- एक पुल के धराशायी होने के बाद प्रशासन एक महीने में भी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बन पाया,क्या यही है सुशासन?
- निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी सिर्फ वोट मांगने के लिए है जनता की समस्या दूर करने में वह भी असहाय है?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। जनप्रतिनिधियों को मतदाताओं व ग्रामीणों की आवश्यकता तब होती है जब उन्हें चुनाव जीतना होता है, मुसीबत में निर्वाचित जनप्रतिनिधि ग्रामीण व मतदाताओं को बीच मझधार में छोड़ देते हैं, ऐसा लगता है कि वह यह सोचते हैं की मुसीबत उनकी हमारी थोड़ी,कुछ ऐसे ही स्थिति सूरजपुर जिले के एक पुल के टूटने के बाद निर्मित हो गई है विधायक मंत्री अपने विधानसभा में हो वह भी सत्ता पक्ष के,जिले से लेकर जनपद तक के प्रतिनिधि हो,पंचायत प्रतिनिधि हो, उसके बावजूद भी एक पुल टूटने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था ना बन सके यह बड़ी विडंबना है,प्रशासनिक अधिकारी भी नेता हो गए हैं आते हैं और ऐसा दिखाते हैं कि उन्हें बहुत चिंता है तत्काल कार्य करने का निर्देश देते हैं पर जाने के बाद उस निर्देश का क्या होता है इसका पता नहीं,ऐसा लगता है कि प्रशासनिक अधिकारी भी नेता की तरह सिर्फ बोलना ही जानते हैं काम करवाना उनके भी हाथ में नहीं होता है? कोरिया सूरजपुर के सरहद पर एक पुल के पूरी तरीके से टूट जाने को लेकर कई गांव का सम्पर्क टूट गया है ग्रामीण परेशान है आवागमन में उन्हें दिक्कत आ रही है, पर इस समस्या से कोई भी स्थायी तो छोडि़ए वैकल्पिक व्यवस्था भी मुहैया नहीं कर पा रहा है,सिर्फ काम हो रहा है ऐसा दिखाया जा रहा है पर जमीनी स्तर पर कोई भी काम अभी तक हुआ नहीं है,पूरी तरीके से समस्याओं को निजात दिलाने के लिए पूर्ण निर्माण में समय लगता है यह सभी जानते हैं पर फिर भी इतना समय नहीं लगता है कि सालों साल उसमें जूझना पड़े, और जब ऐसी स्थिति होती है तो प्रशासन शासन के पास वैकल्पिक व्यवस्था का भी एक मार्ग होता है पर उस मार्ग को भी पूर्ण न करना कहीं ना कहीं प्रशासन शासन की अनदेखी ही कही जाएगी,ग्रामीण में इस बात को लेकर इतना आक्रोश है कि वह कलेक्टर कार्यालय के घेराव करने की योजना बना रहे हैं क्योंकि वह एक महीने से पुल टूटने से जो परेशानी का वह सामना कर रहे हैं उसका दर्द बस वही जान रहे हैं।
3 बार के जनपद सदस्य को नहीं है जनता की फिक्र?
राजीव कुमार गुप्ता जिस क्षेत्र में पुल टूटा है वहां के तीन बार के जनपद सदस्य है,तीन बार यहां की जनता ने इन्हें जनपद सदस्य बनाया पिछले 15 साल से यह इस क्षेत्र से जनपद सदस्य पर जब ग्रामीणों के ऊपर आफत आई पुल टूटने को लेकर उनके आवागमन में दिक्कत आई तो यह जनपद सदस्य भी उनकी मदद नहीं कर पा रहे, अपने जनपद कार्यालय से इस सड़क के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बन सके,कीचड़ से सने सड़कों पर चलना ग्रामीणों के लिए भारी परेशानी बना हुआ है।
क्या कलेक्टर के निर्देशों को अधिकारी उड़ा रहे धज्जियां
ज्ञात होगी जिस दिन पुल टूटा उसी दिन कलेक्टर ने संबंधित विभाग को सख्त निर्देशित किया था कि जल्द वैकल्पिक गंगोटी शिवपुर मार्ग में आवश्यक कार्य कराए जाने की बात कही थी,उस दिन ऐसा लगा कि कलेक्टर महोदय काफी इस मामले को लेकर गंभीर है उनकी गंभीरता को देखकर ग्रामीणों में भी इस बात की आस थी कि इस पुल के टूट जाने के बाद भी उतनी समस्या नहीं होगी जितना वह सोच रहे हैं,क्योंकि कलेक्टर साहब ने उनकी सोच से पहले ही उनकी समस्या को कम करने का निर्देश दे दिया था,जिसे सुनकर ग्रामीणों की चिंता कुछ कम हुई थी पर उन्हें क्या पता थे कि उनकी चिंता सिर्फ उसे दिन ही काम करनी थी बाकी उनकी समस्या बढ़ी ही रहेगी इस बात का उन्हें भी अंदाजा नहीं था,एक महीने बीत जाने के बाद भी उनकी समस्या को कम करने के लिए दिए गए दिशा निर्देश सिर्फ हवा हवाई ही साबित हो रहे हैं,वैकल्पिक व्यवस्था की कोई सूध नहीं ले रहा आवागमन कठिनाइयों में हो रहा है।
क्या जिले में कलेक्टर से बड़े हो गए है अधिकारी?
सवाल यह उठता है कि क्या जिले में अब कलेक्टर से भी बड़ा कोई अधिकारी हो गया है यह सवाल इसलिए हो रहा है क्योंकि निर्माण देखने वाले अधिकारी शायद कलेक्टर साहब के दिशा निर्देशों का पालन करना भूल गए या फिर अपने ही धुन में चल रहे हैं या फिर कलेक्टर साहब ने ऐसे काम चोरों को दिशा निर्देश दे दिया कि वह कलेक्टर साहब के दिशा निर्देश की बातों को भी बट्टा लगा रहे हैं?
गोबरी नदी में बने पुल को टूटे 1 माह से ऊपर हो गए पर अधिकारी अभी तक नहीं बना पाए वैकल्पिक मार्ग?
पुल टूटने के 1 महीने बाद भी वैकल्पिक मार्ग बनाने में फेल रहा प्रशासन, ग्रामीणों को भी यह पता है कि पुल इतना जल्दी बनने वाला नहीं है उन्हें इस पुल के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है और ऐसे-ऐसे जनप्रतिनिधि रहेंगे तो कई साल पुल को बनने में भी लग सकता है, पर जिन्होंने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपने लिए चुना है क्या वह इसी दिन के लिए चुना है कि वह समस्याओं में घिरे रहे उनकी समस्याओं का निदान न हो सके परेशानी ही उनकी बनी रहे कम से कम उनकी परेशानी को कम करने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था तो बनाया ही जा सकता था जिसे एक महीने में भी नहीं बनाया जा सका।
जिला पंचायत सदस्य अखिलेश प्रताप सिंह अभी तक अपने जनता के तकलीफों को नहीं आए देखने
इस क्षेत्र से अखिलेश प्रताप सिंह जिला पंचायत सदस्य बने पर ग्रामीणों की इस समस्या पर वह भी चुप बैठे हैं इन्हें लोग क्षेत्र में बाबा मानते हैं सुख-दुख में खड़े होने वाला व्यक्तित्व बना हुआ है पर क्या इस बार वह भी आंख में पट्टी बांधकर सिर्फ प्राइवेट कोयला खदान पर ही टिकी हुई है जिन्होंने उन्हें अपना प्रतिनिधित्व बनाया उनकी समस्या क्या उनके लिए समस्या नहीं है?
काहे के सीईओ इनके पास नहीं है बजट
जनपद पंचायत कार्यालय भैयाथान के सीईओ का कहना है कि उनके पास बजट नहीं है,इतने बड़े गांव के विकास के लिए बने कार्यालय में जिम्मेदार पद पर बैठे विनय गुप्ता का यह बयान कितना आमानवीय है यह समझ जा सकता है, गांव की समस्या के लिए यह कार्यालय है और इसके ही उच्च अधिकारी के पास गांव की समस्या दूर करने के लिए बजट नहीं है अब आप समझ सकते हैं कि क्या स्थिति है सुशासन की?
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