टीन शेड का पानी घर की ओर गिरने से दीवारों में सीपेज,निगम से लेकर कलेक्टर तक पहुंची शिकायत,पंचनामा भी हुआ,फिर भी समस्या जस की तस

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,20 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। बारिश शुरू होते ही शहर में जलभराव की समस्या आम हो जाती है, लेकिन सोशल एक्टिविस्ट सतेंद्र पांडेय के लिए बारिश महज मौसम नहीं, बल्कि 13 साल पुरानी परेशानी की वापसी लेकर आती है। उनका आरोप है कि आसपास के घरों में लगे टीन शेड से बारिश का पूरा पानी उनके घर की ओर गिरता है। नतीजा यह है कि बारिश होते ही उनके घर में पानी जमा हो जाता है और दीवारें लगातार सीलन की मार झेल रही हैं। सतेंद्र पांडेय ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि ममता पांडेय, आशुतोष पांडेय (चिन्टू), कारू (राहुल पांडेय) और महेंद्र पांडेय के घरों में लगे टीन शेड से बारिश का पानी उनके घर की तरफ गिरता है। उनका कहना है कि लंबे समय से पानी की निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होने के कारण घर की दीवारों में सीपेज हो गया है। प्लास्टर खराब हो चुका है और अब दीवारों के कमजोर होने की स्थिति बन रही है।
शिकायतों की ‘बारिश’ हुई, समाधान की बूंद नहीं गिरी : सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब समस्या करीब 13 साल पुरानी है, तो इसका समाधान अब तक क्यों नहीं हो पाया? पांडेय के मुताबिक उन्होंने इस समस्या को लेकर कई बार संबंधित लोगों से बात की। इसके बाद मामला कोतवाली थाना, नगर निगम और कलेक्टर कार्यालय तक भी पहुंचा। नगर निगम की टीम मौके पर पहुंची और आपसी बातचीत के जरिए समाधान का प्रयास किया गया। कलेक्टर के निर्देश पर टीम ने पंचनामा तक तैयार किया। लेकिन शिकायत से लेकर पंचनामा तक की पूरी कवायद के बावजूद लगभग दो साल गुजर गए और समस्या वहीं खड़ी है, जहां पहले थी। यानी कागज पर कार्रवाई आगे बढ़ती रही और बारिश का पानी जमीन पर उसी रास्ते से बहता रहा।
दीवारें कमजोर हो रही हैं, जिम्मेदारी तय नहीं : पांडेय का कहना है कि लगातार पानी जमा होने से घर की दीवारों और प्लास्टर को नुकसान पहुंच रहा है। स्थिति ऐसी है कि प्लास्टर गिरने और दीवारों के कमजोर होने का खतरा बना हुआ है। ऐसे में सवाल सिर्फ असुविधा का नहीं, बल्कि परिवार की सुरक्षा का भी है। उनका कहना है कि जब वह घर पर नहीं रहते, तब उनकी पत्नी और बच्चों को कथित रूप से धमकी दिए जाने की बात भी सामने आई है। इससे परिवार भय और तनाव में है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पंचनामा बना,लेकिन समस्या का ‘अंतिम संस्कार’ नहीं हुआ : मामले का सबसे व्यंग्यात्मक पहलू यही है कि सरकारी प्रक्रिया में शिकायत भी हुई, अधिकारी भी पहुंचे और पंचनामा भी बन गया,लेकिन समस्या का समाधान आज तक नहीं हुआ। सवाल उठता है कि पंचनामा बनने के बाद जिम्मेदारी किसकी थी और कार्रवाई कहां अटक गई? यदि मौके पर जाकर स्थिति स्पष्ट हो गई थी तो फिर स्थायी जल निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या किसी हादसे का इंतजार किया जा रहा है? क्या किसी परिवार के घर की दीवार गिरने के बाद ही प्रशासन जागेगा? तेरह साल से पानी अपना रास्ता नहीं बदल पाया, लेकिन जिम्मेदार विभागों की फाइलें जरूर कई रास्तों से गुजर चुकी होंगी।
बारिश आते ही फिर वही कहानी : व्यथित सतेंद्र पांडेय का कहना है कि बारिश होने पर आज भी घर में बड़ी मात्रा में पानी जमा हो जाता है। उनका परिवार हर बारिश में इसी चिंता में रहता है कि इस बार पानी कितना नुकसान करेगा। दीवारों की सीलन, खराब होता प्लास्टर और लगातार बढ़ती परेशानी के बीच परिवार को स्थायी समाधान का इंतजार है। पांडेय ने जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित लोगों से मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके की दोबारा जांच,पानी की निकासी की स्थायी व्यवस्था और समस्या का तत्काल समाधान कराने की मांग की है। अब देखना यह है कि 13 साल से चली आ रही इस समस्या पर प्रशासन की नजर पड़ती है या फिर अगली बारिश में भी शिकायतें सूखी रहेंगी।
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