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बैकुण्ठपुर@ जनदर्शन में सुनवाई, ज़मीन पर अतिक्रमण जस का तस

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  • पूर्व में प्रकाशित खबर के बाद भी नहीं हटा पुराना बस स्टैंड अतिक्रमण
  • शिकायतें हुईं, आवेदन दिए गएज् कार्रवाई अब भी नदारद
  • जनदर्शन के दावे हवा-हवाई, पुराना बस स्टैंड अतिक्रमण कायम
  • आदेश काग़ज़ों में, ज़मीन पर कब्ज़ा बरकरार
  • पूर्व रिपोर्ट के बाद भी नहीं बदले हालात, सवालों में प्रशासन
  • जनदर्शन : धूप में दिखावा, ज़मीन पर शून्य समाधान
  • बैकुंठपुर पुराने बस स्टैंड का अतिक्रमण प्रशासनिक दावों पर सवाल
  • पूर्व में प्रकाशित खबर के बाद भी नहीं हटा पुराना बस स्टैंड अतिक्रमण, सवालों के घेरे में प्रशासन


-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर,14 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
प्रशासन जनदर्शन को आम जनता की समस्याओं के समाधान का सबसे बड़ा मंच बताता है, धूप में बैठकर जनदर्शन लगाने जैसे आयोजनों को संवेदनशील प्रशासन की मिसाल के तौर पर प्रचारित किया जाता है और बार-बार यह दावा किया जाता है कि लोगों की समस्याएं सुनी जा रही हैं और उनका निराकरण हो रहा है, लेकिन जब इन दावों को ज़मीनी हकीकत के तराजू पर तौला जाता है, तो जवाब हाँ नहीं बल्कि नहीं में दिखाई देता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बैकुंठपुर पुराने बस स्टैंड में बनी नगर पालिका दुकानों से जुड़ा मामला है, जो जनदर्शन की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है।
गौरतलब है कि इस मुद्दे को लेकर 06 जनवरी 2026 को घटती-घटना (कोरिया-सूरजपुर समाचार) में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की गई थी,जिसमें बताया गया था कि किस तरह जनदर्शन में आवेदन,नोटिस और शिकायतों के बाद भी अतिक्रमण नहीं हटाया गया और प्रशासनिक कार्रवाई कागज़ों तक सीमित रह गई,पूर्व प्रकाशित रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि उक्त दुकान का आवंटन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुई नीलामी के बाद अनियमितताओं के आरोपों से घिरा रहा है तथा मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
विवादित दुकान और अतिक्रमण का बढ़ता दायरा- बताया जाता है कि उक्त नगर पालिका दुकान का आवंटन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुई नीलामी के बाद अनियमितताओं के आरोपों से घिरा रहा है। इस आवंटन से जुड़ा मामला आज भी न्यायालय में विचाराधीन है, इसी दुकान ने अब अतिक्रमण का रूप ले लिया है, दुकान संचालक आवंटित सीमा से अधिक क्षेत्र में दुकान संचालित कर रहे हैं, पैदल चलने के लिए निर्धारित दुकान के बाहर का क्षेत्र भी घेर लिया गया है, इसके बाहर भी तंबू लगाकर अवैध विस्तार किया गया है यह अतिक्रमण आसपास के दुकानदारों, राहगीरों और आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है।
पूर्व रिपोर्ट के बाद भी हालात यथावत- पूर्व में प्रकाशित खबर के बाद भी स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं दिख रहा है, स्थानीय लोगों के अनुसार दुकान संचालक आवंटित सीमा से अधिक क्षेत्र में दुकान चला रहे हैं, पैदल चलने के लिए निर्धारित क्षेत्र पर भी सामान रख दिया गया है, उसके बाहर तंबू लगाकर सार्वजनिक स्थान पर कब्जा किया गया है यह अतिक्रमण आसपास के दुकानदारों और राहगीरों के लिए लगातार परेशानी का कारण बना हुआ है, स्थानीय लोगों द्वारा जनदर्शन में शिकायत की गई, नगर पालिका में भी शिकायत दी गई लेकिन किसी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
फल धूप में सूख जाते हैं, बहाना या बचाव?- दुकान संचालक तंबू लगाने का कारण यह बताते हैं कि धूप से फल सूख जाते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि दुकान फल विक्रय के लिए ही आवंटित की गई थी, दुकान के बाहर लगभग 12 फीट की गैलरी क्षेत्र पैदल आवागमन के लिए छोड़ा गया है, उसी क्षेत्र में फल रखकर और उसके बाहर तंबू लगाकर कब्जा क्यों किया गया? इसके बावजूद नगर पालिका द्वारा इस तर्क को स्वीकार कर लेना और कार्रवाई से बचना, प्रशासनिक निष्कि्रयता को दर्शाता है।
संरक्षण का संदेह- स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जनदर्शन में शिकायत की गई, नगर पालिका कार्यालय में भी आवेदन दिया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, पूर्व रिपोर्ट में उठाए गए सवाल आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं कि आखिर शिकायतों के बाद भी अतिक्रमण क्यों नहीं हटाया गया, स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि यह पूरा अतिक्रमण नगर पालिका के मौन संरक्षण में फल-फूल रहा है, कुछ पार्षदों का राजनीतिक संरक्षण भी अतिक्रमणकारियों को प्राप्त है इसी संरक्षण के चलते अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं और शिकायतों का असर शून्य है।
तो फिर जनदर्शन का अर्थ क्या?- यदि जनदर्शन में दी गई शिकायतों पर नगर पालिका में की गई शिकायतों पर और सार्वजनिक असुविधा के बावजूद अतिक्रमण जस का तस बना हुआ है, तो यह कैसे माना जाए कि जनदर्शन में समस्याओं का निराकरण हो रहा है? यदि यह अतिक्रमण हटाया जाता, तो प्रशासन के दावे पर विश्वास किया जा सकता था, लेकिन जब शिकायतों के बाद भी स्थिति नहीं बदलती, तो जनदर्शन समस्या समाधान का मंच नहीं, बल्कि औपचारिकता बनकर रह जाता है।


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