- 52,908 बोरियां गायब, 6.56 करोड़ का चूना-जांच के बाद भी प्रशासन मौन
- सरकारी धान लूटा गया,भुगतान हो गयाः सूरजपुर के 4 खरीदी केंद्रों में 21 हजार क्विंटल धान गायब
- धान खरीदी के नाम पर खुली लूटःसूरजपुर में करोड़ों का घोटाला,दोषियों पर एफआईआर कब?
- निरीक्षण में पकड़ाया धान घोटाला,लेकिन कार्रवाई नदारद,क्या राइस मिलर-समिति गठजोड़ को संरक्षण?
- चार दिन दबाई गई सच्चाईःसूरजपुर धान खरीदी केंद्रों में ऐतिहासिक घोटाला उजागर…
- सरकार का खजाना खाली,धान गायबः सूरजपुर में सबसे बड़ा धान उपार्जन घोटाला सामने…





-ओेंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,14 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले में धान खरीदी व्यवस्था की असलियत अब आंकड़ों के साथ सामने आ चुकी है। राजस्व,खाद्य विभाग एवं मंडी की संयुक्त टीम द्वारा किए गए औचक निरीक्षण ने यह साफ कर दिया है कि धान खरीदी केंद्रों में संगठित लूट और सुनियोजित घोटाला चल रहा है, चार धान उपार्जन केंद्रों में 52,908 बोरियां धान की कमी मिलना कोई साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी खजाने पर सीधा डाका है, यह कोई कागजी गलती नहीं,बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी धन की खुली लूट है, जिसका भुगतान किसानों के नाम पर पहले ही हो चुका है। सवाल सीधा है जब पैसा निकल चुका है, तो धान गया कहां?
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र: नया खुलासा—पटवारी बैठते ही खुल गई पोल, हर दिन चल रहा था फर्जीवाड़ा- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में चल रहे घोटाले को लेकर अब ऐसा खुलासा हुआ है, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जांच के बाद अगले ही दिन प्रशासन ने खरीदी के दौरान ‘आवक स्थल’ पर पटवारी को तैनात कर दिया, और यहीं से सच्चाई सामने आ गई, 2400 मि्ंटल का टोकन कटा, लेकिन खरीदी सिर्फ 2000 मि्ंटल की ही हो पाई, यह अंतर कोई तकनीकी बाधा नहीं, बल्कि इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यहां हर दिन कागजों पर खरीदी और जमीन पर फर्जीवाड़ा चल रहा था।
पटवारी बैठते ही क्यों घट गई खरीदी?- जिस दिन पटवारी आवक स्थल पर बैठकर खरीदी की निगरानी कर रहे थे उसी दिन खरीदी 400 मि्ंटल कम हो गई, जबकि टोकन पहले से पूरा 2400 मि्ंटल का काटा जा चुका था, यह साफ संकेत देता है कि पहले टोकन तो काट दिए जाते थे, लेकिन ना किसान आते थे, ना धान आता था और बाद में उन्हीं फर्जी टोकनों के सहारे घोटाले का हिसाब बराबर कर दिया जाता था, जब निगरानी कड़ी हुई, तो यह खेल तुरंत बैठ गया।
धान खरीदी प्रभारी की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध- सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस दिन पटवारी आवक स्थल पर तैनात थे, धान खरीदी प्रभारी नदारद रहीं, मानो मुंह छुपाकर गायब हो गई हों, जबकि अगले ही दिन, जब हालात सामान्य किए गए, वे फिर से खरीदी की निगरानी करती दिखी, इतना ही नहीं जांच वाले दिन भी धान खरीदी प्रभारी मौके से भागने का प्रयास करती दिखीं, पंचनामा में साइन करने से बचने की कोशिश भी की लेकिन प्रशासनिक दबाव के बाद उन्हें साइन करना पड़ा, इस साइन के साथ यह आधिकारिक रूप से दर्ज हो गया कि उनकी मौजूदगी में ही शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में 13,880 बोरी धान कम पाया गया।
असली किसान गायब, ‘कागजी किसान’ हाजिर- इस नए घटनाक्रम ने एक और खतरनाक सच्चाई उजागर कर दी है, वास्तविक किसान अब खरीदी केंद्र तक आ ही नहीं रहे, उनकी जगह कहीं और से धान की व्यवस्था कर, समिति के जरिए सरकार को जानबूझकर चूना लगाया जा रहा है, मतलब साफ है किसान का नाम, टोकन समिति का, धान कहीं और का, और मुनाफा सीधे घोटालेबाजों की जेब का यह सरकारी तंत्र का सुनियोजित दुरुपयोग है, जिसमें हर दिन सरकार को लाखों का नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
2400 मि्ंटल का टोकन, फिर 2000 खरीदी—बचे 400 कहां गए?– अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या टोकन सिर्फ कागजों में काटे जा रहे थे? क्या किसान डर गए और खरीदी केंद्र नहीं आए? या फिर यह पूरा सिस्टम ही फर्जी टोकन–फर्जी खरीदी पर चल रहा था? जो भी सच हो, एक बात तय है यदि पटवारी की मौजूदगी में खरीदी घट जाती है, तो बिना निगरानी के क्या-क्या होता रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
यह सिर्फ एक केंद्र नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल– शिवप्रसादनगर का यह मामला अब साबित कर रहा है कि धान खरीदी केंद्र में गड़बड़ी एक दिन की नहीं, यह रोज़-रोज़ का खेल था, और इसमें शामिल लोग पूरी योजना के साथ सरकार को नुकसान पहुंचा रहे थे, अब केवल जांच रिपोर्ट काफी नहीं, एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, धान खरीदी प्रभारी और समिति प्रबंधन को तत्काल हटाया जाना चाहिए, पिछले सभी टोकनों और भुगतान की विशेष जांच होनी चाहिए, क्योंकि यह मामला अब सिर्फ धान का नहीं रहा यह सरकारी खजाने की खुली लूट और किसानों के नाम पर किए जा रहे सबसे बड़े धोखे का उदाहरण बन चुका है।
चार केंद्र, एक ही कहानी—भारी कमी, भारी घोटाला
संयुक्त जांच दल ने जिन चार केंद्रों का निरीक्षण किया, वहां हर जगह एक ही तस्वीर सामने आई—धान गायब।
धान उपार्जन केंद्र सावारांवा (08 जनवरी 2026)
6,470 बोरी (लगभग 2,588 मि्ंटल) धान कम
धान उपार्जन केंद्र टुकुडांड (10 जनवरी 2026)
16,032 बोरी (लगभग 6,412.8 मि्ंटल) धान कम
धान उपार्जन केंद्र शिवप्रसादनगर (10 जनवरी 2026)
13,880 बोरी (लगभग 5,552 मि्ंटल) धान कम
धान उपार्जन केंद्र सूरजपुर (10 जनवरी 2026)
16,526 बोरी (लगभग 6,610.4 मि्ंटल) धान कम
कुल कमी: 52,908 बोरी
कुल मात्रा: लगभग 21,162 मि्ंटल
अनुमानित राशि: ₹6,56,59,920 यह आंकड़े खुद बता रहे हैं कि यह छोटा घपला नहीं, बल्कि बड़ा और सुनियोजित महाघोटाला है।
चार दिन तक क्यों दबाई गई सच्चाई?- 10 जनवरी को निरीक्षण हो चुका था, फिर भी इस सनसनीखेज खुलासे को चार दिन तक सार्वजनिक नहीं किया गया, पत्रकार लगातार जनसंपर्क विभाग से जानकारी मांगते रहे, लेकिन या तो जानकारी “पहुंची ही नहीं” या फिर जानबूझकर रोकी गई, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिवप्रसादनगर के मामले में जारी खबर में “ऑनलाइन खरीदी” शब्द जोड़ा गया, जबकि अन्य केंद्रों में ऐसा नहीं किया गया, सवाल उठता है, क्या किसी को बचाने की कोशिश हो रही थी? स्थानीय लोगों का आरोप है कि निरीक्षण दल को जानबूझकर गुमराह किया गया। धान की बोरियों को इस तरह से चट्टा (स्टैक) लगाया गया कि सही गिनती करना मुश्किल हो जाए, लोगों का दावा है कि यदि एक-एक बोरी की ईमानदार गिनती होती, तो कमी 25 हजार बोरी से भी ज्यादा निकलती।
पैसा निकल गया, धान गायब जिम्मेदार कौन?– सरकारी रिकॉर्ड में किसानों को भुगतान हो चुका है, न धान समिति परिसर में है, न राइस मिल तक पहुंचने का पारदर्शी रिकॉर्ड है तो फिर सवाल उठता है क्या यह धान कागजों में खरीदा गया और जमीन पर कभी आया ही नहीं? यह वही पुराना पैटर्न है, जो हर साल सामने आता है समिति कर्मचारी, धान खरीदी प्रभारी, राइस मिलर तीनों की मिलीभगत से धान सीधे राइस मिल पहुंच जाता है, समिति में आए बिना ही खरीदी दिखा दी जाती है और बाद में बोरी “कम” निकलती है। यह घोटाला अकेले किसी एक व्यक्ति के बस का नहीं, यह पूरा सिस्टम फेलियर और संगठित भ्रष्टाचार है।
कार्रवाई कहां है? एफआईआर क्यों नहीं?- भौतिक सत्यापन में जब इतनी बड़ी कमी साफ दिख चुकी है, तो अब तक समिति प्रबंधक क्यों नहीं हटाए गए? धान खरीदी उन्हीं लोगों से क्यों कराई जा रही है, जिन पर संदेह है? एफआईआर की अनुशंसा क्यों नहीं हुई? यह सरकारी धन का खुला दुरुपयोग है, ऐसे मामलों में केवल “प्रकरण तय किया जाएगा” कहना जांच को ठंडे बस्ते में डालने जैसा है।
कलेक्टर को स्वयं लेना होगा संज्ञान- यह मामला अब इतना बड़ा हो चुका है कि इसे निचले स्तर की जांच तक सीमित रखना संदेह को और गहरा करता है, जरूरत है कि तत्काल वर्तमान समिति प्रबंधक व खरीदी प्रभारी को हटाया जाए, दोषियों पर एफआईआर दर्ज हो, राइस मिलरों के यहां भी भौतिक सत्यापन हो, भुगतान और परिवहन के पूरे रिकॉर्ड की विशेष ऑडिट कराई जाए।
बड़ा सवाल अब भी कायम- ₹6.56 करोड़ का धान आखिर गया कहां? क्या दोषी सलाखों के पीछे जाएंगे, या यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा? सूरजपुर की जनता जवाब चाहती है, क्योंकि यह सिर्फ धान की बोरियों की कमी नहीं, सरकार और किसानों के भरोसे की लूट है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur