Breaking News

सूरजपुर@ खजाना जाए भाड़ में पर घोटालेबाज सुरक्षित रहें! सूरजपुर के धान खरीदी केंद्रों में ‘जीरो’ का खेल या जीरो करने की तैयारी?

Share

  • धान घोटाले पर जीरो का खेल — कार्रवाई गायब, सवाल हजार!
  • कलेक्टर का दौरा या फाइलों का दौरा? घोटाला वहीं का वहीं!
  • खजाना खाली हो जाए चलेगा, पर घोटालेबाज सुरक्षित रहें — सूरजपुर मॉडल?
  • धान कम, एंट्री ज्यादा — सिस्टम का नया गणित!
  • उठाओ के नाम पर सेटिंग! क्या जीरो में दब जाएगा करोड़ों का खेल?
  • जांच चल रही हैज् पर कार्रवाई छुट्टी पर! कैमरे देख रहे, सिस्टम सो रहा?”
  • धान खरीदी या राजनीतिक मैनेजमेंट सेंटर? फाइलों में सख्ती, जमीन पर नरमी!
  • घोटाला दिख रहा साफ, फिर भी आदेश — सब जीरो करो!
  • राइस मिलर बने संकटमोचक या संकट के सूत्रधार?
  • किसान का नाम, माफिया का धान — किसका खेल?
  • सवालों से घिरी खरीदी व्यवस्था, जवाब देने को कोई तैयार नहीं!

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,06 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
जिले के धान खरीदी केंद्र इन दिनों किसी कृषि व्यवस्था से ज्यादा गणित की प्रयोगशाला बन चुके हैं, जहां करोड़ों के कथित घोटाले की चर्चा तो जोरदार है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार ऐसी कि जैसे किसी ने ब्रेक पर पत्थर रख दिया हो, कलेक्टर का हालिया दौरा लोगों को उम्मीद दे गया था कि अब कुछ बड़ा होगा, पर नतीजा निकला- सब कुछ जीरो कर दो! अब सवाल यह है कि यह जीरो हिसाब बराबर करने के लिए है या हिसाब दबाने के लिए?
दौरा हुआ, कैमरे चमके और फिर फाइलों में सन्नाटा- कलेक्टर के दौरे को लेकर पहले से ही माहौल गर्म था, लोगों को लगा कि इस बार धान खरीदी केंद्रों में चल रहे कथित खेल पर सख्त कार्रवाई होगी, मगर दौरे के बाद जो चर्चा निकली, वह किसी व्यंग्य से कम नहीं — “धान उठाओ और खरीदी का हिसाब मिलाकर जीरो करो।” अब आम लोग पूछ रहे हैं कि जब भौतिक सत्यापन में कमियां सामने आ चुकी हैं, तो फिर अचानक यह ‘जीरो’ का गणित किस किताब से निकला?
धान कम, एंट्री ज्यादा — सिस्टम का नया फार्मूला?- स्थानीय सूत्रों और कर्मचारियों की मानें तो कई केंद्रों में जितनी खरीदी दर्ज है, उतना धान जमीन पर नजर ही नहीं आता, किसानों के खातों में पैसा जरूर पहुंचा, मगर आरोप यह भी है कि उसी पैसे का चक्कर लगाकर कुछ लोगों ने फायदा उठाया, कहा जा रहा है कि खाली रकबे और अंतर राशि के लालच में कागजों पर धान बढ़ता गया और गोदामों में सन्नाटा बना रहा, अगर यह सच है, तो फिर सवाल उठना लाजिमी है — क्या सरकारी खजाना सिर्फ एंट्री देखकर ही खुल जाता है?


SOP का हाल: आदेश जारी, पालन गायब- धान खरीदी के अंतिम चरण में शासन ने स्पष्ट स्ह्रक्क जारी किया था — 23 जनवरी तक भौतिक सत्यापन, पंचनामा, फोटोग्राफी और क्रॉस वेरिफिकेशन अनिवार्य था, 27 जनवरी से नई स्टैकिंग अलग रखनी थी और परिवहन भी सत्यापित स्टॉक से ही होना था, लेकिन आरोप है कि शिवप्रसादनगर में स्ह्रक्क सिर्फ पोस्टर तक सीमित रहा, अलग स्टैकिंग नहीं हुई, पुराने और नए स्टॉक का मिश्रण बना रहा और परिवहन भी बिना पारदर्शी सत्यापन के चलता रहा, व्यंग्य यह है कि नियम इतने साफ थे कि समझाने की जरूरत नहीं थी, फिर भी पालन नहीं हुआ, यानी या तो आदेश को हल्के में लिया गया या फिर किसी ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं।


एआई कैमरा: तकनीक जागी, जिम्मेदारी सोई?– सरकार ने धान खरीदी में पारदर्शिता के लिए एआई कैमरे लगाए थे ताकि हर गतिविधि पर नजर रहे, 4 जनवरी 2026 की एआई रिपोर्ट में दर्ज है कि शिवप्रसादनगर से 350 मि्ंटल धान लेकर एक गाड़ी महामाया राइस प्रोडक्ट्स गई, लेकिन फोटो एनालिसिस में संदेह जताया गया कि गाड़ी में लगभग 875 बोरी धान होना चाहिए था, जो नजर नहीं आया, सिस्टम ने साफ लिखा — “Quantity Difference”, और उपार्जन केंद्र व मिल का भौतिक सत्यापन करने की सिफारिश भी की, यहां से कहानी और दिलचस्प हो जाती है, रिपोर्ट में मामला बाद में “Resolved” दिखाया गया, अब सवाल है — क्या जांच सच में हुई या सिर्फ स्क्रीन पर हरे रंग का टिक लगाकर फाइल बंद कर दी गई? अगर PV  हुआ तो उसका सार्वजनिक रिकॉर्ड कहां है?


सूरजपुर से विशेष व्यंग्यात्मक रिपोर्ट- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र इन दिनों प्रशासनिक पारदर्शिता का नहीं बल्कि “व्यवस्थित अव्यवस्था” का मॉडल बन चुका है, यहां नियम-कायदे ऐसे गायब हैं जैसे बैठक में चाय खत्म होते ही नेता गायब हो जाते हैं, आरोप है कि घोटाला मगरमच्छ के आकार का है, लेकिन जांच कछुए की चाल से भी धीमी चल रही है — शायद इसलिए ताकि सच मंजç¸ल तक पहुंचते-पहुंचते थक जाए।
माफिया राज का ‘लोकल मैनेजमेंट मॉडल’- स्थानीय चर्चाओं में कहा जा रहा है कि इस केंद्र में कौन प्रभारी बनेगा, यह फाइल नहीं बल्कि ‘नेटवर्क’ तय करता है, रात के अंधेरे में बारदाना बाहर निकलने की बातें हो रही हैं और कैमरे भी कथित तौर पर उतने ही सक्रिय हैं जितनी चुनाव के बाद जनता की समस्याएं।


कैमरे देख रहे, सिस्टम सो रहा?- धान खरीदी केंद्रों में लगाए गए एआई कैमरे और सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य पारदर्शिता और गड़बड़ियों पर रोक लगाना था, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब हर गतिविधि कैमरों में रिकॉर्ड हो रही है, तो फिर कथित अनियमितताएं कैसे जारी हैं, स्थानीय लोगों का कहना है कि एआई कैमरे ट्रकों की आवाजाही, बोरियों की गिनती और स्टॉक की स्थिति तक दर्ज कर रहे हैं, बावजूद इसके जमीन पर स्थिति बदलती नजर नहीं आती, आलोचकों का तंज है कि कैमरे तो सब देख रहे हैं, मगर सिस्टम जैसे आंखें मूंदे बैठा है — रिपोर्ट बनती है, फुटेज मौजूद है, फिर भी कार्रवाई का पहिया धीमा क्यों है? प्रशासन का पक्ष है कि सभी डेटा की जांच प्रक्रिया जारी है और तथ्यों के आधार पर ही निर्णय लिया जाएगा, लेकिन जनता के मन में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि आखिर एआई निगरानी का फायदा कब दिखेगा।
एआई कैमरों की आंखों में भी धूल?– इलाके में अब यह व्यंग्यात्मक चर्चा तेज हो गई है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि घोटालेबाज सिर्फ सिस्टम ही नहीं, बल्कि एआई कैमरा और सीसीटीवी जैसी आधुनिक निगरानी व्यवस्था को भी मात देने की तैयारी में हैं, लोगों का कहना है कि कैमरे हर गतिविधि रिकॉर्ड कर रहे हैं, फिर भी अगर गड़बड़ियां सामने नहीं आ रहीं या कार्रवाई धीमी दिख रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है, कुछ आलोचक तंज कसते हैं कि सिस्टम पर बैठे जिम्मेदार लोग कहीं मूक दर्शक बनकर पूरे खेल को देखते तो नहीं रह जाएंगे और बाद में जांच के नाम पर सब कुछ सामान्य बताकर क्लीन चिट दे दी जाएगी, हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सभी फुटेज और डेटा की जांच प्रक्रिया जारी है और अंतिम निर्णय तथ्यों के आधार पर ही लिया जाएगा, लेकिन जनता के बीच यह शंका लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।
राइस मिलर — उद्योगपति या ‘मैनेजमेंट गुरु’?- चर्चा का दूसरा बड़ा किरदार हैं राइस मिलर, कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि धान उठाव के असली मास्टरमाइंड वही हैं, जो ऊपर तक दौड़ लगाकर पूरे मामले को ठंडा करने में जुटे हैं,
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इलाके में यह चर्चा खूब चल रही है कि मिलरों के बिना यह गणित संभव ही नहीं, सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उद्योग और राजनीति का यह गठजोड़ अब प्रशासन पर भी भारी पड़ रहा है?
घोटालेबाजों का आत्मविश्वास — जैसे पहले ही मिल गई क्लीन चिट!- धान खरीदी केंद्रों में काम करने वाले कई लोगों का कहना है कि जिन पर आरोप हैं, उनके चेहरे पर जरा भी डर नहीं दिख रहा, उल्टा वे बड़े आत्मविश्वास से कह रहे हैं कि “सब सेट है, आखिर में हिसाब बराबर हो जाएगा।” व्यंग्य यह कि यहां घोटाले से ज्यादा भरोसा ‘मैनेजमेंट’ पर दिखाई दे रहा है — जैसे सिस्टम खुद ही खुद को माफ करने की तैयारी में हो।
शिवप्रसादनगर से टुकुडांड तक — नाम वही, कहानी एक- शिवप्रसादनगर, बनजा, सूरजपुर, सावराव और टुकुडांड समेत कई केंद्रों में अनियमितताओं की चर्चा है, भौतिक सत्यापन में कमियां मिलने की बात कही जा रही है, लेकिन कार्रवाई फिलहाल “उठाव के बाद” वाली लाइन में अटकी हुई है, लोग तंज कस रहे हैं कि शायद उठाव का इंतजार इसलिए है ताकि जो बचा-खुचा सच है, वह भी ट्रकों के साथ रवाना हो जाए।
कलेक्टर दबाव में या सिस्टम का हिस्सा?- क्षेत्र में यह भी चर्चा है कि प्रशासन पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ चुका है, कुछ लोग कह रहे हैं कि अब बड़ी कार्रवाई की उम्मीद कम ही है, क्योंकि मामला ऊपर तक पहुंच चुका है, हालांकि प्रशासन की ओर से बार-बार यही कहा जा रहा है कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
अंतिम सवाल — जीरो होगा घोटाला या भरोसा?- अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह ‘जीरो’ किसका होगा — घोटाले का या जनता के भरोसे का? अगर सब कुछ ठीक था तो दौरे की जरूरत क्यों पड़ी, और अगर गड़बड़ी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं दिख रही? धान खरीदी का यह पूरा मामला अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यंग्य का विषय बन चुका है, जहां किसान, कर्मचारी और आम लोग बस यह देख रहे हैं कि आखिर इस खेल का असली विजेता कौन होगा — सिस्टम या सच?


Share

Check Also

राजपुर@ उत्कृष्ट पार्षद के लिए नवीन सर्व सोनार समाज ने किया पार्षद विशवास का सम्मान

Share राजपुर,24 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। नवीन सर्व सोनार समाज राजपुर द्वारा निर्दलीय निर्वाचित वार्ड पार्षद …

Leave a Reply