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कोरिया@ तपती पथरीली दीवारों के बीच सिसकती प्यास…

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  • बेजुबान क्या जानें कि उनके हिस्से का पानी तो फाइलों में बह गया
  • भ्रष्टाचार ने सुखाया वन्यजीवों का हलक : बूंद भर पानी को तरसते जानवर और उनके सामने खड़ा कंक्रीट का सफेद हाथी
  • सूखते जलस्रोत के बीच आग से धधकते जंगल : गुरुघासीदास टाइगर रिजर्व पर संकट


-राजन पाण्डेय-
कोरिया,24 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान,‘गुरुघासीदास नेशनल पार्क’ पिछले कुछ सालों से कुप्रबंधन और प्राकृतिक मार की दोहरी मार झेल रहा है, एक तरफ आसमान से बरसती आग ने जंगलों को खाक कर दिया है, वहीं दूसरी ओर पानी की बूंद-बूंद को तरसते वन्य प्राणी रिहाइशी इलाकों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं, विडंबना यह है कि वन्यजीवों की प्यास बुझाने के नाम पर बनाए गए ‘स्टाफ डैम’ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर महज शो-पीस बनकर रह गए हैं।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े जल संरक्षण के प्रयास
पार्क के सोनहत, रामगढ़, जनकपुर और रेहण्ड क्षेत्रों में स्थिति भयावह है, विभाग द्वारा लाखों की लागत से बनाए गए स्टाफ डैमों में पानी का नामोनिशान नहीं है। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है किः
गुणवत्ता विहीन निर्माण
घटिया सामग्री के प्रयोग के कारण डैमों में पानी नहीं ठहर रहा है।
गलत स्थल चयन
बिना किसी तकनीकी सर्वे के अनुपयुक्त स्थानों पर डैम बना दिए गए, जो अब ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहे हैं।
सरकारी धन का दुरुपयोग
नए बन रहे बांधों की गुणवत्ता भी संदेह के घेरे में है, जिससे भविष्य में भी जल संकट गहराने की पूरी आशंका है।
आग की लपटों में वन्य संपदा,बेबस प्रबंधन
रेगुलर फारेस्ट के अलावा पार्क के विभिन्न परिक्षेत्रों जैसे धनपुर, कुर्थी, कछाड़ी मझगवां और देवगढ़ वन परिक्षेत्र के जंगलों में लगी आग ने जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचाया है, सूत्रों के अनुसार, विभाग का पूरा ध्यान केवल निर्माण कार्यों और बंदरबांट में लगा है, जिसके कारण ‘फायर वाचिंग’ की व्यवस्था केवल कागजों तक सिमट गई है, आग से न केवल बेशकीमती वन संपदा जलकर राख हो रही है, बल्कि छोटे वन्यजीवों और उनके आवासों का भी नामोनिशान मिट रहा है।
टाइगर प्रोजेक्ट की सफलता पर उठते सवाल
आगामी ‘गुरुघासीदास तमोर पिंगला टाइगर प्रोजेक्ट’ को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल की हकीकत इसके उलट है। यदि उद्यान में पानी और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी, तो बाघों का संरक्षण कैसे संभव होगा? लगातार बढ़ती आग की घटनाएं और सूखते प्राकृतिक स्रोत इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
सूखे कंठ और खाली स्टापडेम,तालाबः करोड़ों का बजट,बूंद भर पानी नहीं…
विडंबना देखिए कि पिछले सत्र में जल संरक्षण के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये बहा दिए गए, लेकिन आज उन स्टाफ डैमों में चुल्लू भर पानी भी मयस्सर नहीं है, कागजों पर जलक्रांति का दावा करने वाले ये निर्माण धरातल पर धूल फांक रहे हैं, गुणवत्ता से इस कदर समझौता किया गया है कि पहली ही बारिश के बाद इन बांधों की दरारें चीख-चीख कर भ्रष्टाचार की कहानी बयां करने लगीं। न तो पानी रोकने की कोई तकनीकी दूरदर्शिता दिखाई गई और न ही निर्माण में ईमानदारी बरती गई, आलम यह है कि वन्यजीव प्यास बुझाने के लिए इन कंक्रीट के ढांचों के पास जाते तो हैं, लेकिन वहां पानी के बजाय सिर्फ सूखी मिट्टी और तपते पत्थर ही मिलते हैं, करोड़ों की लागत से बने ये डैम आज वन्यजीवों के लिए नहीं, बल्कि केवल ठेकेदारों और अधिकारियों के लिए ‘कामधेनु’ साबित हुए हैं, जबकि बेजुबान जानवर आज भी अपनी प्यास के लिए आसमां की ओर ताकने को मजबूर हैं।
अग्निपरीक्षा : नव पदस्थ रेंजरों के कंधों पर ‘गुरुघासीदास’ व रेगुलर का भविष्य,क्या बदलेंगे ढर्रा या सिस्टम में हो जाएंगे गुम?
गुरुघासीदास नेशनल पार्क में जारी इस संकट के बीच, हाल ही में पदभार संभालने वाले नए रेंजरों के लिए यह सीजन किसी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं है। एक ओर धधकते जंगल की लपटों को शांत करने की चुनौती है, तो दूसरी ओर सूखे की मार झेल रहे वन्यजीवों के अस्तित्व को बचाना। प्रशासनिक हलकों में अब यह सवाल बड़े जोर-शोर से तैर रहा है कि क्या ये युवा और ऊर्जावान अधिकारी अपनी कार्यकुशलता से पार्क की तस्वीर बदल पाएंगे?
चुनौतियां और उम्मीदें…
नवनियुक्त रेंजरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस ‘पुराने ढर्रे’ और ‘भ्रष्टाचार के तंत्र’ को तोड़ने की है, जिसकी वजह से करोड़ों के बजट के बाद भी स्टाफ डैम प्यासे पड़े हैं। फील्ड पर ‘फायर वाचिंग’ को कागजों से निकालकर धरातल पर उतारना और विभागीय बंदरबांट पर लगाम कसना उनके लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
सवालों के घेरे में भविष्य…
ग्रामीणों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ये नए अधिकारी फील्ड पर उतरकर इन सूखे तालाबो और जलती वन संपदा का वास्तविक मुआयना करेंगे, या फिर पूर्ववर्तियों की तरह केवल दफ्तरों में बैठकर ‘सब चंगा’ की रिपोर्ट तैयार करेंगे, यह सीजन उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित होगा। यदि वे इन विपरीत परिस्थितियों में वन्यजीवों को राहत पहुँचाने और जंगलों को बचाने में सफल होते हैं, तो यह पार्क के लिए नया जीवनदान होगा। अन्यथा, आशंका यही है कि व्यवस्था की इस सड़ांध में वे भी पुराने ढर्रे का हिस्सा बनकर न रह जाएं।


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