
उपनिरीक्षक से निरीक्षक तक का सफर…क्या ‘सेटिंग’ ही रही सबसे बड़ी उपलब्धि?

- बीजापुर से वापसी और रायपुर क्राइम ब्रांच की जिम्मेदारी पर सवाल जस के तस…
- तीन साल…एक थाना…कई विवाद,फिर भी सबसे संवेदनशील जांच इकाई की जिम्मेदारी
- फाइलें बोलती रहीं…सिस्टम बढ़ाता रहा पद…मनेन्द्रगढ़ से क्राइम ब्रांच तक कैसे?
- सवालों के बीच पोस्टिंग की सीढ़ीः मनेन्द्रगढ़ में विवाद,रायपुर में कमान!
- रिकॉर्ड में विवाद,हकीकत में प्रमोशन…क्राइम ब्रांच तक का रहस्यमय सफर
- जब फाइलें बंद नहीं हुईं…तो जिम्मेदारी कैसे खुल गई?
-न्यूज डेस्क-
एमसीबी/रायपुर,13 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। पुलिस विभाग में पदोन्नति को आमतौर पर ईमानदारी, कार्यकुशलता और अपराध नियंत्रण से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन जब किसी अधिकारी का नाम पद से ज़्यादा विवादों,आरोपों और ‘सेटिंग’ संस्कृति से जुड़ा हो, तो उसकी नई जिम्मेदारी अपने आप सवालों के घेरे में आ जाती है,ऐसा ही एक नाम इन दिनों फिर से सुर्खियों में है सचिन सिंह,उपनिरीक्षक से निरीक्षक बने सचिन सिंह को बीजापुर भेजा गया था, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वे वहां लंबे समय तक टिक नहीं पाए और तेज़ी से वापसी कर अब रायपुर क्राइम ब्रांच की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं, सवाल यह नहीं है कि उन्हें जिम्मेदारी मिली,सवाल यह है कि क्या वे इसके योग्य माने जा सकते हैं?
मनेन्द्रगढ़ थानाः जहां तीन साल में बना ‘सेटिंग सिंह’ का नाम
एमसीबी जिले के मनेन्द्रगढ़ थाना यही वह जगह है जहां सचिन सिंह ने बतौर प्रभारी लगातार तीन साल पूरे किए, तीन साल किसी एक थाने में प्रभारी रहना अपने आप में एक रिकॉर्ड है,लेकिन यह रिकॉर्ड कानूनी कार्यप्रणाली या अपराध नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि अवैध कारोबार को संरक्षण,अपराधियों पर मेहरबानी, कथित अवैध वसूली और ‘सेटिंग सिस्टम’ नियमों से ज़्यादा‘सहमति-प्रबंधन’ पर चलने वाली थाना संस्कृति के लिए जाना गया,यही कारण है कि मनेन्द्रगढ़ में उनका नाम ‘सचिन सिंह’ से ज़्यादा ‘सेटिंग सिंह’ के रूप में चर्चित हुआ।
आरोप,खबरें और जनता की प्रतिक्रिया,सब कुछ दर्ज है…यह कोई
एक-दो आरोपों की बात नहीं है…
मनेन्द्रगढ़ थाना काल में,कई बार उनके विरुद्ध खबरें प्रकाशित हुईं,स्थानीय लोगों में असंतोष खुलकर सामने आया, उनके स्थानांतरण पर आम जनता ने राहत की सांस ली यह भी उल्लेखनीय है कि यह हम नहीं कह रहे थाना क्षेत्र के लोग आज भी उनकी कार्यशैली को याद करते हैं।
क्राइम ब्रांच और ‘सेटिंग मॉडल’ क्या यह खतरनाक मेल नहीं?
क्राइम ब्रांच वह इकाई है जहां अपराध की जड़ तक पहुंचना होता है,सत्ता,पैसा और दबाव से ऊपर उठकर काम करना होता है,ईमानदारी और निष्पक्षता ही सबसे बड़ा हथियार होती है,लेकिन यदि किसी अधिकारी की पहचान ही‘सेटिंग’ और समझौते से बनी हो,तो यह आशंका स्वाभाविक है कि क्या वही पुरानी कार्यशैली अब राजधानी में दोहराई जाएगी?
सबसे बड़ा सवालः संरक्षण किसका?
यह सवाल अब सिर्फ सचिन सिंह पर नहीं,बल्कि उन्हें बार-बार बचाने और आगे बढ़ाने वाले संरक्षण तंत्र पर भी है,कौन है जो हर विवाद के बाद भी उन्हें सुरक्षित निकाल लेता है? क्या पुलिस विभाग में काम से ज़्यादा कनेक्शन अहम हो गया है? क्या यही वजह है कि ईमानदार अधिकारी हाशिए पर और विवादित चेहरे जिम्मेदार पदों पर हैं?
आज की पोस्टिंग…कल के सवाल
इन चारों खबरों का कॉमन थ्रेड स्पष्ट है बार-बार विवाद,कार्यप्रणाली पर संदेह,संरक्षण और ‘सेटिंग’ की चर्चाएं और अंततः जिम्मेदार पदों तक पहुंच आज जब वही अधिकारी रायपुर क्राइम ब्रांच जैसी संवेदनशील इकाई में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं,तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या विभाग ने अपने ही रिकॉर्ड को नजरअंदाज किया है? या फिर यह साबित करता है कि रिकॉर्ड से ज़्यादा रिलेशन मायने रखते हैं?
सबसे बड़ा सवाल-क्या ये सब अलग-अलग घटनाएं हैं?
फिर एक ही सिस्टम का अलग-अलग चेहरा?और जब यही रिकॉर्ड रखने वाला अधिकारी आज क्राइम ब्रांच में है,तो सवाल अब केवल बीते कल का नहीं आज और आने वाले कल की सुरक्षा का है।
बीजापुर पोस्टिंग और रहस्यमय वापसी
साल 2023 में सचिन सिंह को बीजापुर भेजा गया,जिसे कई लोग‘लाइन पर लाने’ की कार्रवाई मान रहे थे,लेकिन हैरानी की बात यह रही कि वे बीजापुर में टिक नहीं पाए,कथित ‘सेटिंग’ के सहारे वापसी हुई,और अब सीधे रायपुर जैसे संवेदनशील स्थान पर क्राइम ब्रांच की जिम्मेदारी यह क्रम अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
रिकॉर्ड में दर्ज सवाल….सचिन सिंह की कार्यप्रणाली पर पहले ही उठ चुके थे गंभीर संदेह
पहलाः तीन सितारे लगते ही थाना प्रभारी अवैध कारोबारियों पर मेहरबानी?- 05 जनवरी 2023 की प्रकाशित खबर में सवाल उठाया गया कि निरीक्षक पदोन्नति के तुरंत बाद महेंद्रगढ़ थाना प्रभारी बने अधिकारी के कार्यकाल में जुआरी,अवैध कारोबार और संदिग्ध रिहाइयों पर नरमी क्यों दिखी,14 जुआरी पकड़े गए,36 बाइक जब्त पर क्या बाकी नेटवर्क को छोड़ दिया गया? यह सवाल उसी समय सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया था।
दूसराः तीन साल एक थाना नया कीर्तिमान या सिस्टम की कमजोरी?
20 मई 2023 की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि मनेन्द्रगढ़ थाना प्रभारी के रूप में लगातार तीन साल का कार्यकाल पूरा हुआ जो सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में अपवाद माना जाता है, रिपोर्ट ने यह भी इंगित किया कि स्थानांतरण सूची आने के बावजूद बदलाव नहीं,जिले बदले, थाना नहीं बदला, सवालों के बाद भी ‘यथास्थिति’ बनी रही
तीसराः सचिन-सौरभ की जोड़ी और थानों का खेल
07 जून 2023 की खबर में दावा किया गया कि एक जिले से दूसरे जिले में जिम्मेदारी का आपसी समायोजन हुआ,एक बीजापुर तो दूसरे की रायगढ़ होगी रवानी इस रिपोर्ट में पुलिस विभाग के भीतर आपसी सेटिंग,संरक्षण और अदला-बदली की चर्चाएं सार्वजनिक मंच पर आईं।
चौथाः आदिवासी महिला प्रकरणः कानून से ज़्यादा ‘समझौता’?- 31 मई 2023 की खबर ने सबसे संवेदनशील सवाल खड़ा किया क्या आदिवासी महिला के सामने गिड़गिड़ाने के बाद थाना प्रभारी अपने मामले में समझौता कराने में सफल हुए? रिपोर्ट में उल्लेख था कि महिला को समझने के लिए दबाव,भावनात्मक/मानवीय सहानुभूति का उपयोग,कानूनी प्रक्रिया से इतर समाधान की कोशिश यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं,नैतिक और संवैधानिक प्रश्न भी खड़ा करता है।
पांचवाः अवैध शराब मामलाः पुलिस की ड्यूटी या एक्साइज की? प्रकाशित सवाल 2022-23 अवैध शराब पकड़े जाने के मामले में पुलिस झूठी या एक्साइज ड्यूटी के कर्मचारी झूठे? कार्रवाई का श्रेय लेने की होड़,जब्ती और एफआईआर में विरोधाभास,मौके पर मौजूद कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पर सवाल उठा अवैध शराब के नेटवर्क में कार्रवाई है या दिखावा? यह खबर पहली बार संकेत देती है कि कार्रवाई से ज्यादा कागजी संतुलन अहम था।
छठवांः दिव्यांग आरोपी मामलाः पूरा थाना खाली करना कितना वैध?-इन कार्यकाल दिव्यांग आरोपी को पकड़ने पूरा पुलिस थाना खाली छोड़कर जाना कितना उचित? थाना प्रभारी, सहायक उप निरीक्षक,प्रधान आरक्षक सभी मौके पर थाना लगभग खाली,प्रश्न उठा किः क्या आरोपी की हैसियत सामान्य थी या मामला असामान्य?’यह केस प्रशासनिक विवेक पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया।
सातवांः बिना फिटनेस वाहन से अंतरराज्यीय कार्रवाई…कानून का उल्लंघन?-इनके कार्यकाल में बिना फिटनेस वाहन से दूसरे राज्य तक आरोपी पकड़ने जाना क्या सही? वाहन की फिटनेस एक्सपायर,फिर भी लंबी दूरी की कार्रवाई,दुर्घटना का जोखिम,सवालः ‘अगर हादसा में आरोपी की मौत होता, जिम्मेदार कौन होता? यह मामला सीधे पुलिस मैनुअल और मोटर व्हीकल एक्ट से टकराता है।
आठवांः फिटनेस 6 दिसंबर तक फेल 7 दिसंबर को कैसे एक्टिव?- सबसे तकनीकी और गंभीर खुलासा जिस वाहन का फिटनेस 6 दिसंबर तक ऑनलाइन फेल दिख रहा था,7 दिसंबर को कैसे हुआ एक्टिव? परिवहन पोर्टल का स्क्रीनशॉट,तारीखों का स्पष्ट विरोधाभास, मैनुअल अपडेट या सिस्टम से छेड़छाड़? सवालः क्या रिकॉर्ड बदले गए? यह खबर डिजिटल ट्रेल के साथ सामने आई थी जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।
सुरक्षित डिस्क्लेमर
यह समाचार पूर्णतः पूर्व में प्रकाशित खबरों, सार्वजनिक दस्तावेजों, रिकॉर्ड्स एवं समाचार कटिंग्स पर आधारित है, उसमें उल्लिखित घटनाएं,आरोप एवं सवाल किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने का दावा नहीं करते,किसी भी आरोप की सत्यता का अंतिम निर्णय न्यायालय अथवा सक्षम जांच एजेंसियों का विषय है, समाचार का उद्देश्य केवल जनहित में सामने आए तथ्यों, रिकॉर्ड्स और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर उठे सवालों को पाठकों के समक्ष रखना है,जो कि संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदार पत्रकारिता के दायरे में आता है।
जांच जारी है…
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, मनेन्द्रगढ़, बीजापुर और अब रायपुर, तीनों कडि़यों को जोड़ने पर एक ऐसा पैटर्न सामने आता है, जिस पर सवाल उठना ज़रूरी है, अगले अंक मेंः ‘सेटिंग सिंह’ नाम कैसे पड़ा? किन-किन मामलों में शिकायतें दबाई गईं? और क्राइम ब्रांच में यह नियुक्ति किसके इशारे पर?
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