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सूरजपुर@मंत्री नहीं तो मंत्री के पति की ही घोषणा को अब मानना पड़ेगा?

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-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,27 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। आज की राजनीति में क्या-क्या देखना पड़ रहा है जो आज तक की राजनीति में नहीं देखना पड़ा राजनीति अब सेवा नहीं सिर्फ पूंजीपतियों की कठपुतली बन कर रह गई है यह कहना भी शायद गलत नहीं होगा,राजनीति अब सिर्फ स्वार्थ की हो गई है एक बार मौका मिले और जीवनभर के लिए सुविधा साधन इकट्ठा कर लो यही राजनीति है, यह बात अब आप सोच रहे होंगे कि क्यों हो रही तो यह बात इसलिए हो रही है क्योंकि सूरजपुर जिले में एक महीने पहले गोबरी नदी पर स्थित पुल टूट जाता है और उसे बनाने की प्रक्रिया कछुए की चाल में कागजी की घोड़े के साथ बढ़ता है पर पुल टूटने से जो परेशानी है और जिन्हें परेशानी है वह उस विधानसभा के विधायक व मंत्री की जिम्मेदारी है की समस्या से लोगों को निजात दिलाया जाए, ग्रामीण भी जानते हैं कि इतना बड़ा पुल तत्काल नहीं बन सकता उसके लिए समय लगेगा पर क्या स्थानीय विधायक व मंत्री इसके लिए विकल्प मार्ग भी नहीं बना सकते जिस मार्ग के लिए ग्रामीण 20 किलोमीटर का चक्कर लगा रहे हैं, ग्रामीण जब इस परेशानी से इतना परेशान हो गए की जन सहयोग से वैकल्पिक मार्ग बनाने जुट गए तब अचानक मंत्री के पति प्रकट हो गए और उन्हें लगा कि अब भाजपा के वोट पर सेंध लग जाएगी इसीलिए वह भी जन सहयोग करने वाले ग्रामीणों में क्या शामिल हो गए? उन्होंने ही विकल्प मार्ग के लिए हियूम पाइप गिरवाया और बताया कि हमें ग्रामीणों की चिंता है उनके लिए वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था हम जल्द कर देंगे, पर सवाल यह उठता है कि ग्रामीणों की जन सहयोग करने की सूचना के बाद ही उन्होंने ऐसा निर्णय क्यों लिया? यह निर्णय वह तो पहले भी ले सकते थे पर क्यों नहीं लिया? कहीं उन्हें अपनी आलोचना का डर तो नहीं सताया? एक आश्चर्य की बात यह भी है कि जब से पुल टूटा है और जब से ग्रामीणों का संपर्क कई गांव से टूटे हैं और संपर्क के लिए उन्हें 20 किलोमीटर तक का सफर करना पड़ रहा है, तब से लेकर जन सहयोग के माध्यम से विकल्प मार्ग बनाने तक के निर्णय तक मंत्री के दर्शन उन ग्रामीणों को नहीं हुए, दर्शन और घोषणा हुई भी तो उनके पति यानी कि ठाकुर प्रसाद के द्वारा ही की गई सारी घोषणाएं, उन्हीं के द्वारा की गई और उन्हीं के द्वारा लोगों को आश्वासन मिलता है पर सवाल यह उठता है कि क्या मंत्री की गैर हाजिरी में उनके पति की घोषणा संवैधानिक है?

जिनके मतों से चुनाव जीत सकीं उन्हीं के बीच मंत्री जी को जाना क्या नहीं पसंद…मतदाताओं ने वोट लक्ष्मी राजवाड़े को दिया था ना कि उनके पति को?
राष्ट्रीय राज्यमार्ग से भटगांव विधानसभा के कई गांव को जोड़ने वाले पुल के धराशाई होने से हजारों लोग मुख्य मार्ग से कट गए और उन्हें आवागमन में कठिनाई का सामना करना पड़ा और 20 किलोमीटर का उनके लिए किसी भी गंतव्य के लिए सफर बढ़ गया,इस बीच पुल के धराशाई होने से लेकर आवागमन के लिए ग्रामीणों द्वारा वैकल्पिक तैयारियों के बीच भटगांव विधायक साथ ही मंत्री पुल का जायजा लेने नहीं पहुंची और न उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि पुल से जिन्हें सुविधा थी उनका क्या हाल है,जब ग्रामीणों ने खुद वैकल्पिक मार्ग के लिए प्रयास शुरू किया तब मंत्री पति मौके पर पहुंचे और उन्होंने कुछ घोषणा कर दी। अब सवाल यह है कि जिन लोगों के मतों से मंत्री जी विधायक बनी और जिनकी बदौलत उन्हें मान सम्मान मिला क्या उनके बीच उनके दुख तकलीफ समस्याओं में मंत्री जी को जाना पसंद नहीं,वहीं मंत्री जी के पति का मौके पर जाना और घोषणा करना कितना सही है,क्योंकि लोगों ने चुनाव मंत्री जी को जिताया न की उनके पति को और जिन्होंने मत देकर अपना विधायक चुना मंत्री जी को वह मंत्री जी को प्रत्यक्ष अपने बीच पाते तो शायद वह ज्यादा प्रसन्न होते। खैर अब राजनीति में सब कुछ जायज की परम्परा चल चुकी है और अब ऐसे विषयों को लेकर लोग भी मान चुके हैं कि अब जिन्हें वह चुनते हैं वह उनके साथ हर समय खड़े नहीं होंगे कई बार उनके प्रतिनिधि से भी काम चलाना होगा वरना जो लाभ मिल सकता है वह भी इंतजार करते मिलेगा नहीं।
घोषणा करना संवैधानिक रूप से मंत्री का अधिकार है या फिर उनके प्रतिनिधि पति का?
वैसे मंत्री पति पुल निरीक्षण के लिए पहुंचे और ग्रामीणों द्वारा जारी वैकल्पिक मार्ग निर्माण कार्य का उन्होंने जायजा लिया और उन्होंने वहां कुछ घोषणाएं की,मंत्री पति के द्वारा की गई घोषणा को लेकर वहां उपस्थित लोगों में यह चर्चा सुनी गई कि क्या मंत्री पति को या मंत्री पति को घोषणा करने का अधिकार है क्या वह घोषणा कर सकते हैं। लोगों के अनुसार ऐसा संवैधानिक अधिकार जैसा कोई विषय पहले सामने नहीं आया,वहीं चर्चा यह भी सुनी गई कि हो सकता है कि हाल फिलहाल में कोई नियम ऐसे आए हों जिसके अनुसार मंत्री या विधायक प्रतिनिधि भी मंत्री विधायक की अनुपस्थिति में घोषणा कर सकें और ऐसा अधिकार उन्हें प्रदान किया गया हो,वैसे मंत्री जी साथ ही क्षेत्रीय विधायक का नहीं पहुंचना चर्चा का विषय भी बना रहा ओर लीग यह भी कहते सुने गए कि जनता से दूरी बनाना मंत्री जी को जनता से दूर ही न कर दे और जिसका उन्हें खामियाजा अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
क्या सूरजपुर जिले में राजनीति की उलटी गंगा बह रही है?
मंत्री जी की जगह उनके प्रतिनिधि पति ज्यादातर काम मंत्री जी का सम्भाल रहे हैं,यह मामला सूरजपुर जिले के भटगांव विधानसभा का है,घोषणाएं भी मंत्री पति प्रतिनिधि बतौर कर रहे हैं लगातार,ऐसा देखकर सुनकर यह सवाल उठता है कि क्या सूरजपुर जिले में अलग की और उल्टी गंगा बह रही है,मंत्री जी का जनता से सीधा जुड़ाव कम जनता का सीधा जुड़ाव मंत्री पति जो उनके प्रतिनिधि हैं उनसे होता नजर आ रहा है। अब यदि प्रतिनिधि या पति ही सर्वेसर्वा हैं तो फिर मंत्री जी को सारे काम का जिम्मा उन्हें ही दे दिया जाना चाहिए ऐसी भी चर्चा होती रहती है।
भटगांव विधायक के रिश्तेदार भी अब मंत्री हैं?
भटगांव विधायक के बारे में एक और जन चर्चा सुनी जा रही है,जन चर्चा अनुसार उनके रिश्तेदार भी मंत्री से खुद को कम नहीं समझते, कोरिया जिले में भी उनके रिश्तेदार हैं जो उनके नाम का सहारा लेकर रुतबा बताते रहते हैं। बताया जाता है कि कई रिश्तेदार मंत्री जी के नाम से कार्यालयों में प्रभाव जताते सुने जा रहे हैं।


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