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एमसीबी@ संलग्न गुरुजी हुए असंलग्न

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  • कलेक्टर के एक आदेश से शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप
  • एमसीबी में संलग्नीकरण पर चली कैंची,आदेश आते ही ‘आका’ तलाशने निकले शिक्षक
  • प्रदेश में फिसड्डी बना एमसीबी,अब कलेक्टरका बड़ा एक्शन—18 शिक्षकों का संलग्नीकरण समाप्त
  • बोर्ड रिजल्ट में आखिरी स्थान और फिर प्रशासनका वार,संलग्न शिक्षकों की व्यवस्था खत्म
  • विद्यालय छोड़ कार्यालयों में जमे थे गुरुजी, खराब रिजल्ट के बाद कलेक्टर ने लौटाया स्कूल
  • संलग्नीकरण समाप्त होते ही वायरल हुआ शिक्षकों का चैट,सिस्टम पर निकली भड़ास
  • जुगाड़ से संलग्न,जुगाड़ से पुरस्कार? एमसीबी शिक्षा विभाग पर उठे बड़े सवाल
  • संलग्न शिक्षक अब खोज रहे नए सहारे, आदेश के बाद विभागीय गलियारों में बेचैनी
  • शिक्षा गुणवत्ता पुरस्कार पर भी सवाल,संलग्न शिक्षकों की भूमिका की जांच की मांग तेज
  • एमसीबी में ‘संलग्न संस्कृति’ पर प्रशासन का प्रहार,अब जवाबदेही तय होने का इंतजार
  • शिक्षा विभाग में वर्षों से चल रही सुविधा व्यवस्था पर चला कलेक्टर का डंडा


-रवि सिंह-
एमसीबी,17 मई 2026 (घटती-घटना)।
नवगठित एमसीबी जिले में शिक्षा व्यवस्था को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों के बीच अब प्रशासन ने बड़ा और सख्त कदम उठाया है, जिले की नव पदस्थ कलेक्टर ने शिक्षा विभाग में वर्षों से चली आ रही संलग्नीकरण व्यवस्था पर प्रहार करते हुए शिक्षकों के सभी प्रकार के संलग्नीकरण समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया है,आदेश जारी होते ही शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि एक साथ 18 शिक्षकों का संलग्नीकरण समाप्त किया गया है,इनमें वे शिक्षक भी शामिल हैं जो लंबे समय से अपने मूल विद्यालयों में पढ़ाने के बजाय विभिन्न कार्यालयों,परियोजनाओं, विभागीय शाखाओं और गैर शैक्षणिक कार्यों में संलग्न होकर कार्य कर रहे थे,इस कार्रवाई को सीधे तौर पर जिले के बेहद खराब बोर्ड परीक्षा परिणाम से जोड़कर देखा जा रहा है,एमसीबी जिला इस वर्ष बोर्ड परीक्षा परिणाम में पूरे प्रदेश में अंतिम पायदान पर पहुंच गया। यही वह बिंदु बना जहां प्रशासन ने यह मान लिया कि अब केवल समीक्षा बैठकों और निर्देशों से काम नहीं चलेगा,बल्कि व्यवस्था में वास्तविक हस्तक्षेप करना होगा,कलेक्टर के इस फैसले ने शिक्षा विभाग की उस व्यवस्था को सीधे चुनौती दी है, जो वर्षों से ‘संलग्नीकरण संस्कृति’ के नाम पर चलती रही और धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था को खोखला करती चली गई।
बोर्ड परीक्षा परिणाम ने खोल दी जिले की शिक्षा व्यवस्था की पोल- एमसीबी जिले का बोर्ड परीक्षा परिणाम इस बार प्रशासन और शिक्षा विभाग दोनों के लिए शर्मिंदगी का विषय बन गया,प्रदेश स्तर पर जारी परिणामों में जिला अंतिम स्थान पर पहुंच गया,यह केवल एक आंकड़ा नहीं था, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का आईना था जिसमें विद्यालयों में शिक्षकों की कमी लगातार बनी रही और बड़ी संख्या में शिक्षक स्कूल छोड़कर कार्यालयों और अन्य विभागों में संलग्न रहे,ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के कई स्कूलों में स्थिति यह रही कि बच्चों को नियमित विषय शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हो सके, कई जगह एक या दो शिक्षक पूरे विद्यालय की जिम्मेदारी संभालते रहे,जबकि दूसरी तरफ कुछ शिक्षक वर्षों तक ब्लॉक, जिला कार्यालयों और अन्य संस्थानों में संलग्न होकर अपेक्षाकृत सुविधाजनक माहौल में कार्य करते रहे, अब जब परीक्षा परिणाम सामने आया,तो सबसे पहले यही सवाल उठा कि आखिर पढ़ाई कौन कराएगा यदि शिक्षक विद्यालयों में रहेंगे ही नहीं? यही कारण है कि नव पदस्थ कलेक्टर ने अपनी प्रारंभिक समीक्षा में ही इस व्यवस्था को शिक्षा गुणवत्ता गिरने का एक बड़ा कारण माना और तत्काल प्रभाव से संलग्नीकरण समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।
आदेश जारी होते ही संलग्न शिक्षकों में बेचैनी-संलग्नीकरण समाप्ति का आदेश सामने आते ही शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई, सूत्र बताते हैं कि वर्षों से संलग्न व्यवस्था का लाभ ले रहे कई शिक्षक अचानक असहज स्थिति में आ गए। कुछ शिक्षकों को अब अपने मूल विद्यालयों में वापस लौटना पड़ेगा,जिनमें कई दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल भी शामिल हैं,इधर विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई कि कई शिक्षक अब नए ‘आका’ की तलाश में सक्रिय हो गए हैं,कहा जा रहा है कि कुछ लोग राजनीतिक संपर्कों, कुछ विभागीय प्रभाव और कुछ प्रशासनिक जुगाड़ के माध्यम से फिर से संलग्न होने की कोशिश में लग गए हैं,यानी आदेश ने केवल प्रशासनिक हलचल नहीं पैदा की, बल्कि वर्षों से बनी एक ‘आरामदायक व्यवस्था’ को भी हिला दिया है।
संलग्नीकरण-सुविधा या शिक्षा व्यवस्था पर बोझ?-शिक्षकों का संलग्नीकरण मूल रूप से अस्थायी प्रशासनिक आवश्यकता के लिए बनाया गया प्रावधान माना जाता है, लेकिन धीरे-धीरे कई जिलों में यह व्यवस्था ‘सुविधा संस्कृति’ में बदलती चली गई, कई शिक्षक विद्यालयों में पढ़ाने के बजाय कार्यालयीन कार्यों, योजनाओं, सर्वेक्षणों, विभागीय समन्वय, डाटा एंट्री और अन्य गैर शैक्षणिक कार्यों में वर्षों तक संलग्न रहे, इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान स्कूलों और विद्यार्थियों को उठाना पड़ा, ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बढ़ती गई, पढ़ाई प्रभावित होती गई और परीक्षा परिणाम लगातार गिरते गए, एमसीबी जिले का ताजा परिणाम उसी व्यवस्था का परिणाम माना जा रहा है।
संलग्न रहते हुए मिला ‘शिक्षा गुणवत्ता पुरस्कार’,अब उठ रहे सवाल– इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा उन शिक्षकों को लेकर हो रही है जिन्हें विद्यालयों में नियमित शिक्षण कार्य न करने के बावजूद ‘शिक्षा गुणवत्ता पुरस्कार’ तक मिल गए, बताया जा रहा है कि कुछ शिक्षक अन्य विभागों में संलग्न रहकर कार्यालयीन कार्य करते रहे, लेकिन पुरस्कार ऐसे मिले जैसे उन्होंने विद्यालयों में रहकर शिक्षा स्तर में बड़ा सुधार किया हो, अब लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर गुणवत्ता का मूल्यांकन कैसे हुआ? क्या बिना नियमित पढ़ाई कराए भी ‘उत्कृष्ट शिक्षक’ बना जा सकता है? क्या पुरस्कार वास्तविक कार्य के आधार पर दिए गए या फिर यह भी जुगाड़ व्यवस्था का हिस्सा था? अब इन पुरस्कारों की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठने लगी है।
वायरल व्हाट्सऐप चैट ने बढ़ाई चर्चा- संलग्नीकरण समाप्ति के बाद कथित रूप से कुछ शिक्षकों का व्हाट्सऐप चैट सोशल मीडिया में वायरल हो गया, इस चैट में कई शिक्षक आदेश को लेकर नाराजगी व्यक्त करते नजर आ रहे हैं, कुछ व्यवस्था को कोस रहे हैं, कुछ प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि कुछ अन्य कर्मचारियों के संलग्नीकरण का मुद्दा उठा रहे हैं, सबसे दिलचस्प बात यह बताई जा रही है कि जो शिक्षक वर्षों तक संलग्न व्यवस्था का लाभ लेते रहे, वही अब दूसरी श्रेणी के कर्मचारियों के संलग्नीकरण पर सवाल खड़े कर रहे हैं, इस वायरल चैट ने शिक्षा विभाग के भीतर चल रही बेचैनी को सार्वजनिक कर दिया है।
जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका पर भी उठे सवाल- बोर्ड परीक्षा परिणाम खराब आने के बाद अब जिला शिक्षा विभाग के नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि यदि जिला पूरे प्रदेश में अंतिम स्थान पर पहुंच गया, तो इसकी जिम्मेदारी केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं मानी जा सकती, लोग पूछ रहे हैं जिले में शैक्षणिक मॉनिटरिंग कैसी थी? विद्यालयों का निरीक्षण कितना हुआ? परिणाम सुधारने के लिए क्या रणनीति बनाई गई? संलग्नीकरण की समीक्षा क्यों नहीं हुई? जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं थे वहां व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई? हालांकि विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी है कि संलग्नीकरण समाप्ति के आदेश के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने राहत महसूस की, क्योंकि प्रारंभिक कार्रवाई का फोकस शिक्षकों पर चला गया और उच्च स्तर की जवाबदेही पर तत्काल चर्चा सीमित रह गई।
विद्यालय छोड़ कार्यालय संस्कृति ने बिगाड़ी व्यवस्था- एमसीबी जिले में लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि शिक्षा विभाग में ‘विद्यालय छोड़ कार्यालय संस्कृति’ विकसित हो गई थी, कुछ शिक्षक स्कूलों से ज्यादा समय कार्यालयों, बैठकों, योजनाओं और अन्य गैर शैक्षणिक गतिविधियों में बिताने लगे थे, परिणाम यह हुआ कि बच्चों की बुनियादी पढ़ाई प्रभावित हुई, विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को इसका सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा, जब शिक्षक विद्यालय में नहीं होंगे तो बच्चों की पढ़ाई, अनुशासन और परीक्षा तैयारी प्रभावित होना स्वाभाविक है, अब प्रशासन ने इसी संस्कृति पर पहला बड़ा प्रहार किया है।
अब अगला इंतजार — खराब परिणाम वाले स्कूलों पर कार्रवाई का
संलग्नीकरण समाप्ति के बाद अब पूरे जिले की नजर अगले कदम पर है।
क्या केवल संलग्न शिक्षक ही जिम्मेदार माने जाएंगे?
क्या खराब परिणाम देने वाले विद्यालयों की अलग समीक्षा होगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी?
क्या भविष्य में फिर से ‘जुगाड़ आधारित संलग्नीकरण’ शुरू नहीं होगा?
ये सवाल अब शिक्षा विभाग के सामने खड़े हैं।

नई कलेक्टर ने दे दिया बड़ा संदेश
नव पदस्थ कलेक्टर ने अपनी पहली ही बड़ी समीक्षा में यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब केवल कागजी सुधार और बैठकें पर्याप्त नहीं होंगी, यदि शिक्षा व्यवस्था सुधारनी है तो शिक्षकों को विद्यालयों तक वापस पहुंचाना होगा, जवाबदेही तय करनी होगी और वर्षों से चली आ रही सुविधाजनक व्यवस्थाओं पर रोक लगानी होगी, फिलहाल जिले में इस फैसले की चर्चा हर स्तर पर हो रही है, कुछ लोग इसे शिक्षा सुधार की दिशा में साहसिक कदम बता रहे हैं तो कुछ इसे वर्षों से चली आ रही ‘आरामदायक व्यवस्था’ पर पड़ा पहला बड़ा प्रशासनिक प्रहार मान रहे हैं, अब देखना यह होगा कि यह कार्रवाई केवल आदेश तक सीमित रहती है या वास्तव में एमसीबी जिले की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही तय करने की दिशा में आगे बढ़ती है।


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