व्यक्ति एक बार कटकोना में रहा,वह चाहे देश के किसी भी कोने में पहुंच जाए, उसकी यादों में कटकोना हमेशा जीवित रहता है,इन्हीं यादों को हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सरिता झा ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से साझा किया, उन्होंने अपने बचपन के सरकारी क्वार्टर की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि कुछ जगहें केवल जगह नहीं होतीं,बल्कि हमारी पूरी दुनिया होती हैं,उनकी इस भावुक पोस्ट ने उन हजारों लोगों के दिलों को छू लिया,जिनका बचपन कभी कटकोना की पहाडि़यों,हरियाली और शांत वातावरण में बीता था।
कुछ जगहें सिर्फ जगह नहीं होतीं- डॉ. सरिता झा ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि वर्षों बाद जब उन्होंने अपने बचपन के उस सरकारी क्वार्टर की तस्वीर देखी तो ऐसा लगा जैसे पूरा बचपन आंखों के सामने जीवंत हो गया, उन्होंने लिखा कि कुछ जगहें सिर्फ जगह नहीं होतीं,वे हमारी पूरी दुनिया होती हैं,उन्होंने आगे याद किया कि कैसे बरसात के दिनों में बादल घर की छत को छूते हुए निकल जाते थे, चारों ओर हरियाली रहती थी,ठंडी हवाएं,पक्षियों की चहचहाहट और प्रकृति का अनुपम सौंदर्य उनके जीवन का हिस्सा था,उस समय शायद उन्हें एहसास नहीं था कि वे धरती के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक में रह रही हैं,उन्होंने लिखा कि समय बदल गया, जीवन आगे बढ़ गया,लेकिन कटकोना की पहाडि़यां,वह सरकारी क्वार्टर और बचपन की यादें आज भी उतनी ही ताजा हैं,उनकी पोस्ट की अंतिम पंक्तियां सबसे अधिक भावुक कर देने वाली हैं कहते हैं स्वर्ग कहीं ऊपर होता है, लेकिन मेरे लिए वह स्वर्ग कटकोना की उसी पहाड़ी पर बने छोटे से सरकारी क्वार्टर में था।
बिहार से आए पिता,लेकिन कर्मभूमि बनी कटकोना-डॉ. सरिता झा का पैतृक निवास बिहार के दरभंगा जिले में है, उनके पिता रामनरेश झा एसईसीएल में नौकरी के लिए वर्षों पहले कटकोना आए थे,सरकारी नौकरी के कारण पूरा परिवार कटकोना में आकर बस गया,यहीं बच्चों का जन्म हुआ,यहीं उनका बचपन बीता, यहीं परिवार ने जीवन के संघर्ष देखे,यहीं बच्चों ने सपनों को आकार देना शुरू किया,इस तरह भले ही पैतृक गांव बिहार रहा, लेकिन उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों कटकोना ही बन गई।
यहीं से शुरू हुई डॉक्टर बनने की यात्रा- डॉ. सरिता झा की शिक्षा भी कटकोना से ही शुरू हुई, उन्होंने प्राथमिक विद्यालय से लेकर हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई यहीं रहकर पूरी की, उस समय कटकोना जैसे छोटे क्षेत्र से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना आसान नहीं था, आज इंटरनेट, कोचिंग और डिजिटल सुविधाओं का दौर है, लेकिन उस समय सीमित संसाधनों में पढ़ाई करना किसी चुनौती से कम नहीं था,फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी,वर्ष 2006 में उन्होंने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया पीएमटी परीक्षा उत्तीर्ण कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त किया, उस समय मेडिकल सीटें बेहद सीमित थीं, प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन होती थी,कोचिंग सुविधाएं आज जैसी उपलब्ध नहीं थीं, ऐसे समय में पहले ही प्रयास में चयन होना स्वयं में बड़ी उपलब्धि थी,आज वे एक सफल चिकित्सक हैं,लेकिन उनकी सफलता की बुनियाद कटकोना की उसी मिट्टी में रखी गई थी।
कटकोना ने केवल डॉक्टर ही नहीं, हजारों सपनों को जन्म दिया- कटकोना की पहचान केवल कोयला खदानों तक सीमित नहीं रही,यह क्षेत्र वर्षों तक शिक्षा,अनुशासन और सामुदायिक जीवन का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता रहा,यहां रहने वाले अनेक परिवारों के बच्चे आज देश-विदेश में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, बैंक अधिकारी,सेना के अधिकारी और निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं,उनकी सफलता की पहली सीढ़ी यही कटकोना रही।
पत्रकार की नजर से कटकोना- इस खबर से मेरा व्यक्तिगत जुड़ाव भी है, डॉ. सरिता झा के छोटे भाई अभिज्ञाय झा मेरे सहपाठी और घनिष्ठ मित्र रहे हैं, हमने एक ही स्कूल और एक ही कक्षा में साथ पढ़ाई की, इसी कारण उनके घर आना-जाना लगा रहता था, उनके परिवार का सादगीपूर्ण जीवन, शिक्षा के प्रति समर्पण और बच्चों को आगे बढ़ाने की सोच आज भी याद है, जब सोशल मीडिया पर डॉ. सरिता झा की यह पोस्ट देखी तो लगा जैसे वर्षों पुरानी यादें फिर जीवित हो गई हों।
प्राकृतिक सुंदरता जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है- कटकोना की सबसे बड़ी पहचान उसका प्राकृतिक सौंदर्य है, बरसात के दिनों में यहां का दृश्य किसी पर्यटन स्थल से कम नहीं दिखाई देता,घने जंगल…ऊंची पहाडि़यां…बादलों से ढकी सड़कें…ठंडी हवाएं… हरियाली से लदे पेड़…कल-कल बहते छोटे झरने…और प्रकृति की अद्भुत शांति,बैकुंठपुर से कटकोना तक का सफर ही अपने आप में एक पर्यटन अनुभव बन जाता है,जो व्यक्ति पहली बार यहां आता है,वह इसकी सुंदरता देखकर मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।
कटकोना केवल स्थान नहीं, एक भावना है-आज भले ही समय बदल गया है,नई पीढ़ी बड़े शहरों में बस रही है,पुराने सरकारी क्वार्टर बदल गए हैं,जीवनशैली बदल गई है,लेकिन कटकोना की पहचान आज भी वही है,यह स्थान लोगों के लिए केवल एक कॉलरी क्षेत्र नहीं,बल्कि जीवन के सबसे खूबसूरत वर्षों का प्रतीक है।
यादें कभी पुरानी नहीं होतीं-डॉ. सरिता झा की फेसबुक पोस्ट केवल एक व्यक्तिगत स्मृति नहीं है,बल्कि उन हजारों लोगों की सामूहिक भावना है जिन्होंने कभी कटकोना में जीवन बिताया, यह पोस्ट हमें यह भी याद दिलाती है कि सफलता केवल महानगरों की देन नहीं होती,कई बार छोटे कस्बे,शांत वातावरण,पारिवारिक संस्कार और प्रकृति की गोद ही बड़े सपनों की असली पाठशाला बन जाते हैं,कटकोना ऐसी ही एक पाठशाला है जहां से हजारों लोगों ने उड़ान भरी और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी पहचान बनाई,लेकिन उनकी सफलता की जड़ें आज भी उसी मिट्टी में हैं,जहां कभी बरसात के बादल उनके घरों की छतों को छूकर गुजरते थे,शायद इसलिए कहा जाता है कुछ जगहें कभी पीछे नहीं छूटतीं, वे हमेशा दिल में बस जाती हैं, कटकोना भी उन्हीं जगहों में से एक है।
रोजगार ने बुलाया,अपनापन रोक लेता था…– कटकोना में देश के विभिन्न राज्यों से लोग रोजगार की तलाश में आए,बिहार…उत्तर प्रदेश…झारखंड…पश्चिम बंगाल…ओडिशा…हर राज्य के लोग यहां एक परिवार की तरह रहते थे, बच्चे साथ पढ़ते थे, त्योहार साथ मनाए जाते थे, एक-दूसरे के सुख-दुख में पूरा कॉलोनी परिवार शामिल रहता था, यही कारण है कि नौकरी समाप्त होने के बाद भी लोग कटकोना को भूल नहीं पाए।
आज भी सोशल मीडिया जोड़ देता है पुरानी यादों से…– आज फेसबुक,व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जैसे ही कटकोना की कोई तस्वीर सामने आती है,यहां रह चुके लोग तुरंत अपनी यादें साझा करने लगते हैं,कोई अपने स्कूल को याद करता है,कोई खेल का मैदान, कोई पहाडि़यां,कोई सरकारी क्वार्टर,तो कोई बरसात के दिनों में बादलों के बीच बीता बचपन,यही किसी स्थान की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वर्षों बाद भी लोग उसे उतने ही प्रेम से याद करें।
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