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लेख@ शिक्षा में अर्थ स्वावलंबन अनिवार्य

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किसी भी देश की सामाजिक आर्थिक और मानवीय विकास का मूल उस देश की शिक्षा और शिक्षा नीति होती है। शिक्षा का विकास उस देश की संस्कृति और सभ्यता से होती है पर हमारे भारत का विडम्बना है की आज भी हमारे भारतीय शिक्षा पद्धति पर लार्ड मैकाले का प्रभाव नहीं गया है। मैकाले अच्छी तरह जानता था की किसी देश को हराना है तो उस देश की सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा पर वार करो और यदि शिक्षा और संस्कृति नष्ट हो गई तो वह देश स्वमेव हार जायेगा। अतः मैकाले ने शिक्षा के माध्यम से भारत में पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा तो दिया और हमारी भारतीय सनातन संस्कृति को दबाने का प्रयास भी किया पर मैकाले ने अपने शिक्षा के माध्यम से अपने उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाये पर आज भी शिक्षा का उद्देश्य अधिकतर लोग किसी सरकारी संस्थान या नामी कंपनी में नौकरी करने से लगाता है। मैकाले के शिक्षा पद्धति का ये भी तो एक हिस्सा है।पर हमारे सनातन शिक्षा पद्धति में हमें सिखलाता है, की शिक्षा उपरांत हम स्वमेव स्वावलंबन बन जायेंगे। स्वालंबन शिक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और जिस शिक्षा में स्वालंबन ना हो तो फिर वह शिक्षा अधुरा है।
लम्बे अरसे से कुछ बड़े बुजुर्गो के मुख से सुननें को मिलता था की ज्यादा पढ़ लिख के क्या करोगे, नौकरी चाकरी तो मिलना नहीं है,पर वर्तमान में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इस बात पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में माध्यमिक स्तर से ही बच्चे कैसे अध्ययन करते करते आर्थिक स्वावलंबन की दिशा कैसे पकड़े इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। शासन द्वारा सप्ताह में प्रत्येक शनिवार को बस्ता विहीन दिवस घोषित किया गया है। जिसमें बच्चें बिना बस्ता के विद्यालय आता है। शनिवार को बच्चा सांस्कृतिक सामाजिक शारीरिक और मानसिक गतिविधियां तो सीखता है,साथ ही बच्चों को गांव में या शहर में आसपास के व्यावसायिक केंद्रों पर ले जाया जाता है जहां बच्चे व्यावसायिक संस्थानों का अवलोकन करता और उस व्यवसाय को समझने का प्रयास करता है। फलस्वरूप निश्चित ही बच्चे रूचि अनुरूप अपने में एक या एक अधिक कौशल को विकसित करने का प्रयास करेगा । अतः पढ़ाई के दरम्यान ही बच्चें अपने रूचि अनुरूप किसी एक कौशल को विकसित कर आर्थिक दिशा को पकड़ सकता है,और एक बच्चें को अध्ययन के बाद अलग से रोजगार तलाशने की आवश्यकता नहीं पड़ेगा।
शिक्षा को सर्वांगणीय विकास का साधक कहा जाता है। शिक्षा के बिना समाज में व्यक्ति हमेशा अपने आप में अधूरा महसूस करता है,क्योंकि हम सबको विदित है की शिक्षा किसी भी राष्ट्र या समाज का धूरी है। शिक्षा एक ऐसा सम्पत्ति है जिसका कभी कोई हिस्सा नहीं ले सकता और ना ही कभी कोई चोर चोरी करके भाग सकता है। शिक्षा ही एक ऐसा संपदा जिसका जितना अधिक उपभोग करोगे, जितना बांटोगे उतना ही बढ़ते जाता है। अतः शिक्षा से स्वावलंबन का विकास होगा तभी हम शिक्षा को सर्वांगणीय विकास के साधक के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। शिक्षा में आर्थिक स्वावलंबन भी आवश्यक है। हर एक व्यक्ति के आर्थिक स्वावलंबन भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में परिणित होने में एक महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगा।
लक्ष्मीनारायण सेन
खुटेरी गरियाबंद (छ.ग.)


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