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सूरजपुर@नौसिखिए तहसीलदार का बचकाना फैसला?

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-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर 12 सितम्बर 2025 (घटती-घटना)।  “सत्यमेव जयते” यह स्लोगन हमें हर न्यायालय में देखने को मिल सकता है, और कहा भी जाता है कि अंतिम विजय सत्य की ही होती है। सत्य हर न्यायालय में जीत सकता है, पर एक ही न्यायालय है जहां सत्य हार जाता है, वह न्यायालय है राजस्व न्यायालय। जहां पर सत्य का कोई मोल नहीं, सिर्फ पैसे का बोलबाला, पैसा दीजिए और फैसला अपने पक्ष में लीजिए। अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है, तो ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अभी ताजा मामला सूरजपुर जिले के भैयाथान तहसील कार्यालय का सामने आया है। ओडगी तहसील के ग्राम इंदरपुर भू स्वामी यानी कि प्रार्थी ने अपने जमीन पर कब्जे का प्रकरण न्यायपूर्वक करने के लिए ओड़गी तहसील कार्यालय से भैयाथान तहसील कार्यालय प्रकरण को स्थानांतरण करवाया, ताकि निष्पक्ष तरीके से प्रकरण का निपटारा हो सके। पर उसे यह नहीं पता था कि राजस्व के न्यायालय में बैठे भ्रष्ट अधिकारी ऐसा होने नहीं देंगे। भैयाथान राजस्व न्यायालय में चल रहा प्रकरण 3 साल बाद इस नतीजे के साथ खारिज किया गया, वहां के तहसीलदार द्वारा जो फैसला हुआ देखकर लोग उस फैसले पर हंस रहे हैं, और मजाक उड़ा रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि तहसीलदार ने बचकाना फैसला दे दिया हो।


भैयाथान के नय नवेले तहसीलदार ने राजस्व अमले की गलती पर प्रार्थी का आवेदन किया खारिज?
विकासखंड ओडगी के ग्राम पंचायत इंदरपुर निवासी रमजुली पिता सूरजमनी ने अपने हक और रिकॉर्ड की भूमि पर बेजा कब्ज़ा हटाए जाने और विवाद से किनारा करने के लिए उक्त भूमि का तीन बार सीमांकन कराया। यह प्रक्रिया सन 2002, 2007 और 2024 में संपन्न हुई। तीन बार सीमांकन होने पर भी राजस्व विभाग के अधिकारियों ने सीमा विवाद और बेजा कब्जा पर कोई निर्णयकारी कार्यवाही नहीं किया। त्रस्त होकर आवेदिका ने तहसीलदार के समक्ष बेजा कब्ज़ा हटाए जाने संबंधी आवेदन प्रस्तुत किया और न्याय की आशा में ओडगी तहसील कार्यालय से अपने प्रकरण को भैयाथान तहसील कार्यालय में स्थानांतरित कराया, ताकि निष्पक्ष न्याय प्राप्त हो सके। परंतु 3 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भी आवेदिका  के हाथ कुछ नहीं आया और वर्तमान तहसीलदार भैयाथान ने यह कहकर मामले को खारिज कर दिया की कराए गए सीमांकन और जमा किए गए दस्तावेजों में त्रुटियां हैं, फील्ड बुक तैयार नहीं है, सीमांकन के समय अनावेदक अनुपस्थित था और सीमांकन पंचनामा में अनावेदक के हस्ताक्षर नहीं है। मामले में बड़ा सवाल यह है कि जब किसी भूमि के सीमांकन के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जाता है, तो राजस्व विभाग के कर्मचारी ,पटवारी, आर आई विधिवत सीमांकन कार्यवाही करते हैं। आवेदक के साथ-साथ अनावेदक एवं ऐसे व्यक्ति, संस्था की उपस्थिति अनिवार्य होती है, जो तत्संबंधित भूमि से लगी भूमि के स्वामी अथवा कब्जाधारी होते हैं। मौके पर ही सीमांकन कर फील्ड बुक तैयार किया जाता है, और इसके साथ ही सीमांकन का पंचनामा तैयार किया जाता है। जिसमें समस्त हितबद्ध पक्षकार, आवेदक, अनावेदक सभी के हस्ताक्षर लेने अनिवार्य होते हैं। उनकी गैर मौजूदगी में सीमांकन का कार्य नहीं किया जा सकता। बाकायदा सीमांकन का शुल्क अदा किया जाता है। यदि सीमांकन में त्रुटि की जाए या सीमांकन संबंधी दस्तावेजों में त्रुटि हो, आधे अधूरे हों, तो सारा दोस्त राजस्व विभाग के कर्मचारियों का होता है। इसमें आवेदक की कोई त्रुटि नहीं होती, इस आधार पर आवेदक का प्रकरण खारिज किया जाना न्याय की हत्या के समान है।
तहसीलदार ने सीमांकन दस्तावेजों में त्रुटि बता प्रकरण खारिज किया, सीमांकनकर्ता कर्मचारी, अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब करना था या पूरा प्रकरण ख़ारिज करना था?
जिस प्रकरण को भैयाथान तहसीलदार ने सीमांकन दस्तावेजों में त्रुटि बताकर खारिज किया है, उसमें उन्हें सीमांकनकर्ता कर्मचारी, अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब करना चाहिए था। प्रकरण को खारिज करने का जो कारण तहसीलदार ने अपने फैसले में लिखा है, उसके अनुसार पूर्व में किए गए 2002 और 2007 में सीमांकन में विरोधाभास है। पर यह विरोधाभास आवेदिका के कारण नहीं है, बल्कि दोनों बार सीमांकन करने गए अधिकारी कर्मचारियों के कारण है। इसके साथ ही प्रकरण को खारिज करते समय भैयाथान तहसीलदार ने आदेश में लिखा है कि वर्तमान में किए गए सीमांकन में अनावेदक का हस्ताक्षर नहीं है, अनावेदक की उपस्थिति सीमांकन के समय परिलक्षित नहीं होती, एवं फील्ड बुक तैयार नहीं है। क्या तहसीलदार को इतना भी नहीं पता की फील्ड बुक तैयार करने वाला, सीमांकन के समय पक्षकारों की उपस्थिति सुनिश्चित कराना एवं पंचनामा प्रतिवेदन पर पक्षकारों का हस्ताक्षर लेना पटवारी और आर आई का कार्य है। इसमें किसी पक्षकार और आवेदक का कोई भूमिका नहीं होता। इस आधार पर प्रकरण कैसे खारिज किया जा सकता है?? इन्हीं आधार पर आवेदिका के ही प्रकरण को खारिज कर दिया गया जो कि बडा ही हास्यास्पद है। यहां या तो न्यायकर्ता अनुभवहीन और नौसीखिया नजर आता है, या फिर आशानुकूल चढ़ावे के अभाव में यह फैसला लिया गया है।
जिस बात का संज्ञान पहली पेशी में हो जाना था,उसके लिए लगा 3 साल का समय, परिणाम भी ढाक के तीन पात
राजस्व न्यायालय में प्रार्थी ने अपने जमीन से कब्जा हटाने का प्रकरण आवेदन देकर दर्ज कराया, जिसके लिए सारी प्रक्रिया तहसील कार्यालय द्वारा कराई गई। यह प्रकरण 3 साल लंबित रहने के बाद नए नवेले तहसीलदार ने उसे खारिज कर दिया और उसमें लिखा कि सीमांकन में अनावेदक का हस्ताक्षर नहीं है। जब अनावेदक का हस्ताक्षर नहीं था, तो फिर सीमांकन क्यों एक्सेप्ट किया गया न्यायालय में और फिर सीमांकन करने वाले पर कारण बताओ नोटिस जारी होना था। गलती उनके अधीनस्थ कर्मचारी की और भरपाई करें प्रार्थी ? जब पहली बार प्रकरण की फाइल तहसीलदार के समक्ष आई तो उन्होंने यह क्यों नहीं देखा कि प्रकरण में जमा किए गए दस्तावेज आधे अधूरे हैं। इसके लिए 3 साल का लंबा वक्त क्यों लगाया? क्या उचित सेटिंग नहीं हो पाई? कहीं उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई, इस वजह से कुछ भी लिखकर प्रकरण को खारिज कर दिया गया? क्या ऐसे लंबित प्रकरण को तहसील कार्यालय में बेतुका तथ्यों पर खारिज किया जा सकता है? इस मामले में लिए गए फैसले ने राजस्व न्यायालयों के पूरी प्रक्रिया पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।


अन्यायपूर्ण व्यवस्था और फैसले पर आवेदिका का सनसनीखेज आरोप
ग्राम इन्दरपुर की भूमिस्वामी आवेदिका का आरोप है कि उनके जमीन प्रकरण (प्रकरण संख्या 202309261100011/ए-70-2022-23) के निपटारे में तहसील-स्तर पर गम्भीर अनियमितताएँ हुईं और उन्हें न्याय से वंचित किया गया। आवेदिका का कहना है कि जब उन्होंने मामले को भैयाथान में जाने दिया तो तहसील-कर्मियों ने उनसे कथित मांगें कीं और कई बार आदेश बंदी/टालमटोल के चलते उनका आवेदन खारिज कर दिया गया। आवेदिका के मुताबिक़, तत्कालीन तहसीलदार संजय राठौर ने कहा कि मामला अगर भैयाथान में रहेगा तो वह “आदेश कर देंगे” पर बाद में महंगी उपहार और नकद की मांगें सामने आईं (आरोप में आई-फ़ोन जैसी मांग का उल्लेख किया गया है।) और आंशिक भुगतान लेने के बाद भी फाइल कई महीनों तक तहसीलदार के पास पड़ी रही। बाद में संजय राठौर को निलंबित कर दिया गया था।‌ जिन पर पहले भी भूमि नामांतरणों के संदिग्ध मामलों में कार्रवाई की खबरें आई थीं। यह निलंबन स्थानीय मीडिया में रिपोर्ट भी हुआ था। आरोप के मुताबिक, संजय राठौर के निलंबन के बाद आए नए तहसीलदार शिव नारायण राठिया के कार्यकाल में भी आवेदिका ने वही पैटर्न अनुभव किया। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि तहसील के कुछ कर्मियों ने साफ़ कहा कि एक तय “राशि” का समझौता पहले से था और प्रकरण पर तत्काल निर्णय दिए जाने के लिए भुगतान की माँग की जा रही थी। आवेदिका ने बताया कि जब उन्होंने पैसे देने से मना किया तो उनके आवेदन की सुनवाई टाल दी गई और 10/09/2025 को उनका आवेदन खारिज कर दिया गया।
आवेदिका विभिन्न माध्यमों से प्रशासन से मांग कर रही हैं
उनके प्रकरण की न्यायिक/प्रशासनिक रूप से निष्पक्ष और त्वरित पुनःजांच की जाए, जो भी कर्मीयों ने अनुचित दबाव/राशि की माँग की, उन पर कड़ी विभागीय और आवश्यक कानूनी कार्रवाई हो, रेवेन्यू प्रथाओं की समीक्षा कर पारदर्शिता और ट्रैकिंग-मैकेनिज्म लागू किया जाए ताकि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
समाचार का परीक्षित स्वर और चेतावनी
यह रिपोर्ट आवेदिका के दावों और स्थानीय स्रोतों पर आधारित है। हमारी रिपोर्ट का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण बदनाम करना नहीं है पर सार्वजनिक हित में यह आवश्यक है कि रेवेन्यू विभाग और शासन-स्तर पर यह स्पष्ट किया जाए कि क्या ऐसे आरोप सत्य हैं और किस तरह की सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी। जब तक त्वरित और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक जमीन मालिकों का भरोसा बहाल नहीं हो पाएगा।

स्थानीय लोगों और आवेदिका के दृष्टिकोण से पूछे जाने वाले प्रमुख प्रश्न:-
सवाल: क्यों तहसील और राजस्व विभाग में लगातार भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगता हैं?
सवाल: क्या न्याय दिलाने के बजाय रिश्वत और दबाव का खेल चलता है?
सवाल: क्या अब जनता को सीधे न्यायालय (कोर्ट) का दरवाज़ा खटखटाना बंद कर देना चाहिए?
सवाल: क्या सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बनती कि जनता को तहसील स्तर पर ही न्याय मिले, ताकि हर साधारण नागरिक कोर्ट के चक्कर काटने से बचे?
सवाल: जब जमीन की रजिस्ट्री और निपटान की प्रक्रिया अनेक सरकारी अधिकारियों पटवारी, आर.आई., तहसीलदार व अन्य कर्मियों के हस्तक्षेप से होकर गुजरती है, तो क्या इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले पर्याप्त तंत्र मौजूद होने के बात भी बेतुका फैसला क्यों होता है?
सवाल: क्या यह मानना जायज़ है कि एक ही प्रकरण कई स्तरों पर जाकर सत्यापन के बाद भी अचानक निर्णयों से प्रभावित कर दे और यदि हाँ, तो ऐसे निर्णयों के पीछे जिम्मेदारियों का लेखा-जोखा कौन तय करेगा?
सवाल: यदि बिक्री के बाद विक्रेता ने फिर भी जमीन पर कब्ज़ा कर लिया है तो क्या तहसील कार्यालय के पास ऐसे मामलों में तत्काल प्रभाव से या प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध नहीं हैं जो देश के नागरिकों को उनके अधिकार तुरंत दिला सकें?
सवाल: क्या यह कार्य है कि एक नागरिक को न्याय पाने के लिए बार-बार तहसील के चक्कर काटने पड़ें, जबकि भूमि रजिस्ट्री का अंतिम निर्णय कई सरकारी चरणों से होकर गुजरता है?
सवाल: क्या ऐसी परिस्थितियों में राज्य का दायित्व नहीं बनता कि वह तहसील स्तर पर पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध सुनवाई के सख्त मानक लागू करे ताकि आम जनता को कोर्ट के चक्कर लगाने की जरूरत ही न पड़े?
सवाल: क्या सरकार को राजस्व-प्रक्रियाओं को और अधिक डिजिटल, ट्रैक-एबिल और ऑडिटी-फ्रेंडली बनाकर भ्रष्टाचार घटाना चाहिए या फिर यदि तहसील स्तर पर सुधार संभव न हो तो उसके विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए?
सवाल: क्या यह मांग वाजिब नहीं होगी कि ऐसे मामलों में त्वरित निवारण और जनहित की दृष्टि से उच्च स्तरीय पारदर्शी जांच की जाए ताकि दोहराव व दुरुपयोग रोके जा सकें?
सवाल: क्या सरकार को यह विचार करना चाहिए कि तहसील कार्यालयों की मौजूदा व्यवस्थाएँ यदि व्यापक स्तर पर जवाबदेही व पारदर्शिता न दे रही हों, तो क्या उनकी कार्यप्रणाली में संरचनात्मक बदलाव या निगरानी तंत्र लागू किए जाएँ?


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