-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सोनहत,19 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। जिले में बीते तीन वर्षों के विकास कार्यों को अगर खेल की भाषा में समझें तो कुछ लोग इसे सुशासन प्रीमियर लीग बता रहे हैं, तो कुछ इसे एकतरफा बैटिंग का रिकॉर्ड मैच,आरोप है कि एक प्रभावशाली कांग्रेसी दामाद ने योजनाओं की पिच पर ऐसी बल्लेबाजी की कि बाकी खिलाड़ी सिर्फ फील्डिंग करते रह गए, सरकारी योजनाओं की सूची लंबी है-स्वच्छ भारत मिशन, RIPA योजना, डीएमएफ मद, 15 वां वित्त, मनरेगा, शिक्षा उन्नयन, स्वास्थ्य उपकरण सप्लाई…और हर जगह वही नाम चर्चा में। समर्थक कहते हैं-काम हुआ है, विरोधी पूछते हैं-काम किसके लिए हुआ है?
स्वच्छ भारत मिशन: रिक्शा चला, सवाल भी चला- सबसे पहले सफाई के नाम पर ग्राम पंचायतों में रिक्शों की खरीदी, कागजों में गांव-गांव स्वच्छता की क्रांति, फिर स्वच्छता किट की आपूर्ति—बाल्टी, झाड़ू, डस्टबिन, दस्ताने, ग्रामीणों की जुबान पर सवाल “किट आई कितनी, चली कितनी, और दिखी कितनी?” चरवा पारा पंचायत को एजेंसी बनाकर करोड़ों का काम—आरोप है कि मैदान में खिलाड़ी वही, स्कोर बोर्ड भी वही।
RIPA योजना: उपकरणों का ‘औद्योगिक’ उत्सव- ग्रामीण औद्योगिक पार्क (RIPA) योजना का उद्देश्य स्थानीय रोजगार सृजन था, लेकिन विपक्षी तंज कसते हैं, रोजगार बना या उपकरण सप्लाई का रोजगार? उपकरण खरीदी के आंकड़े करोड़ों में बताए जा रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या स्थानीय समूहों को वास्तव में लाभ मिला या कागजों में उद्योग खड़े हो गए?
डीएमएफ मद: शिक्षा, स्वास्थ्य और रोशनी का ‘स्पेशल पैकेज’- जिला खनिज न्यास (DMF) मद से सेजेस विद्यालयों में उन्नत शिक्षा संसाधन, स्पेस लैब निर्माण, जिला अस्पताल में करोड़ों की सप्लाई, मुख्यालय से लगी पंचायतों में विद्युतीकरण, स्पेस लैब की चर्चा तो खूब हुई, कुछ लोग कहते हैं, “बच्चे अब चांद-तारों को समझेंगे, तो कुछ मुस्कुराते हैं, “पहले जमीन पर बिजली तो स्थिर कर लो!
15वां वित्त और बिजली खंभों की परेड– ग्राम पंचायतों में बिजली खंभे और तार लगे, कुछ गांवों में खंभे ऐसे खड़े हैं जैसे लोकतंत्र की मूर्तियां—स्थिर, मौन और प्रतीक्षारत, ग्रामीण पूछते हैं— “खंभा आया, तार आयाज् पर करंट कब आएगा?”
सोनहत जनपद: फाइलों की फुर्ती और एजेंसियों की उड़ान- सबसे चर्चित आरोप सोनहत जनपद मुख्यालय से जुड़ा, लाखों की स्वीकृति, कथित फर्जी आहरण, एजेंसी गायब, खबर लगी तो नया ठेकेदार, फिर ‘एडजस्टमेंट’ की नई कहानी, यह सब यदि सत्य है तो यह प्रशासनिक कौशल का नया मॉडल है, काम इधर, भुगतान उधर, ठेकेदार किधर?
निजी तालाब और सार्वजनिक पैसा?- आरोप है कि मुख्यालय स्थित निजी तालाब में लाखों की लागत से रिटर्निंग वाल घाट का निर्माण हुआ, मनरेगा जैसी योजनाओं से कथित रूप से पारिवारिक शुभचिंतकों को काम मिला, विपक्ष तंज कसता है, तालाब निजी, पैसा सार्वजनिक—इसे कहते हैं समावेशी विकास!
होटल सप्लाई और ‘औने-पौने’ बिल- प्रत्येक शासकीय आयोजन में होटल से सप्लाई का आरोप, बिल ऐसे कि सुनने वाला बोले—मेन्यू में लोकतंत्र भी शामिल था क्या?
सचिव पदस्थापना का खेल- कुछ पंचायत प्रतिनिधि दावा करते हैं कि सचिवों की पदस्थापना भी प्रभाव के दायरे में रही, हालांकि इस पर कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं है, लेकिन चर्चा गर्म है।
समर्थकों का तर्क- समर्थक कहते हैं—काम हुआ है, पैसा खर्च हुआ है, विकास दिख रहा है, उनका कहना है कि बड़े प्रोजेक्ट में विरोध तो होगा ही।
विरोधियों की मांग- सभी योजनाओं का स्वतंत्र ऑडिट,डीएमएफ और 15वें वित्त मद का भौतिक सत्यापन, निविदा प्रक्रिया की जांच, जिम्मेदारी तय हो उनका कहना है, अगर सब पारदर्शी है तो जांच से डर कैसा?
मीडिया पर भी सवाल- कुछ लोग व्यंग्य में कहते हैं—“करोड़ों के खेल पर दो कौड़ी की चुप्पी क्यों? पत्रकारों पर भी आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं—देखना कौन क्या देख रहा है, और कौन क्या नहीं देख पा रहा।
विकास का मॉडल या सवालों का महाभारत?- तीन वर्षों की यह कहानी दो ध्रुवों में बंटी है एक तरफ समर्थकों का दावा है की ये ऐतिहासिक काम, दूसरी तरफ आलोचकों का आरोप है की ये ऐतिहासिक खेल, सच्चाई क्या है, यह दस्तावेज़, जांच और पारदर्शिता ही तय करेगी, जनता का सवाल सीधा है क्या यह विकास का स्वर्णिम अध्याय है या योजनाओं की पिच पर खेला गया ‘मैच फिक्स’?
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