भव्य सेट,बड़ा बजट,बड़े सितारे और भी तमाम तरह के पैंतरे अपनाकर हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा में चलती रहती है कांटे की टक्कर,मगर पर्यावरण को प्रमुखता देने और भव्यता से प्रस्तुत करने में आज भी आगे है दक्षिण भारतीय सिनेमा
जड़ों से जुड़ा सिनेमा
साल 2022 में रिलीज हुई कांतारा 16 करोड़ रुपये में बनती है। एक लोकमान्यता, एक साधारण पृष्ठभूमि और कहानी की सेंट्रल थीम-जंगल और इसकी जमीन। जमीन और जंगल की इस लड़ाई को इस अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है कि यह फिल्म 400करोड़ रुपये का कलेक्शन कर ले जाती है। प्रस्तुतिकरण की ताकत से कन्नड़ भाषा की इस फिल्म को देश ही नहीं दुनियाभर में पसंद किया गया मगर दूसरा पहलू यह है कि पर्यावरण चेतना और प्रकृति से जुड़ाव दिखाने में हिंदी सिनेमा कहीं न कहीं दक्षिण भारतीय सिनेमा से पीछे छूट रहा है।
केंद्र में हो प्रकृति
राज कपूर के दौर से लेकर मदर इंडिया, पाथेर पांचाली और हाथी मेरे साथी तक फिल्मों में प्रकृति को बखूबी दिखाया गया, लेकिन उस दौर में इन फिल्मों को केवल सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाता था, पर्यावरण संकट के चश्मे से नहीं। मनोरंजन-प्रधान फिल्में बना रहा हिंदी सिनेमा पर्यावरण को कहानी का छोटा हिस्सा तो बना लेता है मगर कहानी नहीं। दक्षिण भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत है उसका मिट्टी से जुड़ाव। चाहे कन्नड़ फिल्म कांतारा में दिखाया गया दैव और जंगल का रिश्ता हो, तमिल में बनी कादन में मनुष्य और जीवों के बीच का संबंध या मलयालम सिनेमा में बनी जल्लीकट्टु की प्रकृति के साथ जीने की छटपटाहट, मेकर्स अपनी लोककथाओं और जमीनी हकीकतों को बेधक दिखाने से डरते नहीं हैं। इसके विपरीत, हिंदी
सिनेमा के लिए जंगल अक्सर सिर्फ एक लोकेशन या हारर फिल्म का बैकड्राप बनकर रह जाता है।
इन्होंने दिखाई हिम्मत
कई निर्देशक हैं जो इस ओर कदम बढ़ाते हैं मगर विद्या बालन स्टारर शेरनी, केदारनाथ त्रासदी पर बनी केदारनाथ जैसे कुछ गिने-चुने अपवादों को छोड़ दें,तो हिंदी सिनेमा में पर्यावरण संकट दिखाने की हिम्मत कम ही दिखती है। वन्यजीव तस्करी पर बनी लकड़बग्घा बाघ और इंसान के संघर्ष की अनोखी कहानी पेश करती शेरदिल द पीलीभीत सागा,सूखा और ग्रामीण भारत की त्रासदी पर आधारित कड़वी हवा,जल, शेखर कपूर की पानी और कौन कितने पानी में फैक्टि्रयों द्वारा ग्राउंड वाटर को जहरीला बनाने के मुद्दे पर बात करती हैं।
इसके अलावा इरादा प्रकृति बनाम विकास पर बनी जोरम जैसी फिल्में हिंदी सिनेमा को इस रेस में बनाए हुए हैं,लेकिन इतनी मजबूती से नहीं कि कांतारा जैसी मिसाल बना जाएं। कहीं न कहीं हिंदी दर्शकों की इन फिल्मों को लेकर प्रतिक्रिया भी इस कमी की जिम्मेदार है। क्रिटिक्स ऐसी फिल्मों को तो सिर-आंखों पर बिठाते हैं,फिल्म फेस्टिवल इन्हें सोने से तौलते हैं मगर ये फिल्में बाक्स आफिस पर अपनी लागत तक नहीं निकाल पातीं।
सुरक्षित कदम ले जा रहे पीछे
पर्यावरण, आदिवासियों के अधिकार और इंसानी लालच बनाम जीव…ये ऐसे विषय हैं,जो सीधे तौर पर कार्पोरेट और तथाकथित विकास के माडल पर तीखे सवाल खड़े करते हैं। हिंदी सिनेमा का कामर्शियल ढांचा इन कड़वे और आक्रामक सवालों से बचने की कोशिश करता है,जबकि तमिल में बनी भूमिका या मलयालम फिल्म वलिया चिराकुल्ला पक्शिकल जैसी फिल्में सीधे तौर पर जमीन और जंगल की लड़ाई को मुख्यधारा के सिनेमा का हिस्सा बनाती हैं। कहना गलत न होगा कि दक्षिण भारतीय सिनेमा इन मुद्दों को इतने कामर्शियल और प्रभावी ढंग से पेश करता है कि दर्शक इन्हें हाथों-हाथ लेते हैं। वे पर्यावरण के संकट को इंसानी जज्बातों,थ्रिल और ड्रामे के साथ ऐसे बुनते हैं कि दर्शक हिल जाते हैं।
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