- धान खरीदी घोटाला : जांच में कमी पकड़ी गई,फिर भी उन्हीं हाथों में सौंप दी गई पूरी कमान
- धान खरीदी में करोड़ों का खेल : कमी मिली,कार्रवाई नहीं,घोटाला जारी
- सूरजपुर,शिवप्रसादनगर में धान खरीदी घोटाला: जांच के बाद भी जिम्मेदार सुरक्षित
- धान खरीदी की जांच बनी दिखावा,उठाव तक ‘कमी मैनेज’ करने की खुली छूट
- धान खरीदी में बड़ा खेल : प्रशासन की चुप्पी से घोटालेबाज बेखौफ
- धान खरीदी घोटाला क्यों नहीं रुकता? क्योंकि खत्म करने की नीयत ही नहीं
- कमी मिलने के बाद भी नहीं सील हुए केंद्र, उठाव उन्हीं के भरोसे जो संदेह के घेरे में
- रकबा, टोकन और डीओ के खेल से कागजों में शून्य की जा रही धान की कमी
- जांच के बाद भी न निलंबन, न एफआईआर प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,16 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी घोटाला इसलिए खत्म नहीं हो पा रहा है,क्योंकि इसे खत्म करने की नीयत ही शासन और प्रशासन में कहीं नजर नहीं आती,हर साल करोड़ों रुपये की क्षति के बावजूद न तो व्यवस्था बदली जाती है और न ही दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होती है,जिससे भविष्य में गड़बड़ी रुक सके,सूरजपुर जिले के कई धान खरीदी केंद्रों में निरीक्षण के दौरान धान की भारी कमी सामने आने के बाद भी वही समिति प्रबंधक और केंद्र प्रभारी दोबारा धान खरीदी व धान उठाव की जिम्मेदारी संभालते नजर आ रहे हैं,यही स्थिति पूरे मामले को और अधिक संदेहास्पद बना रही है। बता दे की धान खरीदी घोटाला कोई एक-दो लोगों की करतूत नहीं,बल्कि वर्षों से चल रहा एक संगठित तंत्र है,जब तक जांच के बाद कठोर कार्रवाई, जिम्मेदारों को हटाने और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की ठोस रणनीति नहीं अपनाई जाएगी,तब तक हर साल सरकार को करोड़ों का नुकसान होता रहेगा,अब सवाल यह नहीं है कि घोटाला हो रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या शासन और प्रशासन वास्तव में इसे रोकना चाहते भी हैं, या फिर सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठे रहना ही उनकी नीति बन चुकी है,जबकि पूर्व में प्रकाशित खबरों ने जहां धान महाघोटाले के आंकड़े और तरीके उजागर किए थे,वहीं अब सामने आ रही स्थिति यह बताती है कि घोटाले के बाद की कार्रवाई भी उतनी ही संदिग्ध है, सवाल अब सिर्फ धान की कमी का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक इच्छा-शक्ति का है, जो इस 6.56 करोड़ के घोटाले को अंजाम तक पहुंचाने के बजाय कहीं न कहीं उसे ‘मैनेज’ करने में लगी दिखाई दे रही है।
जांच में पकड़ी गई कमी,फिर भी वही जिम्मेदारी
धान खरीदी केंद्रों में जब प्रशासनिक जांच हुई, तो कई जगहों पर स्टॉक के मुकाबले धान की भारी कमी पाई गई, नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में संबंधित केंद्रों को सील कर, जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों को हटाकर, आगे की प्रक्रिया प्रशासनिक निगरानी में कराई जानी चाहिए थी, लेकिन वास्तविकता इसके उलट रही, जांच के बाद भी न तो समिति प्रबंधकों को हटाया गया और न ही खरीदी या उठाव का जिम्मा किसी स्वतंत्र एजेंसी या प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा गया,बल्कि जिन पर कमी का संदेह है,उन्हीं के हाथों में पूरी व्यवस्था सौंप दी गई।
‘सेटिंग’ के तहत जिम्मा सौंपे जाने का संदेह
सूत्रों के मुताबिक यह जिम्मेदारी यूं ही नहीं दी गई,माना जा रहा है कि यह सब एक तयशुदा सेटिंग के तहत किया गया,ताकि जांच में पाई गई कमी को धान उठाव तक ‘पूरा’ किया जा सके,यह कोई नया खेल नहीं है, बल्कि वर्षों से अपनाया जा रहा तरीका है,जिन लोगों के पास वर्षों का अनुभव है,वे जानते हैं कि किस चरण पर, किस तरीके से कागजों में कमी को शून्य दिखाया जा सकता है।
निरीक्षण हटते ही फिर पुराना खेल
सूत्र बताते हैं कि निरीक्षण दल के हटते ही कई केंद्रों में फिर वही स्थिति बन गई—बिना किसान आए,बिना धान आए, टोकन कटने लगे,धान चढ़ने लगा और भुगतान भी होने लगा, इससे साफ है कि यदि स्थायी प्रशासनिक निगरानी नहीं बैठाई गई, तो गड़बड़ी रुकने वाली नहीं है।
पूर्व में प्रकाशित खबर के खुलासों के बाद निरंतरता में नया सवाल
यह उल्लेखनीय है कि इससे पहले घटती-घटना द्वारा प्रकाशित खबरों में सूरजपुर जिले के चार धान उपार्जन केंद्रों सावारांवा,टुकुडांड शिवप्रसादनगर व सूरजपुर में 52,908 बोरियों (लगभग 21,162 क्विंटल) धान की कमी और 6.56 करोड़ से अधिक के सरकारी नुकसान का खुलासा किया जा चुका है, उन खबरों में यह भी स्पष्ट किया गया था कि किसानों के नाम पर भुगतान हो चुका है, लेकिन धान भौतिक रूप से केंद्रों में मौजूद नहीं मिला, अब सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि इतनी बड़ी कमी और जांच में गड़बड़ी पकड़े जाने के बावजूद, जिन समिति प्रबंधकों और धान खरीदी प्रभारियों की मौजूदगी में यह घोटाला हुआ, उन्हीं को आगे की धान खरीदी और धान उठाव की जिम्मेदारी सौंप दी गई है, इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि जांच के बाद कार्रवाई करने के बजाय, कमी को धान उठाव के दौरान ‘मैनेज’ करने का समय दिया गया है।
कैसे चलता है धान खरीदी का खेल
धान खरीदी के दौरान सरकार किसानों से जितना धान खरीदती है, वह अधिकतर किसानों के कुल उत्पादन से मेल खाता दिखाया जाता है,लेकिन कई किसानों के रकबे का पूरा उपयोग नहीं किया जाता,इसी ‘बचे हुए रकबे’ पर घोटालेबाजों की नजर रहती है,पहले से यह तय कर लिया जाता है कि किस किसान के नाम पर, बिना धान आए ही, कितना धान कागजों में चढ़ाया जा सकता है, न किसान समिति पहुंचता है, न धान आता है, लेकिन टोकन कट जाता है, एंट्री हो जाती है और भुगतान तक हो जाता है।
जांच में खुलती है पोल
जब बीच सत्र में अचानक जांच होती है,तब समितियों में धान की भारी कमी सामने आती है, यही वह क्षण होता है, जब पूरे सिस्टम की असलियत उजागर होती है, लेकिन इसके बाद भी सख्त कदम उठाने के बजाय जिम्मेदारी फिर उन्हीं लोगों को सौंप दी जाती है,जो इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड बताए जाते हैं।
धान उठाव में होता है ‘असली खेल’
सूत्रों का दावा है कि धान उठाव के दौरान कमी को पूरा करने का खेल खेला जाता है, उदाहरण के तौर पर, यदि कागजों में 400 बोरियों का डीओ कटा है, तो ट्रक में वास्तव में 200 बोरी ही लोड की जाती हैं,लेकिन दस्तावेजों में पूरी 400 बोरी दिखाई जाती हैं,इस तरह ट्रक-दर-ट्रक, धीरे-धीरे पूरी कमी को कागजों में शून्य कर दिया जाता है, राइस मिलर भी इस व्यवस्था का हिस्सा होते हैं, क्योंकि जितना डीओ उनके नाम जारी होता है,उतना चावल बाद में उनके पास उपलब्ध दिखा दिया जाता है।
जांच के बाद भी कार्रवाई शून्य, संदेह और गहरा-
पूर्व में प्रकाशित खबरों में यह सवाल उठाया गया था कि जब सरकारी रिकॉर्ड में भुगतान हो चुका है और धान गायब है, तो जिम्मेदार कौन है? लेकिन अब तक न तो किसी समिति प्रबंधक को हटाया गया, न एफआईआर दर्ज हुई और न ही धान को सील कर प्रशासनिक निगरानी में उठाव की व्यवस्था की गई, बल्कि इसके उलट,जांच के बाद भी वही पुराना सिस्टम जारी रखा गया है,जिससे यह संदेह और मजबूत होता है कि धान खरीदी घोटाले को उजागर करने के बजाय उसे दबाने और कागजों में शून्य दिखाने की तैयारी की जा रही है।
कार्रवाई के बजाय चुप्पी
धान में भारी कमी पकड़े जाने के बाद भी न एफआईआर,न निलंबन और न ही ठोस विभागीय कार्रवाई सामने आई,जिम्मेदारों को हटाना तो दूर,उन्हें दोबारा वही जिम्मा सौंप दिया गया,इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं न कहीं प्रशासन के भीतर भी इस घोटाले को लेकर मौन सहमति या सहभागिता है।
जांच के बाद भी ‘खुश’ क्यों हैं प्रबंधक?
जांच के बाद जहां समिति प्रबंधकों और केंद्र प्रभारियों को चिंतित होना चाहिए था,वहां वे निश्चिंत और खुश नजर आ रहे हैं,वजह साफ है उन्हें भरोसा है कि पर्याप्त समय मिल चुका है और धान उठाव तक कमी को किसी न किसी तरीके से पूरा कर लिया जाएगा,प्रशासन ने उन्हें हटाकर उदाहरण पेश करने के बजाय, उन्हें आगे का पूरा मौका दे दिया है।
प्रशासन के पास था पुख्ता तरीका,अपनाया नहीं
यदि प्रशासन वास्तव में घोटाला उजागर करना चाहता,तो उसके पास स्पष्ट और प्रभावी तरीका मौजूद था जिन केंद्रों में कमी मिली,वहां का धान तत्काल सील किया जाता,धान उठाव केवल प्रशासनिक निगरानी में,गिनती और वीडियोग्राफी के साथ कराया जाता,आवक-जावक स्थल पर अधिकारियों को बैठाकर यह सुनिश्चित किया जाता कि वास्तव में किसान और धान ही केंद्र में पहुंच रहे हैं,लेकिन इनमें से कोई भी कदम नहीं उठाया गया।
पूर्व खुलासों के बाद भी वही खेल जारी
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में पटवारी की मौजूदगी में खरीदी घटने और निगरानी हटते ही आंकड़ों में अचानक उछाल आने का जो तथ्य पहले सामने आया था, वही पैटर्न अब भी दोहराया जा रहा है, इससे यह साफ संकेत मिलता है कि फर्जी टोकन, कागजी किसान और कागजी खरीदी का खेल अब भी जारी है, और प्रशासनिक ढील मिलते ही घोटालेबाज फिर सक्रिय हो जाते हैं।
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