जनता बसों का ‘खतरनाक खेल’! ओवरलोडिंग से छत पर सवारी तक, परिवहन विभाग की चुप्पी पर सवाल
बच्चों से लेकर आम यात्रियों की सुरक्षा दांव पर, जनता बसों पर कब होगी कार्रवाई?
करोड़ों के टैक्स बकाये से ओवरलोडिंग तक—जनता बसों की पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में
छत पर सवारी, अंदर ओवरलोडिंग! जनता बसों के संचालन पर गंभीर सवाल
यात्रियों की जान से खिलवाड़? जनता बसों में नियमों की अनदेखी के आरोप
टैक्स बकाया, ओवरलोडिंग और परमिट पर सवाल—फिर भी जनता बसें बेखौफ!
‘अधिकारी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते’—जनता बसों के संचालन में कथित दबदबे की भी जांच जरूरी
-राजेन्द्र शर्मा-
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर 27 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। जिले में संचालित जनता बस सेवा को लेकर यात्रियों की सुरक्षा और परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बस संचालन में नियमों की कथित अनदेखी, टैक्स बकाया, परमिट के कथित दुरुपयोग, क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाने तथा स्कूली बच्चों को असुरक्षित तरीके से ले जाने जैसे आरोप सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संबंधित विभाग इन शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई कब करेगा।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यदि लगाए जा रहे आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल परिवहन नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सीधे आम यात्रियों और स्कूली बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा विषय बन जाएगा, ऐसे में किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करने के बजाय परिवहन विभाग और पुलिस प्रशासन को शिकायतों की तथ्यात्मक जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, हालांकि इस पूरे मामले में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है, इसलिए किसी व्यक्ति या बस संचालक को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
करोड़ों रुपये के टैक्स बकाये का दावा, रिकॉर्ड से हो पुष्टि- बस संचालक सैफ खान के संबंध में दावा किया जा रहा है कि बिलासपुर आरटीओ में उनके ऊपर करोड़ों रुपये से अधिक का टैक्स बकाया है और उन्हें डिफाल्टर घोषित किया जा चुका है, यह दावा कितना सही है, इसका अंतिम जवाब संबंधित आरटीओ के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकता है, यदि वास्तव में किसी वाहन संचालक के ऊपर लंबे समय से बड़ी राशि का टैक्स बकाया है और इसके बावजूद संबंधित वाहन नियमित रूप से संचालित हो रहे हैं, तो परिवहन विभाग के सामने कई सवाल खड़े होते हैं, क्या टैक्स वसूली की कार्रवाई हुई? क्या संबंधित वाहनों का संचालन प्रभावित हुआ? क्या वाहन के परमिट और फिटनेस की स्थिति की समीक्षा की गई? क्या बकाया राशि को लेकर विभाग ने कोई नोटिस या अन्य कार्रवाई की? इन सभी बिंदुओं का रिकॉर्ड सार्वजनिक होने पर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।|
परिवार के अलग-अलग नामों पर बसें और परमिट?- स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर कई बसें और परमिट संचालित किए जा रहे हैं, यदि ऐसा है तो परिवहन विभाग के लिए वाहन स्वामित्व, परमिट धारक, वास्तविक संचालक और बसों के संचालन की पूरी श्रृंखला का सत्यापन करना जरूरी है, किस वाहन का परमिट किसके नाम है, वाहन का वास्तविक संचालन कौन कर रहा है और टैक्स तथा अन्य वैधानिक देनदारियों की स्थिति क्या है—इनका मिलान आरटीओ रिकॉर्ड से किया जा सकता है, यदि सभी दस्तावेज नियमों के अनुरूप हैं तो इस संबंध में स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन यदि वाहन स्वामित्व और वास्तविक संचालन में अंतर मिलता है तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की आवश्यकता होगी।
ओवरलोडिंग का आरोप, यात्रियों की जान पर कितना जोखिम?- पूरे मामले का सबसे गंभीर पक्ष क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाने का आरोप है, स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि अधिक यात्रियों को बैठाकर बसों की क्षमता से ज्यादा संचालन किया जाता है, ओवरलोडिंग की स्थिति में बस चालक के नियंत्रण, ब्रेकिंग दूरी और यात्रियों की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, यही वजह है कि यात्री क्षमता से जुड़े नियमों का पालन सार्वजनिक परिवहन में विशेष महत्व रखता है, ऐसे में केवल शिकायतों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय परिवहन विभाग को अचानक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की जांच करनी चाहिए, बस के परमिट में निर्धारित यात्री क्षमता और मौके पर मौजूद यात्रियों की संख्या का मिलान किया जा सकता है।
स्कूली बच्चों को लगेज कैरियर में बैठाने का दावा बेहद गंभीर- मामले में सबसे चिंताजनक आरोप यह है कि कथित रूप से लगेज कैरियर में स्कूली छात्र-छात्राओं को बैठाकर लाया-ले जाया जाता है, यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो इसे किसी भी स्थिति में सामान्य परिवहन उल्लंघन मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, स्कूली बच्चे सबसे संवेदनशील यात्री वर्ग में आते हैं और उनके परिवहन में सुरक्षा मानकों का पालन होना आवश्यक है, इस आरोप की पुष्टि के लिए विभाग मौके पर निरीक्षण कर सकता है। स्थानीय स्कूलों, अभिभावकों और यात्रियों से जानकारी लेकर भी वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सकता है, यदि जांच में बच्चों को इस प्रकार असुरक्षित तरीके से ले जाने की पुष्टि होती है तो जिम्मेदारी तय करना आवश्यक होगा।
‘अधिकारी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते’—दावे की भी हो जांच- स्थानीय सूत्रों के हवाले से यह दावा भी चर्चा में है कि बस संचालक कथित रूप से अधिकारियों पर प्रभाव होने और विभागीय कार्रवाई से बचने की बातें करते हैं, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। किसी व्यक्ति द्वारा कही गई बात को तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि वास्तव में किसी सरकारी अधिकारी को प्रभावित करने, कार्रवाई रोकने या किसी प्रकार के अनुचित लाभ का प्रयास किया गया है तो यह अलग से जांच का विषय बन सकता है, ऐसे मामले में विभागीय अधिकारियों के निर्णय, निरीक्षण रिपोर्ट, चालानी कार्रवाई और परमिट संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा की जा सकती है।
पुराने हादसों के बाद भी सबक कितना?- जनता बसों के संचालन को लेकर पूर्व में हुए हादसों का उल्लेख करते हुए स्थानीय लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है, विशेष रूप से अंबिकापुर के पुराने बस स्टैंड से जुड़ी घटना का हवाला देकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि हादसों के बाद क्या बस संचालन से जुड़े सुरक्षा मानकों की पर्याप्त समीक्षा की गई? हादसे के बाद सामान्य तौर पर वाहन की फिटनेस, परमिट, बीमा, चालक का लाइसेंस, ब्रेक सिस्टम, टायर, यात्री क्षमता और अन्य सुरक्षा मानकों की जांच महत्वपूर्ण होती है, इसलिए यह जानना भी जरूरी है कि संबंधित मार्गों पर संचालित बसों की नियमित फिटनेस जांच कब हुई और उसके निष्कर्ष क्या रहे।
सिर्फ कागजी जांच नहीं, सड़क पर उतरना जरूरी- यदि परिवहन विभाग वास्तव में शिकायतों की जांच करना चाहता है तो केवल कार्यालय में बैठकर दस्तावेज देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी, जरूरत है कि अधिकारी अचानक बस स्टैंड और प्रमुख मार्गों पर जांच अभियान चलाएं, बसों को रोककर उनकी यात्री क्षमता, परमिट, फिटनेस, बीमा और टैक्स की स्थिति जांची जाए, साथ ही यह भी देखा जाए कि बसों में यात्रियों को किस स्थिति में बैठाया जा रहा है, यदि स्कूली बच्चों को लेकर कोई शिकायत है तो संबंधित समय पर औचक निरीक्षण ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है।
जांच में ये दस्तावेज हो सकते हैं अहम, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए परिवहन विभाग को कम से कम इन बिंदुओं का सत्यापन करना चाहिए—
- संबंधित सभी बसों का परमिट और परमिट की शर्तें
- वाहन का पंजीयन और वास्तविक स्वामित्व
- टैक्स भुगतान और कथित बकाया
- वाहन की फिटनेस प्रमाण-पत्र
- बीमा की वैधता
- चालक का ड्राइविंग लाइसेंस
- निर्धारित और वास्तविक यात्री क्षमता
- पूर्व में किए गए चालान और विभागीय कार्रवाई
- स्कूली बच्चों के परिवहन से संबंधित शिकायतों की वास्तविकता
- बसों के संचालन में परिवार के अलग-अलग सदस्यों की भूमिका इन दस्तावेजों और मौके की स्थिति का मिलान होने के बाद ही आरोपों की वास्तविकता सामने आ सकती है।
पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण- बस संचालन से जुड़े मामलों में परिवहन विभाग की प्राथमिक भूमिका है, लेकिन यदि ओवरलोडिंग, असुरक्षित परिवहन या किसी आपराधिक गतिविधि की पुष्टि होती है तो पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, विशेषकर यदि किसी दुर्घटना के बाद सुरक्षा मानकों की अनदेखी सामने आती है तो जिम्मेदारी का निर्धारण केवल चालक तक सीमित नहीं रहना चाहिए, वाहन मालिक, संचालक और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका भी तथ्यों के आधार पर जांची जानी चाहिए।
अगर आरोप गलत हैं तो विभाग स्थिति साफ करे- इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है, इसलिए यदि बस संचालक के खिलाफ लगाए जा रहे आरोप तथ्यहीन हैं तो संबंधित परिवहन विभाग और संचालक के पास दस्तावेजों के माध्यम से स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर है, यदि टैक्स बकाया नहीं है, तो रिकॉर्ड सामने रखा जा सकता है, यदि परमिट पूरी तरह वैध हैं, तो उनका सत्यापन कराया जा सकता है। यदि ओवरलोडिंग नहीं होती तो विभाग की नियमित जांच रिपोर्ट सामने लाई जा सकती है, लेकिन यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी होगी।
कार्रवाई का इंतजार या किसी हादसे का?- जनता बस सेवा आम लोगों के लिए महत्वपूर्ण परिवहन साधन है, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के यात्रियों के लिए बसें केवल आवागमन का माध्यम नहीं, बल्कि स्कूल, बाजार, अस्पताल और रोजगार तक पहुंच का प्रमुख साधन हैं, इसीलिए बस संचालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता, टैक्स बकाया है तो वसूली क्यों नहीं? परमिट में गड़बड़ी है तो कार्रवाई क्यों नहीं? ओवरलोडिंग है तो चालानी कार्रवाई क्यों नहीं? बच्चों को असुरक्षित तरीके से ले जाया जा रहा है तो तत्काल रोक क्यों नहीं? इन सवालों का जवाब परिवहन विभाग और पुलिस प्रशासन को देना चाहिए, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी आरोप को सच मानकर कार्रवाई नहीं, बल्कि जांच के बाद तथ्य के आधार पर कार्रवाई हो, लेकिन गंभीर शिकायत मिलने के बाद जांच ही न हो, यह स्थिति भी उचित नहीं कही जा सकती, अब जरूरत है कि बिलासपुर आरटीओ, संबंधित परिवहन अधिकारी और पुलिस प्रशासन संयुक्त रूप से जनता बसों के संचालन की व्यापक जांच करें, यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो यात्रियों को भरोसा मिलेगा और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो समय रहते सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकेगी, क्योंकि परिवहन व्यवस्था में सबसे बड़ा सवाल बस कितनी कमाई कर रही है, यह नहीं—सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसमें बैठा यात्री सुरक्षित घर पहुंच रहा है या नहीं, हादसे के बाद जांच करने से बेहतर है कि हादसे से पहले नियमों की जांच कर ली जाए, अब फैसला विभाग को करना है—कार्रवाई शिकायत के बाद होगी या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद?
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