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सूरजपुर@सवालों में सूरजपुर का बाल संरक्षण तंत्र

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सूरजपुर में बाल संरक्षण विभाग की सबसे बड़ी विफलता उजागर…

  • गुंडा-बदमाश सूची में नाम…कई आपराधिक मामले दर्ज…फिर भी मनोज जायसवाल कैसे बने जिला बाल संरक्षण अधिकारी?
  • दस्तावेज़ों से खुलासा,नियुक्ति से पहले ही दर्ज थे जुआ एक्ट, मारपीट,107/116, 341, 148, 151 के कई मामले…
  • कुर्सी पर ऐसे चिपके जैसे फेविकोल से चिपकाया गया हो…
  • जिले में हड़कंप—दस्तावेज़ बताते हैं कि नौकरी से पहले ही इनके खिलाफ जुआ एक्ट,मारपीट,शांति भंग,गुंडागर्दी…जैसे कई अपराध दर्ज थे…


-शमरोज खान-
सूरजपुर,25 नवम्बर 2025
(घटती-घटना)।

जिले के जिला बाल संरक्षण अधिकारी जैसे संवेदनशील पद पर बैठे अधिकारी मनोज जायसवाल को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। प्राप्त आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, मनोज जायसवाल के खिलाफ जि़ले के बनने से लेकर आज तक लगातार आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जिनमें जुआ एक्ट, शांतिभंग, मारपीट, अधिकारियों से दुर्व्यवहार,341,148,151,107/ 116 (3) जैसे गंभीर प्रकरण शामिल हैं, इतना ही नहीं दूसरे दस्तावेज़ में पुलिस अधीक्षक सूरजपुर द्वारा साफ लिखा गया है कि मनोज जायसवाल का नाम वर्ष 2013 में सामुदायिक गुंडा-बदमाश सूची में दर्ज पाया गया है,ऐसे में अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बाल संरक्षण विभाग में संवेदनशील पदों पर नियुक्ति से पहले चरित्र सत्यापन औपचारिकता मात्र है? क्या नौकरी के नियम,पात्रता और बैकग्राउंड चेक केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या बाल संरक्षण जैसे अत्यंत संवेदनशील विभाग में अपराधियों का भी स्वागत है? क्या बच्चों के हितों की रक्षा करने वाले पद पर गुंडा सूची में शामिल व्यक्ति को बैठाना प्रशासन का नया मॉडल है? या फिर सच यही है योग्य लोग बाहर,और गुंडा-बदमाश सूची वाले कुर्सी पर…बस जुगाड़ चाहिए,जिला सूरजपुर में जिला बाल संरक्षण अधिकारी पद पर बैठे मनोज जायसवाल पर खुलासे अब सीधा विभाग की जड़ें हिला रहे हैं।
फिर कैसे मिली थी नौकरी? किसने किया था बैकग्राउंड क्लियर? और क्या विभाग को अतीत की जानकारी थी?
बाल संरक्षण अधिकारी का पद किसी भी सामान्य नौकरी से अलग है, इस पद पर बैठे व्यक्ति को बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों का निर्णय लेना होता है, बाल कल्याण समिति और बाल न्याय बोर्ड के साथ काम करना होता है परिवार, महिला, नाबालिग, शोषण, घरेलू हिंसा, परित्याग जैसी फाइलों को हैंडल करना होता है ऐसे संवेदनशील विभाग में गुंडा-बदमाश सूची में दर्ज नाम वाला व्यक्ति पदस्थ हो यह न केवल नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि प्रणाली की गंभीर असफलता भी है।
क्या भर्ती नियमों की ऐसी दुर्गति हो चुकी है कि अपराधी भी अधिकारी बन जाते हैं?
सवाल सिर्फ मनोज जायसवाल का नहीं सवाल है पूरे सिस्टम का, सवाल है चरित्र सत्यापन के नाम पर चल रही फर्जी औपचारिकताओं का,और सवाल है कि जब पुलिस की रिपोर्ट में ही दर्ज था कि यह व्यक्ति गुंडा-बदमाश सूची में है…तो कौन-सा चमत्कारी हाथ था जिसने इन्हें बाल संरक्षण विभाग में पदस्थ करा दिया? विवादित इतिहास, विवादित रिकॉर्ड,पर कुर्सी हिलती तक नहीं, क्या राजनीतिक संरक्षण है? क्या विभागीय मिलीभगत? या फिर कुछ और बड़ा खेल? जिले में चर्चा है, अधिकारी सालों से कुर्सी पर ऐसे जमे हैं जैसे विभाग निजी संपत्ति हो,हर साल होने वाला पुलिस चरित्र सत्यापन सिर्फ कागजों की खानापूर्ति बनकर रह गया, विभागीय अधिकारी भी रिपोर्ट देखना नहीं चाहते थे या देखकर भी अनदेखा कर दिया।
सवाल और भी खतरनाक हैं…
क्या बच्चों और महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों को ऐसे व्यक्ति के हवाले कर दिया गया? क्या संरक्षण अधिकारी की कुर्सी पर बैठने का लाइसेंस अब ईमानदारी नहीं, ‘जुगाड़’ बन गया है? क्या यह विभाग अब अपराधियों की शरणस्थली बन गया है?
बाल संरक्षण विभाग पर भी उठे प्रश्न
क्या विभाग ने नियुक्ति के समय पुलिस रिपोर्ट मांगी थी? या फिर रिपोर्ट आने के बावजूद आंख मूंदकर नियुक्ति दे दी गई? अब जरूरत है जांच की, जवाबदेही की और पारदर्शिता की जिले का बाल संरक्षण तंत्र बच्चों से जुड़ा सबसे संवेदनशील सिस्टम है, यदि इस तंत्र में ऐसे अधिकारी बैठे होंगे, तो केस कैसे निष्पक्ष होंगे? पीडि़तों को न्याय कैसे मिलेगा? और विभाग पर भरोसा कैसे बचेगा?
क्या फेविकोल की तरह कुर्सी से चिपके हैं अधिकारी?
जिले में चर्चा इतने मामले होने के बावजूद आज तक क्यों नहीं हुई हटाने की कार्रवाई? स्थानीय सूत्रों की मानें तो अधिकारी कई वर्षों से इसी पद पर जमे हुए हैं, विभागीय कार्रवाई फाइलों में घूमती रही, लेकिन पदस्थापना जस की तस, हर साल होने वाला पुलिस चरित्र सत्यापन औपचारिकता बनकर रह गया।
दस्तावेजों से निकले 10 प्रमुख आपराधिक प्रकरण
थाना उदयपुर द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार मनोज जायसवाल के खिलाफ निम्नलिखित एफआईआर दर्ज थीं…

  1. अप्र.क्र.169/1992 — जुआ एक्ट
  2. अप्र.क्र.162/1993 — धारा 13 जुआ एक्ट
  3. अप्र.क्र.14/2002 — धारा 341, 147 भादवि
  4. इस्त.क्र.23/1995 — धारा 107,116(3) जा.फो.
  5. इस्त.क्र.53/1996 — धारा 107,116(3)
  6. इस्त.क्र.250/1996 — धारा 107,116(3)
  7. इस्त.क्र.28/2009 — धारा 151, 107,116(3)
  8. इस्त.क्र.20/2010 — धारा 107,116(3)
  9. इस्त.क्र.148/2010 — धारा 107,116(3)
  10. इस्त.क्र.79/2020 — धारा 107,116(3)
    ये वे मामले हैं जो जिला बनने से लेकर विभागीय भर्ती से पहले तक दर्ज थे।


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