5 महीने से मानदेय अटका,आर्थिक संकट में घिरीं मितानिनें
-राजन पाण्डेय-
सोनहत,04 फरवरी 2026(घटती-घटना)। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुँचाने वाली मितानिनें,एम.टी.,ब्लॉक समन्वयक,स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक और हेल्प डेस्क में तैनात महिला स्वास्थ्य कर्मी इन दिनों खुद आर्थिक इलाज की मोहताज हो गई हैं। पिछले चार से पाँच महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण इन कर्मियों की आर्थिक स्थिति डगमगा गई है। कई परिवारों के सामने राशन जुटाने और बच्चों की स्कूल फीस भरने तक का संकट खड़ा हो गया है।
मेहनत का मोल नहीं…वादों और दावों के बीच अटका भुगतान
मितानिनों का कहना है कि शासन-प्रशासन की अधिकांश स्वास्थ्य योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है,लेकिन जब पारिश्रमिक की बात आती है तो केवल आश्वासन ही मिलता है। बार-बार ज्ञापन और शिकायतों के बावजूद विभागीय स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, सूत्रों के अनुसार,ब्लॉक समन्वयक,स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक और हेल्प डेस्क से जुड़े पदाधिकारियों का अक्टूबर माह से मानदेय लंबित है। वहीं कई मितानिनों का आरोप है कि प्रोत्साहन राशि भी दावा पत्रक के अनुसार पूरी नहीं दी गई और राज्य व केंद्रांश की राशि को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी से बढ़ी नाराजगी…
मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कथित बेरुखी ने स्वास्थ्य कर्मियों की नाराजगी और बढ़ा दी है। चुनावी मंचों पर बड़े-बड़े वादे करने वाले नेताओं पर मितानिनों ने सवाल उठाते हुए कहा कि अब जब वे आर्थिक संकट में हैं,तब उनकी समस्याओं को सुनने वाला कोई नजर नहीं आ रहा,एक मितानिन समन्वयक ने कहा, हम दिन-रात लोगों के स्वास्थ्य के लिए काम करते हैं,लेकिन आज हमारे अपने बच्चों का भविष्य संकट में है। पांच महीने का इंतजार कम नहीं होता, अब सब्र जवाब देने लगा है।
समाधान की उम्मीद में सीएमएचओ को सौंपा ज्ञापन
टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाते हुए मितानिन संगठन ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी,जिला कोरिया को विस्तृत मांग पत्र सौंपा है। ज्ञापन में भुगतान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने, लंबित मानदेय शीघ्र जारी करने और बजट स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है,समन्वयकों का कहना है कि आर्थिक रूप से सुरक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही बेहतर सेवा दे सकता है और समय पर मानदेय मिलना ‘स्वस्थ पंचायत’ लक्ष्य की बुनियादी शर्त है,उन्होंने अधिकारियों से अपील की है कि इस देरी को सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया न समझा जाए,बल्कि सैकड़ों परिवारों से जुड़े संकट के रूप में देखा जाए।
समस्याएं जो बन चुकी हैं गंभीर चुनौती
कर्ज का बढ़ता बोझ
मानदेय न मिलने से कई कर्मियों को ऊंचे ब्याज पर उधार लेना पड़ा।
शिक्षा पर असर
स्कूल फीस न भर पाने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
मनोबल में गिरावट
लगातार उपेक्षा से स्वास्थ्य कर्मियों का उत्साह और भरोसा कमजोर पड़ रहा है।
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