
अफसर पाक-साफ…क्या यही है सिस्टम ?
जरही तहसील में एसीबी का छापा…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,16 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। तहसील कार्यालयों में रिश्वतखोरी कोई नई बात नहीं है,यह एक खुला हुआ रहस्य है, जिस पर हर बार तब ‘सरकारी मुहर’ लगती है, जब एंटी करप्शन ब्यूरो किसी बाबू को रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ लेती है, लेकिन हर कार्रवाई के बाद वही पुराना, अनुत्तरित सवाल फिर खड़ा हो जाता है क्या बाबू अपने अधिकारी के लिए रिश्वत लेते हैं या सिर्फ खुद के लिए? और अगर अफसर की जानकारी के बिना रिश्वत ली जाती है, तो अफसर जिम्मेदारी से कैसे बच जाता है?
25 हजार लेते रंगे हाथ पकड़ा गया बाबू
सूरजपुर जिले की जरही तहसील एक बार फिर भ्रष्टाचार के कारण सुर्खियों में है, एंटी करप्शन ब्यूरो ने तहसील कार्यालय में पदस्थ लोगन राम (राजस्व बाबू) को 25 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है, आरोप है कि बाबू ने क्षतिपूर्ति मुआवजा प्रकरण के निराकरण के एवज में रिश्वत की मांग की थी,पीडि़त रमेश रजवाड़े से पहले ही 15 हजार रुपये वसूले जा चुके थे,और शेष 25 हजार की मांग की जा रही थी,पीडि़त ने हिम्मत दिखाते हुए एसीबी से शिकायत की,योजनाबद्ध कार्रवाई के तहत बाबू को पकड़ लिया गया,गिरफ्तारी के बाद उसे तहसील कार्यालय के एक बंद कमरे में बैठाकर पूछताछ और दस्तावेजों की जांच की जा रही है,कार्रवाई से पूरे कार्यालय में हड़कंप मच गया।
असली सवाल: बाबू अकेला या सिस्टम का मोहरा?
हर बार की तरह इस बार भी एक बाबू पकड़ा गया,लेकिन क्या तहसीलदार, नायब तहसीलदार या संबंधित राजस्व अधिकारी को कुछ भी पता नहीं? क्या कोई बाबू बिना ऊपर की जानकारी के न्यायालयीन फाइलों को रोक-चलाकर सकता है? क्या बाबू अपने स्तर पर मुआवजा प्रकरण निपटा सकता है? जानकारों की मानें तो यह मानना भोलेपन की पराकाष्ठा है कि अधिकारी को कुछ भी पता नहीं होता, बाबू फाइल चलाता है,लेकिन फाइल की ताकत अफसर के हस्ताक्षर से आती है, फिर हर बार बाबू जेल जाता है, बाबू की नौकरी जाती है, बदनामी बाबू की होती है और सवालों से अफसर बच निकलते हैं क्या बाबू ‘बलि का बकरा’ है? या फिर यह पूरा खेल जानबूझकर नीचे तक सीमित रखा जाता है?
नियंत्रण की कमी या मौन सहमति?
यह तर्क भी दिया जाता है कि बाबुओं पर अधिकारियों का नियंत्रण नहीं है, इसलिए वे रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं,लेकिन यह तर्क खुद राजस्व विभाग की पोल खोल देता है, अगर नियंत्रण नहीं है तो अफसर की भूमिका क्या है? जिम्मेदारी किसकी है? और जवाबदेही कौन तय करेगा? या फिर यह मान लिया जाए कि नियंत्रण नहीं, बल्कि मौन सहमति है।
एक कड़वा सवाल
क्या राजस्व विभाग का नाम बदलकर रिश्वतखोरी विभाग रख देना चाहिए? क्योंकि आज की सच्चाई यही है कि बिना रिश्वत के काम मुश्किल नहीं, लगभग नामुमकिन हो गया है, जरही तहसील की यह कार्रवाई कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतिबिंब है जहां छोटे हाथ पकड़े जाते हैं और बड़े हाथ हमेशा साफ रहते हैं, जब तक रिश्वतखोरी को व्यक्ति नहीं बल्कि तंत्र मानकर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर छापे के बाद सिर्फ नाम बदलेंगे, कहानी वही रहेगी बाबू गिरफ्तार, अफसर बरी।
क्या राजस्व विभाग का नाम ‘रिश्वतखोरी विभाग’ रख देना चाहिए?
क्या अब यह सवाल पूछना भी गलत हो गया है कि राजस्व विभाग में बिना रिश्वत कोई काम क्यों नहीं होता? आज यह आरोप किसी एक व्यक्ति,एक गांव या एक तहसील तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि हजारों शिकायतों की शक्ल में सामने आ चुका है, एक बार फिर 25 हजार रुपये रिश्वत लेते बाबू की गिरफ्तारी ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है, सवाल वही पुराना है, लेकिन अब और ज्यादा तीखा होकर क्या बाबू खुद रिश्वतखोर है या फिर वह अपने अफसरों का ‘कलेक्शन एजेंट’ है?
बाबू पकड़ा गया…लेकिन अफसर फिर बच गया!
हर बार की कहानी लगभग एक जैसी होती है एसीबी की टीम आती है, बाबू या पटवारी रंगे हाथ पकड़ा जाता है, मीडिया में खबर चलती है,विभाग कहता है हम भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे,लेकिन एक सवाल हर बार अनुत्तरित रह जाता है क्या उस बाबू पर उसके उच्च अधिकारियों का कोई नियंत्रण नहीं था? या फिर नियंत्रण था, लेकिन जानबूझकर आंखें मूंदी गई थीं? यह मानना बेहद भोला होगा कि बिना तहसीलदार बिना एसडीएम बिना राजस्व निरीक्षक की जानकारी के बाबू खुलेआम फाइल रोक-चलाकर रिश्वत वसूल रहा है,अगर अधिकारी ईमानदार होते,अगर वे साफ निर्देश देते कि एक रुपये भी रिश्वत नहीं ली जाएगी, तो क्या आज पटवारी और बाबू इतनी आसानी से पकड़े जाते?
रिश्वत की जड़ें ऊपर तक हैं…
सच्चाई यह है कि रिश्वत का खेल नीचे से शुरू होकर ऊपर तक जाता है, कर्मचारी उगाही करता है, और रकम ऊपर तक पहुंचती है यह बात आमजन नहीं, खुद विभाग के भीतर के लोग कहते हैं, आज हालात यह हैं कि नामांतरण हो,मुआवजा हो सीमांकन हो रिकॉर्ड सुधार हो हर फाइल की एक कीमत तय है, सूत्रों की मानें तो जरही में नए तहसीलदार के आने के बाद न सिर्फ रिश्वत का रेट बढ़ा है,बल्कि अब डराकर,प्रताडि़त कर वसूली की जा रही है।
सुशासन तिहार बनाम राजस्व भ्रष्टाचार
एक तरफ सुशासन तिहार के नाम पर प्रशासन जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान का दावा कर रहा है,तो दूसरी तरफ राजस्व विभाग का भ्रष्टाचार इस अभियान की साख पर करारा तमाचा है, आम आदमी पूछ रहा है, जब वैध काम के लिए भी रिश्वत देनी पड़े, तो सुशासन सिर्फ पोस्टर और भाषण तक ही सीमित क्यों है? बेशक, एसीबी की कार्रवाई साहसिक और सराहनीय है, लेकिन सिर्फ बाबू को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं है।
एसीबी से भी सवाल
एक जरूरी सवाल एसीबी से भी बनता है क्या पूछताछ में यह नहीं पूछा जाता कि यह रिश्वत किसके लिए ली जा रही थी?” क्या यह जानने की कोशिश नहीं होती कि क्या अधिकारी इस उगाही में शामिल थे या नहीं? अगर रिश्वत के तार ऊपर तक जुड़े हैं, तो नीचे के कर्मचारी को ही हर बार बलि का बकरा क्यों बनाया जाता है?
क्या अब भी सुधरेगा सिस्टम?
आज जनता का भरोसा इस सवाल पर टिका है क्या यह कार्रवाई एक मिसाल बनेगी या फिर चार दिन की चांदनी साबित होगी? अगर अफसरों की भूमिका की जांच नहीं होगी, ऊपर तक कार्रवाई नहीं पहुंचेगी, सिस्टम की जवाबदेही तय नहीं होगी, तो यह मान लेना पड़ेगा कि राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं,बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है, अब वक्त आ गया है कि या तो सिस्टम सच में सुधरे, या फिर जनता को यह साफ-साफ बता दिया जाए कि राजस्व विभाग में काम नहीं, सौदा होता है।
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