विकास के नाम पर खर्च हुए करोड़ों रुपए,लेकिन आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे कई इलाके…ईडी की कार्रवाई ने खड़े किए कई असहज सवाल

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,16 जून 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित जिला खनिज न्यास घोटाले की जांच अब सरगुजा संभाग तक पहुंच गई है। मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने अंबिकापुर में कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष राकेश गुप्ता से जुड़े ठिकानों पर छापेमार कार्रवाई की। कार्रवाई की खबर सामने आते ही राजनीतिक,प्रशासनिक और कारोबारी गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। हालांकि ईडी ने अभी तक आधिकारिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि जांच में क्या मिला और किस आधार पर कार्रवाई की गई,लेकिन इतना तय है कि यह छापा केवल एक व्यक्ति तक सीमित मामला नहीं माना जा रहा। दरअसल, यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब प्रदेश में डीएमएफ फंड के उपयोग,ठेकों के आवंटन,भुगतान प्रक्रिया और कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर पहले से ही गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यही वजह है कि अंबिकापुर में हुई ईडी की यह कार्रवाई अब केवल एक छापेमारी नहीं,बल्कि पूरे डीएमएफ तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करने वाली घटना के रूप में देखी जा रही है।
जिस फंड से बदलनी थी तस्वीर,उसी पर उठ रहे सबसे ज्यादा सवाल
जिला खनिज न्यास यानी डीएमएफ फंड का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि जिन क्षेत्रों में खनन गतिविधियां होती हैं,वहां के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा,सड़क,पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। खनन कंपनियों से प्राप्त राशि सीधे प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर खर्च होनी थी। लेकिन वर्षों से यह आरोप लगते रहे हैं कि डीएमएफ फंड के उपयोग में पारदर्शिता का अभाव रहा। कई स्थानों पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिए। कई परियोजनाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठे,तो कई योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी शिकायतें सामने आईं। यही कारण है कि जब ईडी जैसी केंद्रीय जांच एजेंसी इस मामले में सक्रिय हुई है तो लोगों की नजर अब केवल छापेमारी पर नहीं, बल्कि उन दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन पर है जिनकी जांच की जा रही है।
क्या जांच सिर्फ एक नाम तक सीमित रहेगी? यही वह सवाल है जो अंबिकापुर से लेकर रायपुर तक चर्चा का विषय बना हुआ है। डीएमएफ फंड का संचालन किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होता। इसमें प्रशासनिक स्वीकृतियां,तकनीकी अनुमोदन,निविदा प्रक्रिया, भुगतान व्यवस्था,ठेकेदार,आपूर्तिकर्ता और विभिन्न एजेंसियां शामिल होती हैं। ऐसे में यदि जांच वास्तव में व्यापक है तो सवाल केवल राकेश गुप्ता तक सीमित नहीं रहेंगे। जांच को यह भी देखना होगा कि…
– किन कार्यों के लिए भुगतान हुआ?
– किस प्रक्रिया के तहत ठेके दिए गए?
– कार्यों की गुणवत्ता क्या रही?
– भुगतान और वास्तविक कार्य में कोई अंतर था या नहीं?
– किन लोगों या संस्थाओं को सबसे अधिक लाभ मिला?
यदि इन सवालों की निष्पक्ष जांच होती है तो कई और नाम सामने आ सकते हैं।
ईडी की कार्रवाई ने कई
पुराने मामलों की याद दिलाई
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कोयला, शराब,भर्ती और विभिन्न वित्तीय मामलों में ईडी की कार्रवाई सुर्खियों में रही है। कई मामलों में बड़े अधिकारियों,कारोबारियों और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए। अब डीएमएफ घोटाले की जांच में सरगुजा तक पहुंची ईडी की कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यह भी माना जा रहा है कि यदि जांच एजेंसी को दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड से महत्वपूर्ण सुराग मिलते हैं तो आने वाले दिनों में और भी स्थानों पर कार्रवाई हो सकती है।
राकेश गुप्ता के ठिकानों पर कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है?
पूर्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष राकेश गुप्ता सरगुजा की राजनीति और व्यवसायिक गतिविधियों में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उनके ठिकानों पर ईडी की कार्रवाई को सामान्य घटना नहीं माना जा रहा। सूत्र बताते हैं कि ईडी की टीम ने अंबिकापुर स्थित प्रतिष्ठानों में कई घंटों तक दस्तावेजों की जांच की। वित्तीय रिकॉर्ड, लेन-देन से जुड़े दस्तावेज और अन्य सामग्री की पड़ताल की गई। हालांकि जांच एजेंसी ने अभी तक कोई आधिकारिक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया है, इसलिए किसी भी व्यक्ति की भूमिका को लेकर अंतिम टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ईडी की कार्रवाई ने यह संकेत दे दिया है कि जांच एजेंसियां अब डीएमएफ फंड से जुड़े आर्थिक नेटवर्क को समझने और उसकी परतें खोलने का प्रयास कर रही हैं।
सरगुजा में करोड़ों खर्च,लेकिन जनता के सवाल बरकरार
सरगुजा संभाग में डीएमएफ मद से वर्षों से करोड़ों रुपए खर्च किए जाते रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार,स्कूलों के उन्नयन,पेयजल योजनाओं,सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों के लिए बड़ी राशि स्वीकृत की गई। लेकिन आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। कई गांवों में पेयजल संकट बना हुआ है। सड़क और शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों को लेकर शिकायतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। ऐसे में आम नागरिकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि विकास के लिए इतना पैसा खर्च हुआ तो उसके परिणाम अपेक्षित स्तर पर क्यों दिखाई नहीं देते? ईडी की कार्रवाई ने इन्हीं पुराने सवालों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी है जवाबदेही
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, राजनीतिक बयानबाजी भी तेज होने की संभावना है। सत्ता पक्ष इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई बताएगा तो विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध का नाम दे सकता है। लेकिन आम जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। जनता यह जानना चाहती है कि विकास के नाम पर खर्च की गई राशि का वास्तविक उपयोग कहां हुआ। यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ तो जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए। और यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों की पहचान भी होनी चाहिए।
जनता के मन में
उठ रहे बड़े सवाल…
– क्या डीएमएफ फंड के उपयोग की स्वतंत्र ऑडिट जांच होगी?
– क्या केवल राजनीतिक व्यक्तियों पर कार्रवाई होगी या प्रशासनिक जिम्मेदारियों की भी पड़ताल होगी?
– जिन परियोजनाओं में करोड़ों रुपए खर्च हुए, उनकी भौतिक सत्यापन जांच होगी?
– क्या ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?
– क्या यह कार्रवाई किसी बड़े खुलासे की शुरुआत है?
– क्या सरगुजा में भी डीएमएफ फंड के उपयोग को लेकर नए तथ्य सामने आएंगे?
– सबसे महत्वपूर्ण सवालः आखिर विकास दिखता कहां है?
डीएमएफ फंड का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना था। लेकिन यदि आज भी कई क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर शिकायतें मौजूद हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वर्षों से खर्च किए गए करोड़ों रुपए का वास्तविक प्रभाव कितना रहा। ईडी की कार्रवाई ने कानूनी जांच से पहले एक नैतिक और प्रशासनिक बहस को जन्म दिया है। जनता अब केवल यह नहीं जानना चाहती कि किसके यहां छापा पड़ा, बल्कि यह जानना चाहती है कि विकास के लिए आए पैसे का लाभ वास्तव में किसे मिला। फिलहाल अंबिकापुर में ईडी की दस्तक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डीएमएफ फंड से जुड़े मामलों की जांच अब गंभीर मोड़ पर पहुंच चुकी है। लेकिन इस कार्रवाई की असली सफलता तब मानी जाएगी जब जांच केवल दस्तावेजों तक सीमित न रहकर उन सवालों का जवाब भी दे, जो वर्षों से खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोग पूछते आ रहे हैं।
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